गुजरात के दाहोद में एक ऐसा हैरान करने वाला सियासी घटनाक्रम सामने आया है, जिसने मतदाताओं और राजनीतिक विश्लेषकों दोनों को सोच में डाल दिया है। यहां एक ही उम्मीदवार ने एक ही सीट के लिए तीन मुख्य विरोधी पार्टियों की ओर से अपना नामांकन दाखिल कर दिया है।
दाहोद जिला पंचायत की पिपेरो सीट से जाने-माने स्थानीय नेता भरत सिंह वाखला ने यह अनोखा कदम उठाया है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) तीनों के आधिकारिक उम्मीदवार के तौर पर अपने पर्चे भरे हैं।
पिपेरो सीट को मुख्य रूप से वरिष्ठ नेता बच्चूभाई खाबड़ का मजबूत गढ़ माना जाता है, लेकिन अब यह जगह एक ‘पॉलिटिकल थ्रिलर’ का केंद्र बन गई है। भरत सिंह वाखला का दल बदलने का पुराना इतिहास रहा है।
पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था और बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी। इससे पहले वह कांग्रेस छोड़कर ‘आप’ में शामिल हुए थे। हाल ही में उनके बीजेपी खेमे में शामिल होने या ‘सरेंडर’ करने की खबरें भी सामने आई थीं।
पिपेरो सीट के लिए कुल 11 नामांकन फॉर्म भरे गए हैं, जिनकी जांच में एक अजीबोगरीब प्रशासनिक उलझन सामने आई है। इन 11 फॉर्म्स में से बीजेपी के लिए पांच फॉर्म भरे गए हैं, जिनमें वाखला का नाम भी शामिल है।
वहीं कांग्रेस के लिए आए दो फॉर्म्स में भी वाखला मौजूद हैं, जबकि आम आदमी पार्टी की ओर से आया इकलौता फॉर्म भी वाखला ने ही भरा है। इसके अलावा दो निर्दलीय और एक बीआरपी (BRP) पार्टी के उम्मीदवार ने पर्चा दाखिल किया है।
यह चुनावी इतिहास में शायद पहली बार देखा जा रहा है जब कागजों पर तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों ने तकनीकी रूप से एक ही व्यक्ति को अपना संभावित उम्मीदवार बना लिया है।
भले ही वाखला ने तीनों पार्टियों के फॉर्म जमा कर दिए हैं, लेकिन उनकी उम्मीदवारी की कानूनी वैधता पार्टी के आधिकारिक जनादेश यानी ‘मैंडेट’ पर निर्भर करेगी।
चुनाव के नियमों के अनुसार, किसी भी प्रत्याशी को तभी किसी पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार माना जाता है, जब वह पार्टी तय समय सीमा से पहले उसे एक विशिष्ट अधिकार पत्र सौंपती है।
स्थानीय चुनाव अधिकारी का कहना है कि यह पूरी स्थिति 15 तारीख को साफ हो जाएगी। यही दिन नाम वापसी और मैंडेट जमा करने की आखिरी तारीख है।
अधिकारी के मुताबिक, उसी दिन यह पता चलेगा कि वाखला किस पार्टी का ‘फॉर्म बी’ जमा करते हैं और उनके कौन से नामांकन वापस लिए जाते हैं या खारिज होते हैं। इस पूरी राजनीतिक उलझन का असली सच 15 तारीख को ही जनता के सामने आ सकेगा।
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