गुजरात हर साल बढ़ते पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है। सूखे जैसी स्थिति, भीषण गर्मी और जलवायु से जुड़ी अन्य विसंगतियां अब आम होती जा रही हैं। राज्य के लिए जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का कोई दूर का खतरा नहीं रह गया है—बल्कि यह आज ही हमारी आजीविका, खेती-किसानी, पानी की उपलब्धता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के स्वरूप को तेजी से बदल रहा है।
इन गंभीर चुनौतियों के बावजूद, गुजरात सरकार एक बार फिर जलवायु कार्रवाई (Climate Action) के लिए कोई बड़ा वित्तीय कदम उठाने से पीछे हट गई है। इस साल भी जलवायु परिवर्तन विभाग (Climate Change Department) के लिए 500 करोड़ रुपये के बजट आवंटन की लंबे समय से चल रही मांग पूरी नहीं हो सकी है।
बजट में ना के बराबर बढ़ोतरी
वर्ष 2026-27 के राज्य बजट में गुजरात सरकार ने जलवायु परिवर्तन विभाग के लिए केवल 429 करोड़ रुपये रखे हैं। पिछले साल के 419 करोड़ रुपये के मुकाबले इसमें सिर्फ 10 करोड़ रुपये का ही इजाफा हुआ है। एक ऐसे समय में जब जलवायु जोखिम बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं, यह बढ़ोतरी ना के बराबर लगती है।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि जब राज्य लगातार बदतर होती हीटवेव (लू) और बारिश के अनियमित पैटर्न से जूझ रहा है, तो बजट में यह मामूली वृद्धि नाकाफी साबित होगी।
कहां खर्च होंगे 429 करोड़ रुपये? (बजट का मुख्य आवंटन)
इस बजट को अगर करीब से देखें, तो इसमें अलग-अलग योजनाओं के लिए निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं:
सरकारी इमारतों पर सोलर रूफटॉप (278 करोड़ रुपये): कुल 429 करोड़ रुपये के बजट में सबसे बड़ा हिस्सा—278 करोड़ रुपये—सरकारी कार्यालय भवनों पर सोलर रूफटॉप (Solar Rooftop) सिस्टम लगाने के लिए रखा गया है। इसका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना और पारंपरिक बिजली पर निर्भरता कम करना है।
ई-वाहनों पर सब्सिडी (16 करोड़ रुपये): बैटरी से चलने वाले दोपहिया और तिपहिया वाहनों की खरीद पर सब्सिडी देने के लिए यह राशि रखी गई है। हालांकि, बड़े पैमाने पर टिकाऊ परिवहन की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए यह प्रयास सीमित ही नजर आता है।
बायोगैस प्लांट (12 करोड़ रुपये): लगभग 70 संस्थानों (जिनमें गौशालाएं, पांजरापोल/पशु आश्रय और शैक्षणिक संस्थान शामिल हैं) में बायोगैस प्लांट लगाने के लिए यह बजट दिया गया है, ताकि स्वच्छ ईंधन के उपयोग और कचरा प्रबंधन को बढ़ावा मिले।
क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट लर्निंग (9 करोड़ रुपये): स्कूली बच्चों में जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता लाने के लिए इन शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रस्ताव रखा गया है।
श्मशान-संबंधी सुविधाएं (7 करोड़ रुपये): लगभग 1,200 श्मशान-संबंधी सुविधाओं के निर्माण के लिए यह राशि आवंटित की गई है।
ग्रीन स्टार्टअप्स (5 करोड़ रुपये): गुजरात में पर्यावरण के अनुकूल काम करने वाले ग्रीन स्टार्टअप्स को गति देने के लिए यह फंड दिया गया है।
विशेषज्ञों की राय:
आलोचकों का तर्क है कि हालांकि सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है, मगर जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) के लिए जल सुरक्षा, गर्मी से बचाव (Heat Mitigation) और आपदा तैयारियों जैसे व्यापक निवेश की कहीं अधिक जरूरत है।
IoT आधारित निगरानी और भविष्य की राह
इन सबके अलावा, बजट में सरकारी भवनों पर लगे सोलर रूफटॉप और विंड-हाइब्रिड सिस्टम की निगरानी के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम लाने की भी योजना का जिक्र है। इससे नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की कार्यक्षमता और प्रदर्शन ट्रैकिंग में सुधार होने की उम्मीद है।
ये सभी कदम पर्यावरण जागरूकता को छोटे स्तर के हरित विकास से जोड़ने की एक कोशिश तो लगते हैं, लेकिन ये किसी बड़े ‘क्लाइमेट रोडमैप’ का हिस्सा होने के बजाय टुकड़ों में बंटे हुए नजर आते हैं।
नीति और बजट में बढ़ता फासला
कुल मिलाकर, हालांकि गुजरात सरकार जलवायु परिवर्तन को एक बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार करती है, लेकिन वित्तीय प्रावधान आक्रामक कार्रवाई के बजाय एक बेहद सतर्क रवैये की ओर इशारा करते हैं।
राज्य भर में जिस तरह से गर्मी, पानी की कमी और पारिस्थितिक दबाव बढ़ रहा है, उसे देखते हुए पर्यावरण पर्यवेक्षक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या पिछले साल से मात्र 10 करोड़ रुपये की वृद्धि के साथ 429 करोड़ रुपये का बजट इस संकट की तात्कालिकता (Urgency) से मेल खाता है?
जैसे-जैसे जलवायु के खतरे और अधिक स्पष्ट होते जा रहे हैं, सरकार के नीतिगत बयानों और उसकी बजटीय प्राथमिकताओं के बीच का फासला अब नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है।
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