गुजरात से अमेरिका होने वाले निर्यात को करारा झटका लगा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य के निर्यात में 17.4 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इस भारी नुकसान का मुख्य कारण अमेरिकी सरकार द्वारा लगाए गए सख्त टैरिफ, भू-राजनीतिक उथल-पुथल और अमेरिकी खरीदारों की सतर्कता को माना जा रहा है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 (FY26) में अमेरिका को होने वाला निर्यात घटकर 15.06 अरब डॉलर रह गया। यह आंकड़ा वित्तीय वर्ष 2024-25 में 18.23 अरब डॉलर था। इसका सीधा मतलब है कि राज्य के निर्यातकों को 3.17 अरब डॉलर का भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
इस मंदी की सबसे गहरी मार पेट्रोलियम उत्पादों, दवा निर्माण, मोती और कीमती पत्थरों, सोने और अन्य कीमती धातुओं के आभूषणों के साथ-साथ सिरेमिक और मानव निर्मित धागे के व्यापार पर पड़ी है। हालांकि, इस निराशाजनक माहौल में भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, एग्रोकेमिकल्स और कुछ इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात ने वृद्धि दर्ज करके उम्मीद की किरण जगाई है।
उद्योग जगत के जानकारों का कहना है कि टैरिफ की अनिश्चितता, कच्चे माल और माल ढुलाई की बढ़ती लागत ने इस गिरावट में बड़ी भूमिका निभाई है। अमेरिका ने अधिकांश भारतीय सामानों पर 25 प्रतिशत का पारस्परिक (reciprocal) टैरिफ लगाया था। इसके बाद पिछले साल अगस्त में 25 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क थोप दिया गया, जिससे कई उत्पादों पर कुल अतिरिक्त ड्यूटी 50 प्रतिशत तक पहुंच गई।
हालांकि, फार्मास्यूटिकल्स, स्मार्टफोन, सेमीकंडक्टर और कुछ अन्य चुनिंदा उत्पादों को इस भारी टैरिफ से छूट दी गई थी। इस टैरिफ के झटके ने गुजरात के कई निर्यातकों को अपना माल घरेलू बाजार में कम कीमतों पर बेचने के लिए मजबूर कर दिया, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों के निर्माताओं को अपना उत्पादन ही घटाना पड़ा।
मोरबी के एक सिरेमिक निर्माता हरेश बोपलिया ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि पिछले वित्तीय वर्ष में अमेरिका को होने वाले निर्यात में भारी कमी आई है। उनके अनुसार, कुछ निर्यातकों ने अपना माल घरेलू बाजार की ओर मोड़ दिया, तो कई लोगों के पास उत्पादन कम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
राजकोट के इंजीनियरिंग निर्यातक भी भारी दबाव का सामना कर रहे हैं, जो अमेरिकी बाजार में ऑटो कंपोनेंट्स, मशीन टूल्स और कास्टिंग की आपूर्ति करते हैं। राजकोट इंजीनियरिंग एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष परेश पटेल ने इसे निर्यातकों के लिए ‘दोहरी मार’ बताया। उन्होंने कहा कि उच्च अमेरिकी टैरिफ और तनावपूर्ण भू-राजनीतिक स्थिति दोनों ने निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है।
वहीं, रोलेक्स रिंग्स के निदेशक मिहिर मदेका को हालात सुधरने की पूरी उम्मीद है। उनका कहना है कि अमेरिकी बाजार की स्थितियां अब स्थिर होने लगी हैं और सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। मदेका के मुताबिक, अगर भू-राजनीतिक हालात ज्यादा नहीं बिगड़ते हैं, तो इस साल अच्छे निर्यात की उम्मीद की जा सकती है।
केमिकल निर्यातकों को भी कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण संघर्ष करना पड़ा है। चेमेक्सिल (Chemexcil) के गुजरात क्षेत्र के अध्यक्ष भूपेंद्र पटेल ने बताया कि मार्च में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास हुई उथल-पुथल ने आपूर्ति को बाधित किया। इसके अलावा, केमिकल उद्योग के लिए एक प्रमुख कच्चा माल ‘सल्फर’ काफी महंगा हो गया। डॉलर की मजबूती और टैरिफ ने उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता को और कम कर दिया।
निर्यातकों के लिए थोड़ी राहत की खबर 6 फरवरी, 2026 को आई, जब भारत और अमेरिका ने एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा की घोषणा की। इसके तहत अमेरिका ने कुछ निर्दिष्ट भारतीय सामानों पर अपने पारस्परिक टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति व्यक्त की है।
अब निर्यातक व्यापक ‘भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते’ (India-US Bilateral Trade Agreement) पर प्रगति का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि इससे मौजूदा वित्तीय वर्ष में बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी। इस बीच, फार्मास्युटिकल उद्योग बड़े पैमाने पर इन नुकसानों से अछूता रहा, क्योंकि जेनेरिक दवाओं को उच्च टैरिफ से छूट मिली हुई है और अमेरिकी बाजार में भारत की लागत प्रतिस्पर्धात्मकता बेहद मजबूत है।
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