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‘पिज्जा-बर्गर खाया, एसिडिटी हुई… इसलिए क्लास नहीं आया!’ गुजरात हाई कोर्ट में लॉ स्टूडेंट की दलील सुन हर कोई हैरान

| Updated: April 11, 2026 13:34

पिज्जा-बर्गर खाने से हुई एसिडिटी और कम हो गई अटेंडेंस! एलएलबी छात्र की अजीब दलील सुनकर गुजरात हाई कोर्ट भी हैरान

अहमदाबाद: गुजरात हाई कोर्ट में एक बेहद दिलचस्प मामला सामने आया है। मारवाड़ी यूनिवर्सिटी के एलएलबी चौथे वर्ष के एक छात्र ने अपनी कम उपस्थिति का जो कारण बताया, उसे सुनकर हर कोई हैरान रह गया। इस छात्र ने क्लास में न आने का सीधा संबंध अपने खान-पान की आदतों से जोड़ दिया।

दरअसल, अनिवार्य 75 प्रतिशत उपस्थिति के नियम को पूरा न कर पाने के कारण इस छात्र को परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था। अपने शैक्षणिक वर्ष को खराब होने से बचाने के लिए उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और राहत की गुहार लगाई।

अदालत में अपना पक्ष खुद रखते हुए छात्र ने दावा किया कि वह लंबे समय से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है। अपनी बीमारी के सबूत के तौर पर उसने मेडिकल दस्तावेज भी पेश किए, जिनमें उसे गंभीर एसिडिटी होने की बात कही गई थी।

जब इन मेडिकल दस्तावेजों की गहराई से जांच की गई, तो बीमारी की असली वजह ने सबका ध्यान खींचा। छात्र ने डॉक्टर का जो प्रमाण पत्र दिया था, उसमें स्पष्ट लिखा था कि कई महीनों तक लगातार पिज्जा और बर्गर खाने की वजह से उसे यह समस्या हुई है।

दस्तावेजों से यह भी पता चला कि पिछले तीन महीनों में वह चार से पांच बार डॉक्टर के पास इलाज के लिए जा चुका था। वहीं दूसरी तरफ, यूनिवर्सिटी ने छात्र को परीक्षा के अयोग्य ठहराने के अपने फैसले को सही ठहराने के लिए उपस्थिति नियमों का सख्ती से हवाला दिया।

इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को ऐसा रास्ता निकालने का सुझाव दिया जिससे छात्र का यह साल बर्बाद न हो। अदालत की इस सलाह के बाद शुक्रवार को यूनिवर्सिटी ने कोर्ट में एक प्रस्ताव पेश किया।

यूनिवर्सिटी ने बताया कि अनुपस्थित रहने के कारण यह छात्र पहले ही मिड-टर्म 1 की परीक्षा छोड़ चुका है, जिसका कुल अंकों में 15 प्रतिशत वेटेज होता है। राहत देते हुए यूनिवर्सिटी ने कहा कि वह इस छात्र को मिड-टर्म 2 और अंतिम परीक्षाओं में बैठने की अनुमति दे सकती है।

हालांकि, छात्र अपने छूटे हुए 15 प्रतिशत अंकों का नुकसान उठाने के लिए तैयार नहीं दिखा और उसने तुरंत इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद अदालत ने उसे इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने के लिए 16 अप्रैल तक का समय दिया है।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को 16 अप्रैल तक अपना रुख साफ करना होगा कि वह 20 अप्रैल, 2026 से शुरू होने वाली मिड-टर्म 2 परीक्षा में बैठना चाहता है या नहीं।

अदालत ने कहा कि यदि अगली सुनवाई तक छात्र की ओर से कोई हलफनामा दायर नहीं किया जाता है, तो यह मान लिया जाएगा कि उसे प्रतिवादी नंबर 3 (यूनिवर्सिटी) का प्रस्ताव मंजूर नहीं है।

अब इस अनोखे मामले की अगली सुनवाई 16 अप्रैल को होगी। इस आगामी सुनवाई में यूनिवर्सिटी से भी मेरिट के आधार पर अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने की उम्मीद है।

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