गांधीनगर: गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट पर आगामी गुरुवार, 30 जुलाई को उपचुनाव होने जा रहा है। यह सीट आठ बार के विधायक रहे योगेश पटेल के निधन के बाद खाली हुई थी। इस उपचुनाव के साथ ही राज्य की राजनीति से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प और हैरान करने वाला आंकड़ा सामने आया है।
साल 1962 में गुजरात विधानसभा के पहले चुनाव से लेकर अब तक के इतिहास पर नजर डालें, तो पता चलता है कि सदन ने अपने 66 प्रतिशत से ज्यादा समय अधूरे संख्याबल के साथ ही काम किया है। राज्य के 64 साल के चुनावी सफर में आज तक एक भी विधानसभा अपना कार्यकाल पूरे विधायकों के साथ खत्म नहीं कर पाई है। हर कार्यकाल में किसी न किसी मौजूदा विधायक का निधन जरूर हुआ है।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पहले चुनाव से लेकर अब तक विधानसभा के कुल 23,536 दिन बीते हैं। इनमें से 15,634 दिन यानी लगभग 66.5% समय सदन में विधायकों की संख्या अपनी तय सीमा से कम ही रही। इन खाली सीटों को भरने के लिए या तो उपचुनाव का इंतजार किया गया या फिर अगले आम चुनाव का। विधानसभा केवल 7,881 दिन ही अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर सकी है।
यह सिलसिला मौजूदा 15वीं गुजरात विधानसभा में भी जारी है। इस कार्यकाल के दौरान अब तक तीन मौजूदा विधायकों का निधन हो चुका है। इनमें करशनभाई पटेल, गोविंद परमार और योगेश पटेल शामिल हैं। दो सीटों पर उपचुनाव पहले ही हो चुके हैं, जबकि मांजलपुर सीट पर 30 जुलाई को मतदान होना है।
साल 1960 में गुजरात के गठन के बाद 1962 में पहला चुनाव हुआ था। तब से लेकर अब तक 15 विधानसभाओं के कार्यकाल में कुल 58 मौजूदा विधायकों का निधन पद पर रहते हुए हुआ है। जब भी किसी विधायक का निधन हुआ, तो उस सीट पर उपचुनाव कराया गया या फिर चुनाव नजदीक होने पर उसे अगले आम चुनाव में भरा गया।
आपको बता दें कि 1962 में बनी पहली गुजरात विधानसभा में 157 सदस्य थे। इसके बाद 1967 के चुनावों में सदन की ताकत बढ़ाकर 168 कर दी गई। वहीं, 1975 की विधानसभा से लेकर आज तक यह संख्या 182 सीटों पर स्थिर है।
विधायकों के निधन के मामले में आठवीं विधानसभा का कार्यकाल सबसे दुखद रहा। उस दौरान सबसे ज्यादा नौ विधायकों ने पद पर रहते हुए अपनी जान गंवाई थी। वहीं, पहली और चौथी विधानसभा के दौरान सबसे कम, केवल एक-एक मौजूदा विधायक का निधन हुआ था।
पद पर रहते हुए जान गंवाने वाले नेताओं की इस सूची में राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। 19 सितंबर 1965 को बलवंतराय मेहता कच्छ के ऊपर पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा विमान मार गिराए जाने के दौरान विधायक के पद पर ही थे। इसी तरह, 17 फरवरी 1994 को मुख्यमंत्री और विधायक रहते हुए चिमनभाई पटेल का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था। पूर्व मुख्यमंत्री अमरसिंह चौधरी ने भी 15 अगस्त 2004 को खेड़ब्रह्मा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए अंतिम सांस ली थी।
इस दिलचस्प पैटर्न को लेकर इतिहासकार रिज़वान कादरी का मानना है कि यह किसी भी अन्य पेशे की तरह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि अक्सर नेता काफी ढलती उम्र में विधायक बनते हैं, और शायद यही वजह है कि आज तक ऐसा कोई कार्यकाल नहीं गुजरा जिसमें किसी मौजूदा विधायक का निधन न हुआ हो।
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक घनश्याम शाह भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं। उनका कहना है कि किसी भी विधानसभा कार्यकाल का मौजूदा विधायक के निधन के बिना पूरा न होना कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक घटना है। शाह का मानना है कि संसद और देश के अन्य राज्यों की विधानसभाओं में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति होगी।
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