ओडिशा के कंधमाल जिले से एक बेहद प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। यहां एक आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी परिवार के पांच बच्चों ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) पास करके इतिहास रच दिया है। सालों की आर्थिक तंगी और पारिवारिक संघर्ष को पीछे छोड़ते हुए इन बच्चों ने मेडिकल क्षेत्र में कदम रखा है।
परिवार की तीन बेटियों- सुनेमी, आश्रिया और मीनाक्षी ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल कर राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला ले लिया है। ये तीनों अब अपने बड़े भाई-बहनों, बिभीषन नायक और मोनालिसा प्रधान के नक्शेकदम पर चल रही हैं, जो पहले ही मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं।
इस परिवार की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि घर का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति एक प्रवासी मजदूर है। वह परिवार का पेट पालने के लिए मजदूरी के साथ-साथ एक छोटी सी जमीन पर खेती भी करता है।
दारिंगबाड़ी के पहाड़ी और जंगली इलाके में स्थित सिकाबाड़ी गांव के रहने वाले 76 वर्षीय ब्रुशी नायक और 62 वर्षीय अनुसया के सबसे बड़े बेटे बिभीषन नायक (25) परिवार में नीट क्रैक करने वाले पहले सदस्य थे। उन्हें कोरापुट के शहीद लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला था और वर्तमान में वे वहीं से अपनी इंटर्नशिप पूरी कर रहे हैं।
उनकी 23 वर्षीय बहन मोनालिसा प्रधान भी इसी मेडिकल कॉलेज में द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं। अब उनके छोटे भाई-बहनों ने भी इसी राह को चुना है। 20 वर्षीय सुनेमी, 18 वर्षीय आश्रिया और 19 वर्षीय मीनाक्षी ने भी नीट परीक्षा पास कर ली है। ये तीनों क्रमशः पुरी, बोलांगीर और भवानीपटना के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही हैं।
मीनाक्षी दरअसल ब्रुशी के छोटे भाई जिशिया प्रधान की बेटी हैं, लेकिन बचपन से ही ब्रुशी और अनुसया ने उनका पालन-पोषण किया है। अनुसया का कहना है कि वे सभी बच्चों को अपना ही मानती हैं। इस नौ सदस्यीय परिवार में दो छोटे बेटे अभी स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं।
इन बच्चों ने अपनी शुरुआती स्कूली शिक्षा दारिंगबाड़ी से पूरी की और बाद में नयागढ़ से इंटरमीडिएट की पढ़ाई की। अपनी सफलता के बाद बिभीषन ने मोनालिसा को नीट के लिए तैयार करने में काफी मदद की थी। मोनालिसा के शानदार नतीजे ने बिभीषन को बाकी तीन बहनों को भी मेडिकल शिक्षा के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित करने का हौसला दिया।
बच्चों को मेडिकल की पढ़ाई तक पहुंचाने में परिवार को भारी आर्थिक बलिदान देना पड़ा है। बिभीषन ने बताया कि उनके पिता पढ़ाई के लिए बहुत कम पैसे ही दे पाते थे, इसलिए उन्होंने अपना खर्च चलाने के लिए स्थानीय बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया। अपनी और भाई-बहनों की शिक्षा का खर्च उठाने के लिए उन्होंने 6 लाख रुपये का कर्ज भी लिया है।
बच्चों का कहना है कि वे अपने माता-पिता को दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते हुए देखकर बड़े हुए हैं। वे जल्द ही समझ गए थे कि गरीबी की बेड़ियों को तोड़ने का एकमात्र तरीका शिक्षा ही है। मीनाक्षी ने बताया कि परिवार की परिस्थितियों ने उन्हें सादा जीवन जीने का महत्व सिखाया और पढ़ाई में कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित किया।
मीनाक्षी के अनुसार उनके माता-पिता ही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। उन्होंने अपने माता-पिता से ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ का वास्तविक अर्थ सीखा है। कई बार उन्हें भूखे भी सोना पड़ा, लेकिन उन्होंने पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया और हमेशा उत्कृष्टता के लिए प्रयास किया।
कक्षा 2 तक पढ़े ब्रुशी हमेशा से इस बात को लेकर दृढ़ थे कि उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले। वे अपने छोटे से खेत में धान, अदरक और हल्दी उगाते हैं और कई बार मजदूरी करने के लिए दूसरे राज्यों में भी जाते हैं। वहां से कमाए गए पैसों से ही बच्चों की पढ़ाई का खर्च निकलता है।
यह परिवार गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) रहने वाले लोगों के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं का लाभार्थी भी है। हालांकि, सरकारी मदद मिलने के बावजूद मेडिकल की पढ़ाई का भारी-भरकम खर्च उठाना उनके लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।
ब्रुशी ने मीडिया से अपनी खुशी और चिंता दोनों साझा की। उन्होंने कहा कि उन्हें खुद नहीं पता कि बच्चों ने जीवन में यह मुकाम कैसे हासिल कर लिया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी चिंता सभी पांचों बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने को लेकर है, जो दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। मेडिकल की पढ़ाई महंगी होने के कारण किताबें और अन्य शैक्षिक सामग्री खरीदने के लिए उन्हें अभी भी पैसों की सख्त जरूरत है।
बिना किसी औपचारिक शिक्षा वाली अनुसया ने घर की जिम्मेदारी संभालते हुए बच्चों को हमेशा अनुशासन में रखा। उन्होंने बताया कि उनकी मुख्य भूमिका परिवार के लिए खाना बनाना और बच्चों का ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित रखना रही है, भले ही वे उन विषयों को बिल्कुल नहीं समझती जो उनके बच्चे पढ़ते हैं।
सुनेमी ने बताया कि सभी भाई-बहन बहुत कम उम्र में ही परिवार की आर्थिक स्थिति से वाकिफ हो गए थे। उन्होंने पढ़ाई जारी रखते हुए अपने खर्चों को हमेशा सीमित रखने की कोशिश की है। आश्रिया ने कहा कि बच्चों ने हमेशा अपने पिता को उनकी जरूरतें पूरी न कर पाने की चिंता में देखा है, इसलिए उन्होंने हर संभव तरीके से अपने पिता का बोझ कम करने का प्रयास किया।
परिवार की बढ़ती मेडिकल महत्वाकांक्षाओं के बीच सरकार से मदद की गुहार भी लगाई गई है। जिशिया प्रधान ने ओडिशा सरकार से वित्तीय सहायता प्रदान करने की अपील की है ताकि बच्चों की मेडिकल शिक्षा बिना किसी अतिरिक्त दबाव के पूरी हो सके। जिशिया का कहना है कि ये बच्चे डॉक्टर बनकर इसी इलाके के लोगों की सेवा करेंगे, इसलिए पूरा गांव आज उन पर गर्व कर रहा है।
अपनी कठिन पढ़ाई के बावजूद, ये बच्चे अपने गांव और परिवार से गहराई से जुड़े हुए हैं। वे आज भी ब्रुशी के साथ कृषि कार्यों में हाथ बंटाते हैं और परिवार के मवेशियों की देखभाल करते हैं। खेती, मजदूरी और उधार के पैसों पर निर्भर रहने वाले इस परिवार के लिए, ये पांच मेडिकल छात्र अब उस लंबे समय से संजोए गए सपने का प्रतीक बन गए हैं, जो भविष्य में उनके परिवार की तकदीर बदलेगा।
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