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एयर इंडिया AI-171 क्रैश: ‘ठोस सबूतों के बिना कोई रिपोर्ट मंजूर नहीं’, पायलट संघ ने जांच टीम की विशेषज्ञता पर उठाए गंभीर सवाल

| Updated: June 12, 2026 12:18

पायलट संघ ने जांचकर्ताओं की विशेषज्ञता पर उठाए सवाल, बिना ठोस सबूत के रिपोर्ट आने पर दी हाईकोर्ट जाने की चेतावनी।

एयर इंडिया की उड़ान एआई-171 के दुखद हादसे की पहली बरसी से ठीक एक दिन पहले फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (एफआईपी) ने जांच प्रक्रिया पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं। एफआईपी ने इस मामले की जांच कर रही टीम में विषय विशेषज्ञों की कमी पर सीधा सवाल उठाया है। इसके साथ ही उन्होंने केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह कोई और अंतरिम रिपोर्ट प्रकाशित न करे, क्योंकि इससे दुर्घटना के असल कारणों को लेकर केवल भ्रम और अटकलें ही पैदा होंगी।

एफआईपी के अध्यक्ष कैप्टन सीएस रंधावा ने गुरुवार को अहमदाबाद में मीडिया से बातचीत के दौरान यह बातें कहीं। वह 12 जून को इस भीषण दुर्घटना के पीड़ितों के परिवारों से मिलने के लिए शहर में आए हुए थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस दुर्घटना की जांच विशेष रूप से उन विशेषज्ञों द्वारा की जानी चाहिए जिन्होंने बोइंग 787 विमानों पर काम किया हो। उन्होंने जांच में शामिल अन्य लोगों की जानकारी सार्वजनिक न किए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई।

आपको बता दें कि पिछले साल 12 जून को दोपहर करीब 1:38 बजे यह खौफनाक हादसा हुआ था। अहमदाबाद से लंदन के गैटविक जा रही एआई-171 उड़ान सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रनवे 23 से उड़ान भरने के महज 32 सेकंड बाद ही क्रैश हो गई थी। यह विशाल विमान सीधे आईजीपी कंपाउंड में जा गिरा था, जहां बीजे मेडिकल कॉलेज के छात्रावास स्थित थे।

इस मामले में 8 मई को गिफ्ट सिटी में विमान पट्टे और वित्तपोषण से जुड़े एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय विमानन मंत्री राम मोहन नायडू ने भी बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (एएआईबी) द्वारा की जा रही दुर्घटना की जांच अब अपने अंतिम चरण में है और इसे एक महीने के भीतर पूरा किया जा सकता है।

मंत्री ने आश्वासन दिया था कि विमान में अंतरराष्ट्रीय यात्री भी सवार थे, इसलिए जांच में पूरी पारदर्शिता बरती जा रही है और सरकार इसमें कोई दखलंदाजी नहीं करती। ज्ञात हो कि एएआईबी ने पिछले साल 12 जुलाई को मंत्रालय को प्रारंभिक जांच के निष्कर्ष सौंपे थे, जिन्हें उसी समय सार्वजनिक कर दिया गया था।

एक और “अंतरिम” रिपोर्ट आने की ताजा अफवाहों के बीच कैप्टन रंधावा ने सख्ती से कहा कि उनकी सीधी मांग एक अंतिम और पुख्ता रिपोर्ट की है। उन्होंने तर्क दिया कि अंतरिम रिपोर्ट बिना किसी ठोस निष्कर्ष के आती है, जिससे जनता में गलतफहमियां फैलती हैं और शक की सुई बेवजह पायलटों की ओर मुड़ जाती है।

उन्होंने सवाल किया कि क्या जांच एजेंसियां कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (सीवीआर) और फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (ईएफआर) का पूरा ट्रांसक्रिप्ट जारी करेंगी, जिसका जवाब उन्होंने खुद ही ‘नहीं’ में दिया।

एएआईबी जांचकर्ताओं की योग्यता पर बात करते हुए कैप्टन रंधावा ने अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (आईसीएओ) के अनुलग्नक 13 का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार जांच बोर्ड स्वतंत्र प्रकृति का होना चाहिए और इसमें शामिल लोग अत्यधिक अनुभवी होने चाहिए।

लेकिन भारत जैसे विशाल देश के इस जांच दल में केवल पांच लोग हैं, जिनमें से कुछ का अनुभव केवल छोटे विमानों को उड़ाने या उनकी सर्विसिंग करने तक ही सीमित है। उनके पास इतने बड़े कमर्शियल क्रैश की जांच के लिए आवश्यक विशेषज्ञता का भारी अभाव है।

कैप्टन रंधावा ने जांच के तकनीकी पहलुओं पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने एएआईबी के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि महज एक सेकंड के भीतर दोनों ईंधन नियंत्रण स्विच बंद कर दिए गए थे। 30 से अधिक वर्षों के अनुभव वाले एक परीक्षक के रूप में उन्होंने स्पष्ट किया कि मानवीय रूप से यह बिल्कुल असंभव है, क्योंकि एक पायलट का रिकॉर्डेड मानक प्रतिक्रिया समय कम से कम 2 सेकंड होता है।

उन्होंने आगे समझाया कि दोहरे इंजन की विफलता जैसी आपातकालीन स्थिति में पायलटों के बीच ‘चुनौती और प्रतिक्रिया’ (चैलेंज एंड रिस्पॉन्स) की एक स्थापित प्रक्रिया होती है। इसमें एक पायलट ईंधन काटने का निर्देश देता है और दूसरा उसकी मौखिक पुष्टि करता है, ताकि गलती से भी कोई चालू इंजन बंद न हो जाए। यह सब बाकायदा रिकॉर्ड होता है। उन्होंने कड़ा सवाल किया कि यदि पायलटों ने ऐसा किया था, तो रिकॉर्डिंग में वह बातचीत कहां है।

अंतिम रिपोर्ट की समयसीमा को लेकर कैप्टन रंधावा ने साफ किया कि उन्होंने कभी यह दबाव नहीं डाला कि रिपोर्ट एक साल के भीतर ही आनी चाहिए। उन्होंने मंत्रालय को लिखे गए अपने पत्रों में उन तकनीकी पहलुओं का विस्तार से वर्णन किया है जिनकी गहराई से जांच होनी चाहिए।

अंत में उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अंतिम रिपोर्ट ठोस सबूतों पर आधारित नहीं हुई और उसमें पायलट की गलती या इलेक्ट्रिकल खराबी का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला, तो एफआईपी इसे कतई स्वीकार नहीं करेगा। किसी भी तरह के संदेह की स्थिति में इस रिपोर्ट को सीधे दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी।

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