अहमदाबाद/गांधीनगर: गुजरात अपनी पहचान एक बिजनेस और टेक्नोलॉजी हब के रूप में बना चुका है, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी समानांतर रूप से चल रही है। यह सच्चाई है—फर्जी कॉल सेंटर रैकेट्स (Fake Call Centre Rackets) का बार-बार पर्दाफाश होना।
राज्य में लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहां आधुनिक तकनीक का दुरुपयोग कर अमेरिका, कनाडा और यूरोप में बैठे लोगों, विशेषकर NRIs को निशाना बनाया जा रहा है।
पिछले कुछ महीनों में, अहमदाबाद पुलिस ने कई ऐसे ऑपरेशन्स को अंजाम दिया है, जिन्होंने यह उजागर किया है कि कैसे साधारण दफ्तरों, होटल के कमरों और कमर्शियल इमारतों से जालसाजी का यह अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क चलाया जा रहा है।
इसमें विदेशी डेटा, डिजिटल टूल्स और नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं का जमकर इस्तेमाल हो रहा है।
होटल के कमरे से अमेरिका तक ठगी का नेटवर्क
इस कड़ी में सबसे ताजा मामला कुछ दिन पहले ही सामने आया, जब खाडिया पुलिस ने एक गुप्त सूचना के आधार पर सारंगपुर (अहमदाबाद) स्थित होटल संगम (Hotel Sangam) के एक कमरे में छापा मारा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने मुंबई निवासी क्लेटन रॉड्रिक्स (30) और अहमदाबाद के कपिल पढियार (39) व धवल दर्जी को गिरफ्तार किया। इन पर आरोप है कि ये एक फर्जी कॉल सेंटर चलाकर अमेरिकी नागरिकों को लोन अप्रूवल के नाम पर ठग रहे थे।
पुलिस ने बताया कि यह तिकड़ी ‘गूगल वॉयस आईडी’ (Google Voice IDs) का इस्तेमाल करती थी, जिसे क्रिप्टो करेंसी के जरिए रिचार्ज किया जाता था। आरोपी खुद को “लेंडिंग ट्री कॉरपोरेशन” (Lending Tree Corporation) का प्रतिनिधि बताकर अमेरिकियों को कॉल करते थे। वे पीड़ितों को डराते थे कि उनका क्रेडिट स्कोर कम है और इसे सुधारने या लोन पास कराने के लिए ‘इम्प्रूवमेंट चार्ज’ और बीमा के नाम पर पैसों की मांग करते थे।
हैरानी की बात यह है कि भुगतान सीधे बैंक में न लेकर वॉलमार्ट, टारगेट और एपल पे (Apple Pay) के गिफ्ट कार्ड्स (अक्सर $100 से $500 मूल्य के) के रूप में लिया जाता था। बाद में इन वाउचर नंबरों को USDT ट्रांजैक्शन और हवाला या आंगड़िया के जरिए भारतीय मुद्रा में बदल लिया जाता था। पुलिस ने मौके से फोन, लैपटॉप और अमेरिकी नागरिकों का भारी डेटा बरामद किया है।
‘हर्बल इलाज’ के नाम पर करोड़ों का खेल
होटल संगम की घटना से कुछ हफ्ते पहले, अहमदाबाद के एक प्रमुख कमर्शियल इलाके में भी बड़ा एक्शन देखने को मिला था।
नवरंगपुरा पुलिस ने आश्रम रोड स्थित साकार-9 (Sakar-9) की 12वीं मंजिल पर चल रहे एक कॉल सेंटर से 24 लोगों को हिरासत में लिया, जिनमें ज्यादातर छात्र थे। ‘मूनराइज रेमेडी केयर प्रा. लि.’ (Moonrise Remedy Care Pvt. Ltd.) के नाम से चल रहा यह दफ्तर दरअसल एक अंतरराष्ट्रीय ठगी का अड्डा था, जो NRIs को ‘हर्बल इलाज’ के नाम पर चूना लगा रहा था।
पुलिस जांच में पता चला कि यहां काम करने वाले कॉलर्स को अमेरिका की एक मेडिकल एजेंसी का प्रतिनिधि बनकर बात करने की ट्रेनिंग दी गई थी। वे बांझपन, ऑटिज्म, मोटापा, गंजापन और न्यूरोलॉजिकल विकारों के लिए जादुई इलाज का दावा करते थे।
विदेशी पीड़ितों से एक पैकेज के लिए $600 से $800 वसूले जाते थे, और कुछ मामलों में तो यह रकम हजारों डॉलर तक पहुंच जाती थी। यह कंपनी कथित मास्टरमाइंड अभिषेक रामनारायण पाठक के भाई के नाम पर रजिस्टर्ड थी।
