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गुजरात हाई कोर्ट: शादी का मतलब जबरन संबंध की इजाजत नहीं; गुरुग्राम के करोड़पति कारोबारी की जमानत खारिज

| Updated: January 16, 2026 15:08

पत्नी की देह पर पति का 'हक' नहीं, सहमति जरूरी: हाई कोर्ट ने गुरुग्राम के रसूखदार कारोबारी को राहत देने से किया इनकार, पत्नी ने लगाए थे सिगरेट से दागने और अप्राकृतिक संबंध के आरोप।

अहमदाबाद: वैवाहिक जीवन में पत्नी की गरिमा और शारीरिक स्वतंत्रता (Bodily Autonomy) को लेकर गुजरात हाई कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि आधुनिक कानूनी ढांचा व्यक्ति की शारीरिक स्वतंत्रता को मान्यता देता है, भले ही वह वैवाहिक रिश्ते के भीतर हो।

इस टिप्पणी के साथ ही हाई कोर्ट ने गुरुग्राम के एक रसूखदार ‘मल्टी-मिलियनेयर’ कारोबारी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया, जिस पर अपनी पत्नी के साथ अमानवीय क्रूरता, बार-बार दुष्कर्म और जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाने के गंभीर आरोप हैं।

क्या है पूरा मामला?

अहमदाबाद की रहने वाली पीड़िता ने डिटक्शन ऑफ क्राइम ब्रांच (DCB) में अपने पति, ससुर और सास के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति ने न केवल उसका यौन शोषण किया, बल्कि जबरन अप्राकृतिक संबंध भी बनाए। क्रूरता की हदें पार करते हुए आरोपी ने जलती हुई सिगरेट से पत्नी के निजी अंगों को दागा।

पीड़िता ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि उसके ससुर ने उसके साथ छेड़छाड़ की और जब उसने अपने पति से इसकी शिकायत की, तो पति ने उसे सुरक्षा देने के बजाय अनसुना कर दिया। इसके अलावा, तीनों ससुराल वालों पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने का आरोप भी लगाया गया है।

आरोपी का दावा: मैं बिजनेस टायकून हूँ, यह सामान्य विवाद है

शिकायत के अनुसार, दोनों का विवाह साल 2022 में हुआ था। यह महिला की पहली शादी थी, जबकि आरोपी पति की यह दूसरी शादी थी। गिरफ्तारी के डर से आरोपी पति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अपनी याचिका में उसने दलील दी कि वह गुरुग्राम में एक बड़े बंगले में रहता है, सफल कॉर्पोरेट गेस्ट हाउस चलाता है और एक बिजनेस टायकून है। उसने दावा किया कि यह मामला महज एक वैवाहिक कलह (Matrimonial Discord) है और लगाए गए सभी आरोप बेबुनियाद हैं।

दूसरी ओर, पत्नी के वकील ने इसका कड़ा विरोध करते हुए तर्क दिया कि पति अपनी पत्नी को सुरक्षा देने के कर्तव्य में विफल रहा और ससुर द्वारा किए गए शोषण पर मूकदर्शक बना रहा।

कोर्ट ने कहा: सहमति और सम्मान जरूरी

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, जस्टिस डी.ए. जोशी ने अपने आदेश में समाज और कानून की बदलती सोच को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि दशकों तक शादी को यौन सहमति का ‘ऑटोमैटिक ग्रांट’ माना जाता रहा है। लेकिन, आधुनिक कानूनी ढांचे में व्यक्ति की शारीरिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जा रही है। शादीशुदा जोड़ों के बीच अंतरंगता सामान्य है, लेकिन यह आपसी सहमति और सम्मान पर आधारित होनी चाहिए।”

जस्टिस जोशी ने आगे टिप्पणी की कि जीवनसाथी की इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना न केवल उसे असहनीय शारीरिक पीड़ा देता है, बल्कि उसे गहरे मानसिक और भावनात्मक आघात में भी धकेल देता है।

‘सभ्य समाज में कोई महिला बिना वजह ऐसे आरोप नहीं लगाती’

कोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए कहा कि हमारे सभ्य और सांस्कृतिक समाज में कोई भी महिला सार्वजनिक रूप से ऐसे संवेदनशील मुद्दों को तब तक नहीं उठाती, जब तक कि उत्पीड़न और दुर्व्यवहार उसकी सहनशक्ति से बाहर न हो जाए।

अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए पाया कि आरोपी की पहली पत्नी ने भी उसके खिलाफ इसी तरह के आरोप लगाए थे। इससे यह संकेत मिलता है कि आरोपी आदतन अपराधी (Repeat Offender) है और इस तरह के कृत्यों में लिप्त रहने का आदी है।

फैसला

गुजरात हाई कोर्ट ने यह कहते हुए आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी कि यह मामला किसी साधारण वैवाहिक विवाद जैसा नहीं है। प्रथम दृष्टया (Prima Facie), यह पत्नी द्वारा लगाए जाने वाले सामान्य आरोपों से कहीं अधिक गंभीर और क्रूर प्रकृति का मामला प्रतीत होता है।

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