बोस्टन: अमेरिका की एक संघीय अदालत ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के उस बड़े नीतिगत फैसले पर रोक लगा दी है, जिसके तहत विदेशी छात्रों, शोधार्थियों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के देश में ठहरने की अधिकतम अवधि सीमित करने की तैयारी की गई थी।
बोस्टन स्थित अमेरिकी जिला अदालत के न्यायाधीश एफ. डेनिस सायलर चतुर्थ ने होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (डीएचएस) के इस नए नियम के लागू होने से महज कुछ घंटे पहले राष्ट्रव्यापी प्रारंभिक स्थगनादेश जारी किया। अदालत ने सरकार के तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि प्रशासन का आधार बेहद कमजोर है और यह नीति अमेरिकी उच्च शिक्षा व्यवस्था व अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है।
यह प्रस्तावित नियम अमेरिका के करीब पांच दशक पुराने ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ ढांचे को समाप्त करने के उद्देश्य से लाया गया था। दशकों से चली आ रही इस व्यवस्था के तहत अंतरराष्ट्रीय छात्रों (एफ वीज़ा) और एक्सचेंज विज़िटर्स (जे वीज़ा) को अपने शैक्षणिक पाठ्यक्रम या प्रशिक्षण की समाप्ति तक वैध रूप से अमेरिका में रहने की अनुमति मिलती रही है।
प्रशासन के नए मसौदे में इस व्यवस्था की जगह सख्त निश्चित समय-सीमा तय की गई थी। इसके अनुसार एफ और जे वीज़ा धारकों के अमेरिका में प्रवास को अधिकतम चार वर्षों तक सीमित किया जाना था, जिससे लंबे समय तक चलने वाले शोध व डॉक्टरेट कार्यक्रमों के छात्रों को डीएचएस से विशेष विस्तार मांगने के लिए बाध्य होना पड़ता।
इसके साथ ही विदेशी पत्रकारों के लिए लागू ‘आई वीज़ा’ की अवधि, जो सामान्यतः उनके पूरे असाइनमेंट तक मान्य रहती थी, उसे घटाकर अधिकतम 240 दिन करने का प्रावधान था। वहीं अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रों को देश छोड़ने या वीज़ा श्रेणी बदलने के लिए मिलने वाले 60 दिनों के ग्रेस पीरियड को घटाकर 30 दिन करने की योजना थी।
पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश द्वारा नियुक्त न्यायाधीश सायलर ने उच्च शिक्षा अधिकार समूहों और श्रमिक यूनियनों के गठबंधन के पक्ष में यह फैसला सुनाया। इस कानूनी लड़ाई का नेतृत्व करने वालों में ‘प्रेसिडेंट्स अलायंस ऑन हायर एजुकेशन एंड इमिग्रेशन’ भी शामिल था।
अदालत ने अपने कड़े फैसले में स्पष्ट किया कि हार्वर्ड और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) जैसे शीर्ष संस्थान अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं पर काफी हद तक निर्भर हैं, जो विज्ञान, चिकित्सा और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में युगांतरकारी अनुसंधानों को आगे बढ़ाते हैं।
न्यायाधीश सायलर ने वीज़ा धोखाधड़ी रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देने वाली डीएचएस की दलीलों को हास्यास्पद करार दिया। उन्होंने टिप्पणी की कि विश्वविद्यालयों और 16 लाख से अधिक विदेशी विद्यार्थियों को अनिश्चितता के भंवर में धकेलने से प्रशासनिक खर्चों में करोड़ों डॉलर का भारी इजाफा होगा और विदेशी दाखिलों में अप्रत्याशित गिरावट आएगी।
इस अदालती फैसले से अमेरिका में पढ़ रहे 3.3 लाख से अधिक भारतीय छात्रों को बड़ी तात्कालिक राहत मिली है। भारतीय विद्यार्थी वहां विदेशी छात्रों के सबसे बड़े समूहों में से एक हैं और इनमें से अधिकांश बहु-वर्षीय स्नातकोत्तर एवं डॉक्टरेट पाठ्यक्रमों में पंजीकृत हैं।
यद्यपि होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने इस फैसले पर असंतोष जताते हुए कहा कि इससे आव्रजन प्रणाली के दुरुपयोग पर लगाम लगाने के उनके अधिकार सीमित होते हैं, लेकिन पूर्ण कानूनी प्रक्रिया जारी रहने तक इस नियम के क्रियान्वयन पर रोक प्रभावी रहेगी। शिक्षा जगत के दिग्गजों ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करने की अमेरिका की क्षमता सुरक्षित रहेगी।
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