26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर गुजरात के जाने-माने लोक संगीतकार मीर हाजीभाई कासमभाई राठौड़ को भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा गया। लेकिन इसके ठीक एक दिन बाद ही, जूनागढ़ के जिस गांव में वे रहते हैं, वहां की वोटर लिस्ट में उनके नाम पर एक स्थानीय राजनीतिक नेता ने आपत्ति जता दी। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के इस सदस्य का आरोप था कि राठौड़ इस गांव के मूल निवासी नहीं हैं।
हालांकि, मतदाता सूची से अचानक नाम कटने का खतरा झेलने वाले राठौड़ अकेले नहीं हैं।
भारत के कई मतदाताओं को ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का कहना है कि यह प्रक्रिया विभिन्न राज्यों में वोटर लिस्ट को अपडेट करने के लिए है, लेकिन इसके विपरीत यह एक तीखी बहस का मुद्दा बन गया है कि कैसे यह पूरी कवायद वोटरों को सूची से बेदखल कर रही है।
घरों के साथ-साथ वोटरों को भी किया जा रहा बेदखल
नवंबर 2025 में, अहमदाबाद नगर निगम (AMC) ने पुलिस के साथ मिलकर अहमदाबाद की इसनपुर झील के पास अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए एक बड़ा ‘मेगा डिमोलिशन ड्राइव’ (विध्वंस अभियान) चलाया।
अहमदाबाद नगर निगम (AMC) के आंकड़े:
- कुल सरकारी जमीन: 96,000 वर्ग मीटर (झील के पास)।
- अतिक्रमण वाली जगह: कुल जमीन का लगभग 30% (28,800 वर्ग मीटर)।
- कार्रवाई: नवंबर के इस अभियान में 925 अवैध आवासीय ढांचों को गिराया गया।
यह शहर में इस तरह का दूसरा बड़ा अभियान था। इससे पहले अप्रैल 2025 में, स्थानीय प्रशासन ने चंदोला झील क्षेत्र के आसपास लगभग 1.25 लाख वर्ग मीटर जमीन से कथित अतिक्रमण हटाया था।
लेकिन, इसनपुर क्षेत्र में घरों को तोड़ने और कथित अतिक्रमणकारियों को हटाने के साथ-साथ, वहां रहने वाले स्थानीय लोगों का जीवन भी बिखर गया—और इसके परिणामस्वरूप, उनके वोट भी।
अहमदाबाद के आरटीआई (RTI) और चुनाव सुधार कार्यकर्ता संतोष सिंह राठौड़ इस डिमोलिशन की टाइमिंग पर सवाल उठाते हैं। इसनपुर में विस्थापित हुए लोगों से लगातार बात कर रहे राठौड़ बताते हैं कि कम से कम दो दशकों के बाद SIR प्रक्रिया की जा रही है, लेकिन इसके कुछ नियम और दिशानिर्देश हैं जिनका पालन होना चाहिए।
राठौड़ ने चुनाव आयोग से 2002 के SIR दिशानिर्देशों की जानकारी RTI के जरिए मांगी थी। इससे खुलासा हुआ कि 2002 के रिवीजन में मतदाताओं को यह साबित करने की जरूरत नहीं थी कि उनका नाम पिछली सूचियों (जैसे 1995 की SIR) में था या नहीं। वर्तमान SIR की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) के बजाय खुद मतदाताओं पर ज़िम्मेदारी डालता है और 2002 की सूची में होने का प्रमाण मांगता है, जबकि उस समय ऐसे किसी दस्तावेज़ की ज़रूरत ही नहीं थी।
द वायर से बात करते हुए राठौड़ ने कहा, “2002 के दिशा-निर्देशों में साफ था कि ब्लॉक-लेवल ऑफिसर (BLO) पलायन कर चुके लोगों का रिकॉर्ड रखेगा, उनके नए पते खोजेगा और यहां तक कि नए पते के BLO से बात करके पुष्टि भी करेगा। लेकिन इस बार हम देख रहे हैं कि अगर BLO के पास फॉर्म जमा नहीं किया गया है, तो आपका वोटर के तौर पर कोई अस्तित्व ही नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा, “अगर आप [मुख्य चुनाव आयुक्त] ज्ञानेश कुमार की प्रेस कॉन्फ्रेंस सुनें, तो उन्होंने डिमोलिशन को लेकर BLO द्वारा पालन किए जाने वाले दिशानिर्देशों पर कुछ नहीं कहा। SIR के दौरान डिमोलिशन की अनुमति नहीं होती है, लेकिन ECI ने ऐसी कोई गाइडलाइन जारी नहीं की। वोटरों का नामोनिशान मिटा दिया गया है। मतदाता सूची में लोगों को शामिल करने से ज्यादा उन्हें बाहर करने के प्रावधान हैं।”
राठौड़ के अनुसार, 2002 के जिन दिशानिर्देशों का उन्होंने हवाला दिया, वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि यदि कोर्ट के आदेश पर डिमोलिशन होता है और वह SIR प्रक्रिया के दौरान करना जरूरी हो, तो सरकार को बेघर हुए लोगों का पुनर्वास करना चाहिए और प्रशासन द्वारा उनका नया पता BLO के साथ साझा किया जाना चाहिए।
राठौड़ कहते हैं, “इस तोड़फोड़ को टाला जा सकता था। इसे SIR के दौरान करना जरूरी नहीं था। इसके कारण कई लोगों के नाम लिस्ट से गायब हो गए।”
क्या चुनाव आयोग के नियमों की अनदेखी हो रही है?
