अहमदाबाद। इंसान के हौसले अगर बुलंद हों, तो कोई भी शारीरिक बीमारी उसके सपनों को नहीं तोड़ सकती। हफ्ते में तीन बार डायलिसिस से गुजरने वाले और किडनी फेल्योर से जूझ रहे एक शख्स ने ऐसा ही कमाल कर दिखाया है।
उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में प्रोबेशनरी ऑफिसर (PO) के पद पर अपनी नियुक्ति के लिए पूरे चार साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी और अंततः एक शानदार जीत हासिल की है।
नवीन येलूरी नामक इस संघर्षशील युवक ने साल 2022 में लोकोमोटर डिसेबिलिटी कोटे के तहत एसबीआई की प्रोबेशनरी ऑफिसर भर्ती परीक्षा पास की थी। हालांकि, बैंक ने उन्हें नौकरी देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि वे 2011 से किडनी की गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं।
उस समय नवीन का सीरम क्रिएटिनिन स्तर 7.48 मिलीग्राम था और उन्हें सप्ताह में तीन बार डायलिसिस कराना पड़ता था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी काबीलियत और काम करने की क्षमता को साबित किया।
येलूरी ने इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिजीज और डॉ. तरुण मदान से अपना फिटनेस सर्टिफिकेट भी हासिल किया था। इस प्रमाण पत्र में डॉक्टरों ने उन्हें ड्यूटी के लिए पूरी तरह से फिट घोषित किया था।
इन वैध प्रमाणपत्रों के बावजूद एसबीआई के अधिकारियों ने उनकी एक नहीं सुनी। बैंक के मेडिकल ऑफिसर ने बैंक के निर्देश पर हुई जांच का हवाला देते हुए नवीन को इस पद के लिए अनफिट करार दे दिया।
अपने हक़ को छिनता देख येलूरी ने हार मानने के बजाय गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। साल 2024 में हाईकोर्ट की सिंगल-जज बेंच ने एसबीआई के फैसले को सिरे से खारिज करते हुए बैंक को येलूरी की नियुक्ति के स्पष्ट निर्देश दिए।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बैंक ने इस मामले में किसी यूरोलॉजिस्ट की राय नहीं ली थी। इसके अलावा, संबंधित नियमों में क्रोनिक किडनी डिजीज को कहीं भी अयोग्यता के रूप में स्पष्ट तौर पर सूचीबद्ध नहीं किया गया था।
इस फैसले के खिलाफ एसबीआई ने अपनी दलीलों के साथ डिवीजन बेंच में अपील दायर कर दी। बैंक का तर्क था कि उनके निर्धारित मेडिकल मानकों के अनुसार किडनी फेल्योर एक अयोग्य स्थिति है और विकलांग व्यक्तियों के लिए मिलने वाला आरक्षण बुनियादी फिटनेस आवश्यकताओं से ऊपर नहीं हो सकता।
येलूरी की ओर से अदालत में पेश हुए अधिवक्ता गौतम जोशी और राजवी पटेल ने मजबूती से अपना पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि जब बैंक ने लोकोमोटर डिसेबिलिटी वाले उम्मीदवारों के लिए पद आरक्षित किए हैं, तो वह मेडिकल डिसेबिलिटी के आधार पर किसी ऐसे उम्मीदवार को नियुक्ति देने से नहीं रोक सकता जो पहले से ही बेंचमार्क विकलांगता की श्रेणी में आता है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस एन एस संजय गौड़ा और जस्टिस जे एल ओडेदरा की डिवीजन बेंच ने एसबीआई की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया कि विकलांग उम्मीदवारों पर सामान्य फिटनेस मानक यांत्रिक रूप से थोपे नहीं जा सकते।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस उम्मीदवार ने अन्य लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा की है और कठिन चयन प्रक्रिया के चक्रव्यूह को पार करते हुए अपनी जगह बनाई है। अगर कोई उम्मीदवार इस तरह कार्य करने में सक्षम है, तो बैंक के पास उससे उसकी कड़ी मेहनत से अर्जित की गई इस उपलब्धि को छीनने का कोई कारण नहीं बनता है।
अदालत ने एसबीआई को आठ सप्ताह के भीतर येलूरी को नियुक्त करने का कड़ा निर्देश दिया है। इसके साथ ही बेंच ने यह भी कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस युग में चिकित्सा विज्ञान काफी तेजी से प्रगति कर रहा है।
कोर्ट ने उम्मीद जताई कि वह दिन दूर नहीं जब डायलिसिस की प्रक्रिया भी बहुत आसान और कम समय लेने वाली हो जाएगी। अदालत ने अपने फैसले के अंत में कहा कि वे ऐसे किसी भी विचार को दृढ़ता से खारिज करते हैं जो एक योग्य उम्मीदवार को सम्मानजनक रोजगार पाने से रोकता हो।
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