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‘नल से जल’ का सच: गांधीनगर में टाइफाइड का कहर और गुजरात के ‘मॉडल’ पर उठते सवाल

| Updated: January 7, 2026 14:57

टाइफाइड का प्रकोप और CPCB की रिपोर्ट: क्या गुजरात में 'नल से जल' सिर्फ एक कागजी दावा है?

गांधीनगर/अहमदाबाद: गुजरात की राजधानी गांधीनगर इस समय दूषित पानी से फैलने वाले टाइफाइड के मामलों से जूझ रही है। अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती संख्या ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। लेकिन यह समस्या सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की हालिया रिपोर्ट्स ने पूरे राज्य की जल गुणवत्ता (Water Quality) को लेकर एक बेहद डरावनी तस्वीर पेश की है।

ये आधिकारिक आंकड़े सरकार की महत्वाकांक्षी ‘नल से जल’ योजना की सफलता के दावों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं, जिसका वादा हर घर तक साफ पानी पहुंचाना था।

दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर

एक तरफ जहां गांधीनगर में स्वास्थ्य अधिकारी टाइफाइड के प्रकोप के लिए दूषित जलापूर्ति को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ‘नल से जल’ योजना को गुजरात में एक सफलता की कहानी के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। सरकार का दावा है कि वह घर-घर तक सुरक्षित और पीने योग्य पानी पहुंचा रही है।

लेकिन केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की ‘घरेलू नल कनेक्शन कार्यक्षमता मूल्यांकन’ (Functionality Assessment of Household Tap Connections) रिपोर्ट सरकार के इन दावों की पोल खोलती नजर आती है। रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के मात्र 47 प्रतिशत घरों में ही नल से पीने योग्य (potable) पानी पहुंच रहा है। इसका सीधा मतलब है कि राज्य की आधी से ज्यादा आबादी आज भी असुरक्षित या बिना ट्रीट किए हुए पानी पर निर्भर है।

राजधानी और महानगरों का हाल बेहाल

हैरानी की बात यह है कि राज्य की राजधानी गांधीनगर में स्थिति और भी दयनीय है। ‘मॉडल स्टेट’ की राजधानी होने के बावजूद, यहाँ केवल 31.9 प्रतिशत घरों में ही नल के जरिए पीने योग्य पानी उपलब्ध है।

गुजरात के सबसे बड़े महानगर, अहमदाबाद का हाल भी कुछ अलग नहीं है। यहाँ यह आंकड़ा 46.1 प्रतिशत पर अटक गया है, जो यह दर्शाता है कि शहरी इलाके भी जल सुरक्षा (Water Security) से कोसों दूर हैं।

आदिवासी जिलों में स्थिति शून्य पर

ग्रामीण और आदिवासी इलाकों की स्थिति तो और भी भयावह है। रिपोर्ट के मुताबिक, दाहोद और बनासकांठा जैसे जिलों में एक भी घर (0%) ऐसा नहीं है जिसे नल कनेक्शन के जरिए पीने योग्य पानी मिल रहा हो। कई अन्य जिलों में भी नल से आने वाला पानी पीने के बुनियादी मानकों पर खरा नहीं उतरता, जिससे लोग रोज दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।

नेशनल रैंकिंग में फिसड्डी साबित हुआ गुजरात

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को और बढ़ा देते हैं। राष्ट्रीय जल गुणवत्ता सूचकांक (Water Quality Index) में गुजरात 30वें स्थान पर है, जो इसे देश के सबसे निचले पायदान वाले राज्यों में शामिल करता है। यह इंडेक्स पानी में ऑक्सीजन की मात्रा, पीएच लेवल और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया जैसे पैमानों पर तय होता है।

इस सूचकांक में गुजरात का कुल स्कोर सिर्फ 63 प्रतिशत है। गौर करने वाली बात यह है कि जल गुणवत्ता के मामले में गुजरात का प्रदर्शन पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे आर्थिक रूप से कमजोर माने जाने वाले राज्यों से भी खराब है।

30 साल की सत्ता और प्यासी जनता

यह पूरा परिदृश्य इसलिए और भी चिंताजनक हो जाता है क्योंकि गुजरात में पिछले तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी (BJP) सत्ता में है। इतने लंबे शासन के बावजूद, एक बड़े तबके के लिए साफ पीने का पानी अभी भी एक सपना बना हुआ है। टाइफाइड जैसी बीमारियों का फैलना यह साबित करता है कि शासन और बुनियादी ढांचा लोगों को जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत मुहैया कराने में विफल रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात के 33 में से 19 जिलों में पीने योग्य नल के पानी का कवरेज 50 प्रतिशत से भी कम है। यही कारण है कि मानसून और उसके बाद के मौसम में टाइफाइड, पीलिया, हैजा और डायरिया जैसी बीमारियों का खतरा मंडराता रहता है।

भ्रष्टाचार की आहट?

दाहोद में मनरेगा (MGNREGA) में हुए 70 करोड़ रुपये के घोटाले के बाद विपक्ष अब जल योजनाओं पर भी सवाल उठा रहा है। गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष अमित चावड़ा ने बार-बार यह आशंका जताई है कि अगर गुजरात में ‘नल से जल’ योजना की निष्पक्ष जांच की जाए, तो इसमें भी बड़े घोटाले सामने आ सकते हैं।

गांधीनगर में टाइफाइड के मौजूदा हालात और ये सरकारी रिपोर्ट्स एक चेतावनी की घंटी हैं। ये बताती हैं कि कागजी घोषणाओं और आम नागरिक की जिंदगी की हकीकत में कितना बड़ा फासला है। अगर समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो दूषित पानी राज्य के लोगों की सेहत के लिए सबसे बड़ा खतरा बना रहेगा।

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