कुछ आलोचकों का मानना है कि कनाडाई नेता शायद अपने पड़ोसी देश अमेरिका की राजनीतिक बयानबाजी से प्रभावित हो रहे हैं। इसी कड़ी में, कनाडाई राजनीतिक हस्ती डेनियल टायरी द्वारा सरकार में भारतीय मूल के अधिकारियों की मौजूदगी पर सवाल उठाने वाले एक सोशल मीडिया पोस्ट ने इंटरनेट पर भारी विवाद खड़ा कर दिया है।
इस टिप्पणी ने सार्वजनिक संस्थानों में अप्रवासन, पहचान और प्रतिनिधित्व को लेकर एक नई बहस को फिर से हवा दे दी है।
गौरतलब है कि कनाडा तेजी से बढ़ती भारतीय मूल की आबादी का घर है। एक अनुमान के मुताबिक, यह समुदाय 18 लाख से 29 लाख लोगों के बीच है, जो इसे विदेशों में रहने वाले सबसे बड़े भारतीय समुदायों में से एक बनाता है। यह कनाडा की कुल आबादी का लगभग 5.1 प्रतिशत हिस्सा है।
जनगणना के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि पिछली जनगणना की तुलना में इस समुदाय में 17.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो व्यापार, राजनीति और सार्वजनिक सेवा में इनके बढ़ते दबदबे को दर्शाता है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब टायरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में पूछा कि ग्लोबल अफेयर्स कनाडा पूरी तरह से भारतीयों द्वारा कैसे चलाया जा रहा है।
अपनी बात को साबित करने के लिए उन्होंने कनाडाई सरकार में काम करने वाले कई दक्षिण एशियाई अधिकारियों की तस्वीरें साझा कीं और इसे ‘अत्यधिक प्रतिनिधित्व’ (ओवररिप्रेजेंटेशन) का नाम दिया। उनके द्वारा पोस्ट की गई तस्वीरों में अरुण थंगराज, मनिंदर सिद्धू, रणदीप सराय और अनीता आनंद शामिल थे।
हालांकि, इन अधिकारियों की पृष्ठभूमि टायरी के दावों से काफी अलग है। उदाहरण के लिए, परिवहन कनाडा के उप मंत्री अरुण थंगराज का जन्म कनाडा में ही हुआ था।
इसी तरह, संसदीय सचिव मनिंदर सिद्धू का जन्म भले ही भारत में हुआ था, लेकिन वे बहुत छोटी उम्र में ही कनाडा आ गए थे। उनके माता-पिता 1980 के दशक की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के रूप में यहां पहुंचे थे और बाद में ब्रिटिश कोलंबिया के सरे में बस गए, जहां उन्होंने अपना पारिवारिक व्यवसाय खड़ा किया।
सरे सेंटर से लिबरल पार्टी के सांसद रणदीप सराय का जन्म 15 अप्रैल 1975 को वैंकूवर में हुआ था और उनका पालन-पोषण बर्नाबी में हुआ। उनके सिख माता-पिता उनके जन्म से पहले ही पंजाब से आकर कनाडा में बस चुके थे।
वहीं, पूर्व राष्ट्रीय रक्षा मंत्री और ओकविले से मौजूदा सांसद अनीता आनंद का जन्म 1967 में केंटविले, नोवा स्कोटिया में हुआ था। उनके पिता, एस.वी. आनंद, तमिलनाडु के एक सर्जन थे और उनकी माता, सरोज डी. राम, पंजाब की एक एनेस्थिसियोलॉजिस्ट थीं। ये दोनों 1960 के दशक की शुरुआत में कनाडा आकर बस गए थे।
जब ‘एक्स’ पर यूज़र्स ने टायरी को यह याद दिलाया कि उनके द्वारा उल्लिखित कई अधिकारी जन्म से ही कनाडाई हैं, तो उन्होंने अपने तर्क का आक्रामक तरीके से बचाव किया। टायरी ने लिखा कि कनाडाई होने का अर्थ उस पीढ़ीगत वंशावली का हिस्सा होना है जो उन संस्थापकों से जुड़ी है जिन्होंने इस महान राष्ट्र को बसाया और बनाया।
उन्होंने आगे तंज कसते हुए कहा कि कनाडा में दो भारतीयों के घर पैदा हुआ व्यक्ति अभी भी भारतीय ही है और यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है। टायरी ने जातीय विविधता की वर्तमान समझ पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि चार भारतीयों के होने में कुछ भी ‘विविध’ (डायवर्स) नहीं है, जब तक कि आप विविधता की आधुनिक परिभाषा यानी ‘गैर-श्वेत’ का इस्तेमाल न कर रहे हों।
उनकी इन टिप्पणियों का इंटरनेट पर कड़ा विरोध हुआ। लोगों ने उन पर अधिकारियों की पृष्ठभूमि को गलत तरीके से पेश करने और सरकार की वास्तविक विविधता को पूरी तरह से नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।
एक यूज़र ने जवाब देते हुए लिखा कि ये सभी अधिकारी कनाडाई हैं और उनका जन्म भी कनाडा में ही हुआ है, साथ ही टायरी अंतर सरकारी मामलों के मंत्री डोमिनिक लेब्लांक नामक श्वेत व्यक्ति को अपनी पोस्ट में दिखाना भूल गए।
एक अन्य यूज़र ने किसी की जातीयता पर सवाल उठाने को ही गलत ठहराते हुए लिखा कि उनका बैकग्राउंड चाहे जो भी हो, मुख्य सवाल यह है कि वे अपना काम ठीक से कर रहे हैं या नहीं। अगर वे अच्छा काम नहीं कर रहे हैं तो उन्हें बाहर निकाल दें, लेकिन विदेश मंत्री अब तक बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।
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