अहमदाबाद: भरूच डिवीजन के डाकघर बचत बैंक (POSB) में अपनी गाढ़ी कमाई जमा करने वाले छोटे निवेशकों का पैसा उनके खातों तक कभी पहुंचा ही नहीं। इसके बजाय, कथित तौर पर 2.81 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि कर्मचारियों के ही आंतरिक डाक बचत खातों के जरिए दूसरी जगह ट्रांसफर कर दी गई। इस बड़े फर्जीवाड़े का संज्ञान लेते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने 12 डाक अधिकारियों और उनके सहयोगियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
इस पूरे घटनाक्रम से जुड़ी विस्तृत जानकारी नीचे दी गई है:
कब और कहां हुआ घोटाला?
सीबीआई गांधीनगर द्वारा दर्ज एफआईआर के अनुसार, धन की यह कथित हेराफेरी अगस्त 2024 से दिसंबर 2025 के बीच भरूच के ओएनजीसी (ONGC) कॉलोनी उप-डाकघर में हुई।
कौन हैं आरोपी?
एफआईआर में उप-पोस्टमास्टर, डाक सहायक, डाकिया और मल्टी-टास्किंग स्टाफ के नाम शामिल हैं। मामले का मुख्य आरोपी तत्कालीन उप-पोस्टमास्टर यासीन घांची है। आरोप है कि घांची ने अधिकृत एजेंटों के माध्यम से ग्राहकों से पैसे लिए और विभागीय डाक खातों का गलत इस्तेमाल कर उस रकम को डकार लिया।
कैसे दिया गया धोखाधड़ी को अंजाम?
भरूच डिवीजन के डाकघर अधीक्षक द्वारा दी गई शिकायत के मुताबिक, इस घोटाले का असर 56 POSB खातों पर पड़ा है, जिनमें से ज्यादातर ‘टाइम डिपॉजिट स्कीम’ के थे।
इस सुनियोजित घोटाले को कुछ इस तरह अंजाम दिया गया:
निवेशकों का पैसा उनके निर्धारित सरकारी खातों में जमा होने के बजाय, इस मामले में शामिल विभागीय अधिकारियों के POSB खातों में डाला गया। इसके बाद इस पैसे को डिजिटल माध्यमों से आरोपियों से जुड़े अन्य खातों में भेज दिया गया।
सीबीआई अधिकारियों के मुताबिक, मुख्य बैंकिंग सिस्टम ‘फिनाकल’ (Finacle) में फर्जी एंट्री की गई, ताकि ऐसा लगे कि पैसा निवेशकों के खाते में ही गया है, जबकि असल में उसे पोस्टल नेटवर्क के भीतर ही कहीं और भेजा जा रहा था।
जांच में यह भी सामने आया है कि कई मामलों में ग्राहकों को पासबुक तो दे दी गई, लेकिन उनके खाते में पैसे सुरक्षित नहीं थे। एजेंटों के जरिए आए डिपॉजिट को बिना निर्धारित रसीद दिए ही रख लिया जाता था और ग्राहकों के चेक भुनाकर पैसे गायब कर दिए जाते थे। आरोपी अधिकारी ने अपने पद और सिस्टम एक्सेस का दुरुपयोग करते हुए सरकारी पैसे को डायवर्ट किया।
पैसों का ट्रेल और UPI का इस्तेमाल
इस पूरे खेल में कर्मचारियों के डाक बचत खातों का जमकर इस्तेमाल हुआ। चुराई गई रकम को पहले साथी कर्मचारियों के POSB खातों में डाला जाता था और फिर वहां से गूगल पे (Google Pay) जैसे यूपीआई (UPI) प्लेटफॉर्म के जरिए मुख्य आरोपी से जुड़े खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था।
एफआईआर में ऐसे ही एक संयुक्त POSB खाते का जिक्र है, जिसमें आगे ट्रांसफर करने से पहले 15 लाख रुपये से ज्यादा की रकम जमा की गई थी।
कैसे खुला राज?
दिसंबर 2025 में एक इंटरनल अलर्ट के जरिए कुछ संदिग्ध लेन-देन पकड़े गए, जिसके बाद इस घोटाले का पर्दाफाश हुआ। शुरुआती जांच में पासबुक की एंट्री और कोर बैंकिंग डेटा (फिनाकल) के बैलेंस में भारी अंतर पाया गया। चौंकाने वाली बात यह भी है कि इन संदिग्ध ट्रांजैक्शन को पास करने के लिए सुपरवाइजर के क्रेडेंशियल्स (पासवर्ड आदि) का इस्तेमाल किया गया था।
कानूनी कार्रवाई और आगे की जांच
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। कार्यरत अधिकारियों पर कार्रवाई करने से पहले अधिनियम की धारा 17A के तहत पूर्व स्वीकृति भी ले ली गई है।
सीबीआई अब POSB खातों के लेन-देन, डिजिटल ट्रांसफर रिकॉर्ड और फंड को इधर-उधर करने में प्रत्येक आरोपी की भूमिका की गहराई से जांच कर रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि क्या इस घोटाले में डाक विभाग के कुछ अन्य खाते भी शामिल थे और क्या गबन की कुल रकम एफआईआर में बताई गई 2.81 करोड़ रुपये की राशि से भी ज्यादा हो सकती है।
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