जिन भी क्षेत्रों में SIR की प्रक्रिया हुई, उनमें सबसे ज्यादा नाम गुजरात में काटे गए। यहाँ 68,12,711 मतदाताओं (Electors) को सूची से हटा दिया गया।
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) गुजरात की राज्य समन्वयक और सामाजिक कार्यकर्ता पंकती जोग ने कहा, “अनुपस्थित, मृत और शिफ्ट हो चुके लोगों की श्रेणी में यह बहुत बड़ा आंकड़ा है। यह कुल मतदाता सूची के 11.5% से लगभग 11% अधिक है।”
जोग ने बताया कि गुजरात के कई कार्यकर्ता चुनाव आयोग (ECI) को पत्र लिखकर मांग कर रहे हैं कि इन 68 लाख लोगों की पूरी लिस्ट सार्वजनिक की जाए और उन्हें अयोग्य, लापता, शिफ्ट हो चुके, अनुपस्थित और मृत जैसी श्रेणियों में वर्गीकृत करके दिखाया जाए।
जोग ने द वायर को बताया, “हम इस गणना के खुलासे की मांग कर रहे हैं। हम यह भी पूछ रहे हैं कि क्या SIR के दौरान ‘अनुपस्थित, शिफ्ट या मृत’ बताए गए लोगों को वेरिफाई करने की कोई प्रक्रिया अपनाई गई थी? क्या वे सच में वोटर बनने के योग्य नहीं हैं? यह फैसला कैसे लिया जा रहा है?”
क्या कहता है ECI का नियम?
जोग ने जानकारी दी कि ECI के नियमों के अनुसार, जब भी वोटर लिस्ट में 2% से ज्यादा नाम जुड़ते हैं या 2% से ज्यादा कटते हैं, तो ECI को सतर्क हो जाना चाहिए और क्रॉस-चेक करना चाहिए कि यह बदलाव वास्तविक है या नहीं।
उन्होंने समझाया, “SIR 2026 की पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी खामी यह है कि जो लोग किसी भी कारण से फॉर्म नहीं भर पाए, उनकी सत्यता जांचने का कोई तरीका नहीं है। चूंकि यह एक समय-सीमा वाली प्रक्रिया है, इसलिए फॉर्म न भर पाने के कई कारण हो सकते हैं—लोग वहां मौजूद नहीं थे, उनके घर तोड़ दिए गए थे, या वे पलायन कर गए।”
ज़िला स्तर के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी फॉर्म-6 (Form 6) को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जिन्हें गलती से लिस्ट से हटा दिया गया है, उन्हें अब खुद को जिंदा साबित करने और सूची में वापस जुड़ने के लिए फिर से फॉर्म 6 भरना होगा। हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए बार-बार सरकारी प्रक्रियाओं में उलझना बहुत भारी काम है, जिससे वे अंततः हार मानकर अपना वोटिंग अधिकार छोड़ सकते हैं।
भाजपा नेताओं पर थोक में आपत्तियां (Form 7) दर्ज करने का आरोप
गुजरात के कई इलाकों से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि मतदाता सूची से नाम कटवाने के लिए ‘फॉर्म 7’ (Form 7) का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। पीयूसीएल (PUCL) के महासचिव और माइनॉरिटी कोऑर्डिनेशन कमेटी, गुजरात के संयोजक मुजाहिद नफीस का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया में एक खास पैटर्न साफ नजर आता है।
