अहमदाबाद के प्रह्लादनगर स्थित अपार्टमेंट की बालकनियों से लेकर बोदकदेव की ऊंची इमारतों की पानी की टंकियों तक, नीले रंग के जंगली कबूतरों (Blue Rock Pigeons) का दिखना हमारे लिए एक आम बात है। हम अक्सर इन्हें सुबह-सुबह एक रोजमर्रा की परेशानी समझकर उड़ा देते हैं और इन पर ज्यादा ध्यान नहीं देते।
लेकिन, एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने हमें इन पक्षियों को एक अलग और बेहद गंभीर नजरिए से देखने पर मजबूर कर दिया है।
अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि ये पक्षी चुपचाप गाड़ियों और कारखानों से निकलने वाले जहरीले रसायनों को अपने शरीर में सोख रहे हैं।
शोधकर्ता कंथन नांबिराजन (Kanthan Nambirajan) और सुब्रमण्यन मुरलीधरन (Subramanian Muralidharan) ने अपनी रिसर्च में पाया है कि शहर के इन पक्षियों के ऊतकों (tissues) में नैप्थलीन, फेनेंथ्रीन और फ्लोरेन्टीन जैसे खतरनाक रसायन जमा हो रहे हैं। यह हमारे आसपास मंडरा रहे एक लगातार और बड़े पर्यावरणीय खतरे का सीधा संकेत है।
क्या कहता है यह नया शोध?
‘सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री’ (Salim Ali Centre for Ornithology and Natural History) द्वारा किए गए इस अध्ययन के अनुसार, ‘पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन’ (PAHs) को पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा खतरा माना जाता है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि इन रसायनों में कैंसर और आनुवंशिक बदलाव (carcinogenic and mutagenic) पैदा करने की क्षमता होती है, और यह पर्यावरण में बहुत आसानी से फैलकर जीवों के शरीर में जमा (bioaccumulation) हो जाते हैं।
शोधकर्ताओं ने 6 अलग-अलग प्रजातियों के कुल 37 पक्षियों पर परीक्षण किया। इस जांच में जो आंकड़े सामने आए, वे चिंताजनक हैं:
- नैप्थलीन (Naphthalene): 100% पक्षियों में पाया गया।
- फेनेंथ्रीन (Phenanthrene): 93% पक्षियों में मिला।
- फ्लोरेन्टीन (Fluoranthene): 46% पक्षियों में डिटेक्ट हुआ।
रिसर्च पेपर के अनुसार, शहरी इलाकों में भारी संख्या में मौजूद होने, इंसानी बस्तियों के बिल्कुल करीब रहने और इनके सैंपल आसानी से मिल जाने के कारण, कबूतर PAH प्रदूषण को मापने के लिए एक बेहतरीन ‘बायोइंडिकेटर’ (bioindicator) साबित हो सकते हैं।
एक ‘धीमी गति’ वाला पर्यावरणीय संकट
रिपोर्ट में इस बात को लेकर भी आगाह किया गया है कि इन रसायनों के सटीक स्रोत की पुष्टि करने के लिए अभी और अध्ययन की आवश्यकता है, क्योंकि वर्तमान में जो विश्लेषणात्मक तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं, वे मूल रूप से मिट्टी या पानी जैसे निर्जीव पर्यावरण के लिए विकसित किए गए थे।
हालांकि, पक्षियों के शरीर में मिले रसायनों का यह स्तर तुरंत जानलेवा नहीं है, लेकिन यह एक “स्लो-मोशन (धीमी गति)” वाले पर्यावरणीय संकट की ओर स्पष्ट इशारा जरूर करता है।
लेखकों ने अपने शोध में स्पष्ट किया है कि, “भले ही रसायनों की जो मात्रा देखी गई है वह ज्ञात जानलेवा स्तर से कम है, लेकिन कई प्रजातियों में इनकी लगातार मौजूदगी इस बात का सबूत है कि ये पक्षी लंबे समय से प्रदूषण के संपर्क (chronic exposure) में हैं।”
नोट: पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़ा यह बेहद महत्वपूर्ण शोध मार्च 2026 में एल्सेवियर (Elsevier) के प्रतिष्ठित जर्नल ‘साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट’ (Science of The Total Environment) में प्रकाशित किया जाएगा।
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