अहमदाबाद: गुजरात में एशियाई शेरों का साम्राज्य अब गिर के जंगलों से बाहर भी तेजी से फैल रहा है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) और गुजरात वन विभाग ने शेत्रुंजी से हिंगोलगढ़ होते हुए रामपारा तक 150 किलोमीटर लंबे एक नए लॉयन कॉरिडोर की पहचान की है। यह खोज राजकोट जिले के हिंगोलगढ़ से सुरेंद्रनगर के रामपारा तक एक शेर के अकेले सफर के बाद संभव हो सकी। इस घटना ने गिर के बाहर शेरों के विस्तार और उनके नए रास्तों की संभावनाओं को पूरी तरह से उजागर कर दिया है।
इस नए कॉरिडोर की अहमियत नवंबर 2019 की एक घटना से जुड़ी है। उस समय एक अकेला शेर अपने पारंपरिक गिर क्षेत्र से लगभग 100 किलोमीटर दूर रामपारा की ओर निकल गया था। वन अधिकारियों के मुताबिक, हालांकि उस शेर ने वहां अपना स्थायी ठिकाना नहीं बनाया, लेकिन इस हलचल ने यह साबित कर दिया कि शेर नए इलाके, शिकार और उपयुक्त रहवास की तलाश में इस पूरे क्षेत्र को आसानी से पार कर सकते हैं।
अब शेत्रुंजी-हिंगोलगढ़ और हिंगोलगढ़-रामपारा हिस्सों को गुजरात के 11 प्रमुख लॉयन कॉरिडोर में आधिकारिक तौर पर शामिल कर लिया गया है। हाल ही में राज्यसभा सांसद परिमल नाथवानी के एक सवाल के जवाब में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भी इसकी पुष्टि की है। मंत्रालय ने बताया कि डब्लूआईआई (WII) के अध्ययन में राज्य के अंदर 11 प्रमुख कॉरिडोर की पहचान की गई है। ये दोनों नए हिस्से मिलकर गिर के बाहर शेरों की सुरक्षित आवाजाही का एक बहुत बड़ा रूट तैयार करते हैं।
उस ऐतिहासिक साइटिंग के करीब सात साल बाद वन विभाग ने शेत्रुंजी-हिंगोलगढ़-रामपारा कॉरिडोर को पूरी तरह से चिह्नित कर लिया है। विभाग और डब्लूआईआई के अध्ययन इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जैसे-जैसे एशियाई शेरों की आबादी और उनका भौगोलिक दायरा बढ़ रहा है, यह मार्ग उनके भविष्य के विस्तार के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण इलाका बनकर उभर सकता है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) जयपाल सिंह ने बताया कि 2019 की उस घटना ने इस क्षेत्र की भूमिका को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया था। अब जसदण और राजकोट जैसे नए इलाकों में भी शेर देखे जा रहे हैं, जिससे यह क्षेत्र एक प्राकृतिक कॉरिडोर के रूप में विकसित हो रहा है। उन्होंने साफ किया कि इस मार्ग पर न सिर्फ शेरों के शिकार (प्रे बेस) पर नजर रखी जा रही है, बल्कि उनके रहवास के लिए रास्ते में ‘विर्डी’ (घास के मैदान) भी विकसित किए जा रहे हैं। वन विभाग इस प्राकृतिक मार्ग में किसी भी तरह की बाधा बर्दाश्त नहीं करेगा।
अधिकारियों का कहना है कि रामपारा विर्डी-चोटिला क्षेत्र में घास के मैदानों के साथ-साथ नीलगाय और जंगली सूअर जैसे शिकार पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। यहां का खुला इलाका और अर्ध-प्राकृतिक रहवास नए शेरों, विशेषकर युवा (सब-एडल्ट) नर शेरों को अपना नया ठिकाना बसाने में बहुत मदद कर सकता है।
केंद्र सरकार ने भी यह माना है कि एशियाई शेर अपने फैलाव के दौरान प्राकृतिक और अर्ध-प्राकृतिक आवासों का उपयोग करते हैं। इससे पहले भी आपस में जुड़े हुए ऐसे ही प्राकृतिक आवासों ने शेरों को गिर से निकलकर मितियाला, पानिया, गिरनार और हाल ही में बरड़ा तक पहुंचने में मदद की है।
वन अधिकारियों के अनुसार पूरे सौराष्ट्र में शेरों के बढ़ते दायरे के कारण इस कॉरिडोर की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। सरकार का अनुमान है कि वर्तमान में लगभग 35,000 वर्ग किलोमीटर में फैले शेरों का यह दायरा साल 2047 तक बढ़कर करीब 50,000 वर्ग किलोमीटर तक पहुंच सकता है।
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