नफीस ने द वायर से कहा, “ड्राफ्ट लिस्ट आने के बाद, मैंने देखा कि भाजपा नेताओं ने मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ थोक (Bulk) में आपत्तियां दर्ज कराईं। हालांकि, कई संगठनों द्वारा फॉर्म 7 को लेकर जागरूकता फैलाने की वजह से उनकी योजना पूरी तरह सफल नहीं हो पाई, फिर भी हमने अकबरनगर जैसे इलाकों में देखा कि 1200 वोटरों को ‘शिफ्टेड’ (स्थानांतरित) घोषित कर लिस्ट से हटा दिया गया। जिस तरह से भाजपा द्वारा एक साथ थोक में दर्ज की गई आपत्तियों को स्वीकार किया गया, वह दिखाता है कि ECI सरकार समर्थक ताकतों के साथ मिली हुई है।”
पद्मश्री से सम्मानित गायक मीर हाजीभाई कासमभाई भी उन मतदाताओं में शामिल थे जिन्हें बाहर करने की कोशिश की गई। जिस भाजपा पार्षद ने उनके नाम पर आपत्ति जताई थी, उसने बाद में अपनी आपत्ति वापस ले ली और मामला बंद हो गया।
हालांकि, कासमभाई इस आपत्ति के बारे में जानकर बेहद दुखी थे। उन्होंने कहा, “मुझे कई सरकारों द्वारा कई बार सम्मानित किया गया है; अपने ही नाम पर आपत्ति देखना बहुत अजीब और दुखद था।” द वायर से बात करते हुए उनके परिवार ने बताया कि इस आपत्ति के कारण उन्हें जो पुरस्कार मिलने की खुशी थी, वह फीकी पड़ गई।
जूनागढ़ नगर निगम के पार्षद अद्रेमान अलारखभाई पंजा ने भी ऐसी ही आपत्ति का सामना किया। उन्होंने कहा, “मैं एक निर्वाचित पार्षद हूं, फिर भी एक भाजपा नेता ने मेरा नाम कटवाने की कोशिश की। यह सब पूरी प्लानिंग के साथ हो रहा है।”
एक योजनाबद्ध साजिश?
गुजरात के कांग्रेस मुख्य प्रवक्ता मनीष दोशी ने थोक में आपत्तियां स्वीकार करने पर ECI के रवैये को “अंधापन” करार दिया। दोशी ने कहा, “आपत्तियां दर्ज करने के भी नियम होते हैं, कोई भी व्यक्ति 50 से अधिक आपत्तियां जमा नहीं कर सकता। फिर भी, हम देखते हैं कि एक ही व्यक्ति के नाम से सैकड़ों ‘फॉर्म 7’ जमा किए जा रहे हैं। हमने आपत्ति दर्ज करने के इस तरीके को लेकर ECI को पत्र लिखा है।”
दोशी ने आरोप लगाया कि यह एक केंद्रीकृत (Centralised) ऑपरेशन है, जो अगर साबित हो गया तो ECI के सभी नियमों के खिलाफ और गैरकानूनी होगा। उन्होंने गौर किया कि सभी आपत्तियां एक ही तरीके से टाइप और साइन की गई थीं, जो नाम कटवाने की एक सुनियोजित रणनीति की ओर इशारा करता है।
दोशी ने सवाल उठाते हुए दावा किया कि, “यह भविष्य के चुनाव परिणामों को बदलने के लिए एक बहुत ही सुसंगठित और पूर्व-नियोजित साजिश है। हमें यह भी देखने की जरूरत है कि SIR प्रक्रिया पूरी होने के ठीक बाद गुजरात के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को क्यों बदल दिया गया? हरीत शुक्ला का तबादला क्यों हुआ? ऐसे कई सबूत और कार्यप्रणाली हैं जो इशारा करते हैं कि यह एक बिना प्लानिंग वाली SIR थी जो भाजपा के अपने मंसूबों को पूरा कर सकती थी।”
बता दें कि 3 फरवरी को द वायर ने सूरत के सलाबतपुरा इलाके की भी एक विस्तृत रिपोर्ट की थी, जहां एक भाजपा पार्षद कथित तौर पर सैकड़ों मुस्लिम वोटरों को ‘मृत’ घोषित करने के लिए ‘फॉर्म 7’ का “दुरुपयोग” करता पाया गया था।
इन सब आरोपों पर टिप्पणी मांगे जाने पर, गुजरात भाजपा के प्रवक्ता अनिल पटेल ने कोई जवाब नहीं दिया।
(यह लेख मूल रूप से ‘द वायर’ में प्रकाशित हुआ था और इसे तरुशी अश्वनी द्वारा लिखा गया है।)
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