पुलिस ने अभिषेक और टीम लीडर निखिल जैन को अन्य साथियों के साथ रिमांड पर लिया है। पुलिस को शक है कि इसके तार विदेश में बैठे किसी गुजराती हैंडलर से जुड़े हो सकते हैं।
ज़ोन-1 के डीसीपी हर्षद पटेल ने मीडिया को बताया कि जांच का मुख्य केंद्र अब ‘मनी ट्रेल’ (पैसों का लेन-देन) का पता लगाना है। जब्त किए गए उपकरणों को फॉरेंसिक जांच (FSL) के लिए भेजा गया है।
CBI और अन्य राज्यों तक फैला नेटवर्क
फर्जी कॉल सेंटरों का यह जाल सिर्फ स्थानीय पुलिस तक सीमित नहीं है।
- अक्टूबर 2024: केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने एक अंतरराज्यीय कॉल सेंटर फ्रॉड रिंग का भंडाफोड़ किया, जिसके तार गुजरात से गहराई से जुड़े थे। अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे और विशाखापत्तनम सहित 32 स्थानों पर छापे मारे गए। इसमें न्यू नरोदा और ओधव जैसे औद्योगिक इलाकों के निवासी भी शामिल थे।
- दिसंबर 2024: पंजाब पुलिस ने मोहाली के सेक्टर 74 में एक विशाल फर्जी कॉल सेंटर का पर्दाफाश किया और 155 कर्मचारियों को गिरफ्तार किया। जांच में पता चला कि इसका संचालन करने वाले मास्टरमाइंड गुजरात से जुड़े थे, जिनमें से कई अभी भी फरार हैं।
मोहाली वाला सेंटर भी अमेरिकी और कनाडाई नागरिकों को निशाना बनाता था और हवाला व डिजिटल करेंसी के जरिए पैसों की हेराफेरी करता था।
भारत की साख पर सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि गुजरात में लगातार हो रहे ये खुलासे एक बड़े राष्ट्रीय और वैश्विक साइबर अपराध इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। भारत की पहचान दुनिया के ‘ट्रस्टेड आउटसोर्सिंग हब’ (Trusted Outsourcing Hub) के तौर पर है, लेकिन ऐसे स्कैम इस छवि को धूमिल कर रहे हैं।
इंडिया ब्लॉकचेन अलायंस के अध्यक्ष राज कपूर ने मीडिया के एक वर्ग से कहा, “ये अब कोई साधारण फिशिंग गिरोह नहीं रहे। ये पूरी तरह से संगठित साइबर-फ्रॉड हब बन चुके हैं, जिनके पास ट्रेनिंग मॉड्यूल और सीमा पार समन्वय (Cross-border coordination) की व्यवस्था है।”
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि वैश्विक क्लाइंट्स ने विनियामक निगरानी (Regulatory Oversight) पर सवाल उठाने शुरू कर दिए, तो इससे भारत की $150 बिलियन की आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री को खतरा हो सकता है।
युवाओं का भविष्य दांव पर
इन फर्जी कॉल सेंटरों के पनपने का एक बड़ा कारण नियमों में खामियां और युवाओं की बेरोजगारी है। 20,000 से 1 लाख रुपये तक की सैलरी का लालच देकर छात्रों और युवाओं को भर्ती किया जाता है। कई बार इन युवाओं को अंदाजा भी नहीं होता कि वे कितने बड़े अपराध का हिस्सा बन रहे हैं।
कानूनी जानकारों का मानना है कि जब अपराध कई राज्यों और देशों में फैला हो, तो भारत के आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई करना कठिन हो जाता है। एक बार पैसा पीड़ित के खाते से निकल गया, तो उसकी रिकवरी लगभग नामुमकिन होती है।
फिलहाल, गुजरात पुलिस साइबर क्राइम यूनिट्स, वित्तीय खुफिया एजेंसियों और विदेशी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि अहमदाबाद में पकड़े गए ये मामले तो महज एक शुरुआत भर हैं।
जैसे-जैसे गुजरात अपनी डिजिटल इकोनॉमी का विस्तार कर रहा है, प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि राज्य का इन्फ्रास्ट्रक्चर ‘इनोवेशन’ के काम आए, न कि ‘इंटरनेशनल फ्रॉड’ के।
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