सार्वजनिक रोजगार में समानता के संवैधानिक अधिकार को बरकरार रखते हुए, गुजरात उच्च न्यायालय ने एक बेहद सख्त और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी अविवाहित महिला को नौकरी देने से केवल इस आधार पर मना करना कि ‘वह भविष्य में शादी करके कहीं और चली जाएगी’, पूरी तरह से मनमाना, भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 का खुला उल्लंघन है।
अदालत ने दाहोद जिले में ‘प्रशासक-सह-रसोइया’ (Administrator-cum-Cook) के पद पर एक कम योग्य उम्मीदवार की नियुक्ति को रद्द कर दिया है। इसे “खुलेआम भाई-भतीजावाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण” करार देते हुए, कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता की शैक्षणिक योग्यता की प्रामाणिकता जांचने के बाद, पूरी तरह से मेरिट के आधार पर नए सिरे से नियुक्ति प्रक्रिया पूरी की जाए।
मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
यह महत्वपूर्ण फैसला 16 फरवरी, 2026 को जस्टिस मौलिक जे. शेलट ने सांगाड़ा हंसाबेन मालभाई की रिट याचिका पर आंशिक रूप से सुनवाई करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता ने झालोद तालुका के मामलातदार द्वारा एक अन्य उम्मीदवार (प्रतिवादी संख्या 3) के पक्ष में की गई नियुक्ति की वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
विवाद तब शुरू हुआ जब प्रशासक-सह-रसोइया का पद भरने के लिए मामलातदार ने भर्ती प्रक्रिया शुरू की. याचिकाकर्ता ने ग्रेजुएशन में 68% अंक हासिल किए थे। वहीं प्रतिवादी संख्या 3 की योग्यता की बात करें तो, अंतिम वर्ष की परीक्षा में मात्र 48.94% अंक मिले थे और आवेदन के समय उसके पास वैध स्नातक दर्जे पर भी अनिश्चितता थी।
इसके बावजूद, मामलातदार द्वारा तैयार की गई मेरिट लिस्ट में कम अंक वाली उम्मीदवार को ऊपर रखा गया और नियुक्ति दे दी गई। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेजों से यह साफ हुआ कि याचिकाकर्ता ने अपने सभी शैक्षणिक प्रमाण पत्र जमा किए थे और वह नियुक्त उम्मीदवार से कहीं अधिक योग्य थी।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता का तर्क: अधिवक्ता जापान वी. दवे ने याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए कहा कि मेरिट लिस्ट में जानबूझकर हेरफेर किया गया ताकि प्रतिवादी संख्या 3 को फायदा पहुंचाया जा सके। उन्होंने RTI से मिले दस्तावेजों के आधार पर साबित किया कि उनकी मुवक्किल के अंक सबसे ज्यादा थे और उसे पहले स्थान पर होना चाहिए था।
राज्य सरकार का बचाव: सहायक सरकारी वकील सिद्धार्थ रामी ने सरकार की तरफ से दलील दी कि भर्ती के समय याचिकाकर्ता ने ग्रेजुएशन का सर्टिफिकेट जमा नहीं किया था, इसलिए दूसरे उम्मीदवार को चुना गया। हालांकि, सरकार ने कहा कि अदालत के आदेश पर विश्वविद्यालय से डिग्री की जांच कराई जा सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि जिस मामलातदार ने यह नियुक्ति की थी, वे अब रिटायर हो चुके हैं।
प्रतिवादी संख्या 3 का पक्ष: नौकरी पा चुकी उम्मीदवार के वकील ने दावा किया कि याचिकाकर्ता की डिग्री संदिग्ध है। साथ ही यह तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल पिछले आठ साल से ज्यादा समय से इस पद पर काम कर रही है, इसलिए उसकी नियुक्ति रद्द नहीं होनी चाहिए।
अदालत की सख्त टिप्पणी: “भाई-भतीजावाद का क्लासिक उदाहरण”
पूरे रिकॉर्ड की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि इस भर्ती प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं हुई हैं। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह मामलातदार द्वारा दिखाए गए खुलेआम भाई-भतीजावाद का एक क्लासिक उदाहरण है… जिसके तहत मेरिट लिस्ट में चौथे नंबर पर होने के बावजूद प्रतिवादी संख्या 3 की नियुक्ति कर दी गई।”
जब अदालत ने मेरिट लिस्ट के ‘कमेंट्स कॉलम’ को देखा, तो यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि अधिक योग्य उम्मीदवारों को बेहद बेतुके कारणों से खारिज कर दिया गया था। सबसे अजीबोगरीब कारण यह लिखा गया था कि ‘एक अविवाहित ग्रामीण महिला भविष्य में शादी करके दूसरी जगह शिफ्ट हो सकती है।’
इस तर्क की कड़ी निंदा करते हुए अदालत ने कहा:
“रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह साबित करे कि एक अविवाहित लड़की को इसलिए नौकरी नहीं दी जा सकती क्योंकि वह निकट भविष्य में शादी करके किसी और गांव चली जाएगी। ऐसा कारण न केवल मनमाना और बेतुका है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।”
कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि इस गैरकानूनी कृत्य के लिए मामलातदार पर मुकदमा चलाया जा सकता था, लेकिन चूंकि वह अधिकारी अब सेवानिवृत्त हो चुका है, इसलिए ऐसा नहीं किया गया।
अंतिम फैसला और सरकार को निर्देश
उच्च न्यायालय ने RTI दस्तावेजों के आधार पर माना कि याचिकाकर्ता ने अपने सभी प्रमाण पत्र कार्यालय में जमा किए थे और सरकार का यह दावा खोखला है कि दस्तावेज नहीं दिए गए थे। हालांकि, डिग्री की सत्यता पर उठे सवालों को देखते हुए अदालत ने सीधे तौर पर नियुक्ति का आदेश देने के बजाय पहले दस्तावेजों की जांच का निर्देश दिया।
अदालत के मुख्य आदेश
कोर्ट के आदेश में कहा गया कि, प्रतिवादी संख्या 3 के पक्ष में जारी 21 अप्रैल, 2018 का नियुक्ति आदेश रद्द किया जाता है। अधिकारियों को एक महीने के भीतर संबंधित विश्वविद्यालय से याचिकाकर्ता की ग्रेजुएशन डिग्री की जांच करने का निर्देश दिया गया।
साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, “यदि प्रमाण पत्र असली पाया जाता है, तो 68% अंकों के साथ मेरिट में प्रथम आने वाली याचिकाकर्ता को नियुक्त किया जाना चाहिए। लेकिन यदि डिग्री फर्जी पाई जाती है, तो मेरिट लिस्ट में दूसरे स्थान (Serial No. 2) पर रहने वाले उम्मीदवार को नौकरी दी जाए।”
इसके अलावा, अदालत ने राज्य सरकार को सार्वजनिक रोजगार में पारदर्शिता बनाए रखने और भविष्य में इस तरह की धोखाधड़ी व कदाचार को रोकने के लिए एक मजबूत सिस्टम लागू करने के व्यापक निर्देश भी दिए।
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