कनाडा का टूरिस्ट वीजा अप्लाई करने वाले तीन भारतीय नागरिकों को वहां की फेडरल कोर्ट से एक बड़ी राहत मिली है। एक इमिग्रेशन अधिकारी ने इन तीनों के वीजा आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इनकी आर्थिक स्थिति संतोषजनक नहीं है। लेकिन अब कनाडा के फेडरल कोर्ट ने इस फैसले को पूरी तरह से पलट दिया है और आवेदन पर किसी दूसरे अधिकारी द्वारा पुनर्विचार करने का सख्त आदेश दिया है।
अदालत ने 1 सितंबर को दिए अपने अहम फैसले में वीजा अधिकारी के निर्णय को अनुचित करार दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय छात्रों के विपरीत, कनाडा आने वाले पर्यटकों के लिए यह कानूनी तौर पर अनिवार्य नहीं है कि वे अपनी पर्याप्त वित्तीय क्षमता या उपलब्ध संसाधनों का कोई भारी-भरकम प्रमाण दें।
यह फैसला उन हजारों भारतीयों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया है, जिनके वीजा आवेदन बिना किसी उचित विचार-विमर्श के खारिज कर दिए जाते हैं। कनाडा की ‘2025 एनुअल रिपोर्ट टू पार्लियामेंट ऑन इमिग्रेशन’ के आंकड़ों पर गौर करें, तो साल 2024 में ‘विजिटर प्रोग्राम’ के तहत भारत सबसे बड़ा स्रोत देश रहा था। इस दौरान 5.8 लाख भारतीयों को कनाडा में प्रवेश मिला, जो कुल पर्यटकों की संख्या का लगभग 11.5 प्रतिशत है।
इस ताजा मामले में इमिग्रेशन अधिकारी ने यह तर्क दिया था कि आवेदकों की संपत्ति और वित्तीय स्थिति उनकी यात्रा के घोषित उद्देश्य को पूरा करने के लिए नाकाफी है। अधिकारी ने मुख्य आवेदक के बैंक स्टेटमेंट में एकमुश्त जमा राशि पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इन पैसों के स्रोत के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई है।
हालांकि, मामले की बारीकी से सुनवाई करते हुए अदालत ने पाया कि 1 जुलाई 2024 से 23 फरवरी 2025 तक के बैंक स्टेटमेंट में कई लेन-देन दर्ज थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि जमा की गई रकम के स्रोत का दस्तावेजों में बाकायदा उल्लेख किया गया था और पैसों के उद्गम की पहचान स्पष्ट रूप से मौजूद थी।
इस मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए जज माइकल बतिस्ता ने एक बेहद अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अधिकारी के पास जमा राशि के स्रोत के बारे में और अधिक जानकारी मांगने का विकल्प खुला था, लेकिन केवल जानकारी के अभाव का हवाला देकर सीधे तौर पर आवेदन को खारिज करना कतई तर्कसंगत नहीं था। जज ने दोहराया कि कानूनन पर्यटकों के लिए छात्रों की तरह वित्तीय संसाधन साबित करने की कोई बाध्यता नहीं है।
अदालत के दस्तावेजों से यह भी सामने आया कि आवेदकों ने अपनी मजबूत आर्थिक स्थिति साबित करने के लिए मुख्य आवेदक की बड़ी संपत्ति और धन से जुड़े विस्तृत सुबूत पेश किए थे। खास बात यह है कि इन सभी दस्तावेजों को चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और बैंक प्रतिनिधियों द्वारा विधिवत प्रमाणित भी किया गया था।
इसके बावजूद वीजा अधिकारी ने इस महत्वपूर्ण साक्ष्य पर कोई ध्यान नहीं दिया। अदालत ने इस रवैये को बेहद गंभीरता से लिया है। कोर्ट के अंतिम आदेश में साफ तौर पर कहा गया है कि कोई भी निर्णयकर्ता किसी आवेदक द्वारा पेश किए गए इतने महत्वपूर्ण और प्रमाणित सबूतों की अनदेखी करके मनमाने ढंग से किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकता।
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