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‘पालक पनीर’ पर हुआ विवाद: दो भारतीय छात्रों ने अमेरिकी यूनिवर्सिटी से हर्जाने के तौर पर जीते 2,00,000 डॉलर

| Updated: January 16, 2026 14:55

लंच बॉक्स से शुरू हुई लड़ाई कोर्ट तक पहुंची: यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर को झुकना पड़ा, छात्रों को मिले 1.6 करोड़ रुपये और सम्मान के साथ वतन वापसी।

नई दिल्ली/बोल्डर: अक्सर कहा जाता है कि भोजन लोगों को जोड़ता है, लेकिन अमेरिका में एक भारतीय छात्र के लिए अपने देश का साधारण सा खाना, ‘पालक पनीर’, एक बड़े संघर्ष का कारण बन गया। 5 सितंबर, 2023 को जब 34 वर्षीय आदित्य प्रकाश यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के एंथ्रोपोलॉजी विभाग (Anthropology Department) में अपना लंच गर्म कर रहे थे, तो उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यह कृत्य उन्हें नस्लवाद (racism) का शिकार बना देगा।

आदित्य, जो वहां पीएचडी के लिए गए थे, माइक्रोवेव में अपना पालक पनीर गर्म कर रहे थे। उनका कहना है कि अचानक एक स्टाफ मेंबर उनके पास आईं और खाने की “तेज गंध” (smell) की शिकायत करते हुए उन्हें माइक्रोवेव इस्तेमाल करने से मना कर दिया। आदित्य ने उस समय अपना आपा नहीं खोया और दृढ़ता से अपना पक्ष रखते हुए कहा, “यह सिर्फ खाना है। मैं इसे गर्म करके यहाँ से जा रहा हूँ।”

2,00,000 डॉलर का समझौता और डिग्री की जीत

यह मामला सिर्फ एक बहस पर खत्म नहीं हुआ। भेदभाव और मानसिक प्रताड़ना के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ने के बाद, सितंबर 2025 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने आदित्य प्रकाश और उनकी साथी पीएचडी छात्रा, उर्मी भट्टाचार्य के साथ समझौता कर लिया।

समझौते के तहत यूनिवर्सिटी ने दोनों को कुल 2,00,000 डॉलर (लगभग 1.6 करोड़ रुपये) का भुगतान किया और उन्हें उनकी मास्टर डिग्री भी प्रदान की। हालाँकि, समझौते में यह शर्त भी थी कि वे भविष्य में विश्वविद्यालय में नामांकन या रोजगार नहीं पा सकेंगे। इस महीने, प्रकाश और भट्टाचार्य हमेशा के लिए भारत लौट आए हैं।

सिस्टमैटिक रेसिज्म और भेदभाव के आरोप

“सिस्टमैटिक रेसिज्म” या संस्थागत नस्लवाद पर बात करते हुए आदित्य प्रकाश बताते हैं, “विभाग ने हमें वह मास्टर डिग्री देने से भी मना कर दिया था जो पीएचडी छात्रों को कोर्स के दौरान दी जाती है। यही वह मोड़ था जब हमने कानूनी रास्ता अपनाने का फैसला किया।”

कोलोराडो की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दायर दीवानी मुकदमे (civil lawsuit) में, दोनों छात्रों ने आरोप लगाया कि जब प्रकाश ने “भेदभावपूर्ण व्यवहार” के खिलाफ आवाज उठाई, तो यूनिवर्सिटी ने उनके खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई शुरू कर दी।

याचिका में एक विभागीय किचन पॉलिसी का भी जिक्र किया गया, जिसका असर विशेष रूप से दक्षिण एशियाई जैसे जातीय समूहों पर पड़ा। इस वजह से कई भारतीय छात्र साझा जगहों (shared spaces) पर अपना टिफिन खोलने से भी कतराने लगे थे।

प्रकाश और भट्टाचार्य ने अपनी याचिका में कहा कि इस भेदभाव और लगातार बदले की कार्रवाई ने उन्हें “भावनात्मक संकट, मानसिक पीड़ा और कष्ट” में डाल दिया था।

विश्वविद्यालय का पक्ष

इस पूरे मामले पर यूनिवर्सिटी की प्रवक्ता डेबरा मेंडेज़-विलसन ने एक बयान में कहा, “विश्वविद्यालय वादियों के साथ एक समझौते पर पहुंचा है, लेकिन किसी भी दायित्व (liability) से इनकार करता है। भेदभाव और उत्पीड़न के आरोपों से निपटने के लिए विश्वविद्यालय के पास स्थापित प्रक्रियाएं हैं, और इस मामले में उन प्रक्रियाओं का पालन किया गया है। सीयू बोल्डर (CU Boulder) छात्रों, संकाय और कर्मचारियों के लिए एक समावेशी वातावरण को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।”

नौकरी से हाथ धोना और उत्पीड़न

आदित्य प्रकाश का कहना है कि जब खाने को लेकर विवाद हुआ, तब वह पूरी तरह से फंडेड (fully funded) पीएचडी छात्र थे। उनके अनुसार, उत्पीड़न के तौर पर उन्हें अक्सर वरिष्ठ फैकल्टी के साथ बैठकों के लिए बुलाया जाता था और उन पर “स्टाफ को असुरक्षित महसूस कराने” का आरोप लगाया जाता था। मामला ‘ऑफिस ऑफ स्टूडेंट कंडक्ट’ तक भी पहुँचाया गया।

दूसरी ओर, उर्मी भट्टाचार्य का दावा है कि उन्हें बिना किसी चेतावनी या स्पष्टीकरण के उनकी टीचिंग असिस्टेंट (TA) की नौकरी से हटा दिया गया। हद तो तब हो गई जब घटना के दो दिन बाद, उर्मी और तीन अन्य छात्रों द्वारा भारतीय भोजन लाने पर उन पर कैंपस में “दंगा भड़काने” (inciting a riot) का आरोप लगाया गया।

हालांकि, उर्मी बताती हैं कि बाद में ‘ऑफिस ऑफ स्टूडेंट कंडक्ट’ ने इन शिकायतों को खारिज कर दिया था।

सपनों और संघर्ष की कहानी

भोपाल के रहने वाले प्रकाश और कोलकाता की 35 वर्षीय उर्मी भट्टाचार्य की पहली मुलाकात दिल्ली में हुई थी। दोनों ने अमेरिका में पीएचडी के लिए दाखिला लिया। उर्मी ने पहले यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया में सोशियोलॉजी में एडमिशन लिया था और बाद में कोलोराडो बोल्डर शिफ्ट हो गईं।

मध्यम वर्गीय परिवारों से आने वाले इन दोनों छात्रों के लिए यह एक बहुत बड़ा आर्थिक फैसला था। प्रकाश कहते हैं, “हमने अपनी सारी बचत इसमें लगा दी थी।”

पहला साल बिना किसी परेशानी के बीता; प्रकाश को ग्रांट्स मिलीं और वैवाहिक बलात्कार (marital rape) पर उर्मी की रिसर्च को भी सराहा गया। लेकिन उस एक घटना ने सब कुछ बदल दिया।

ब्रोकोली बनाम नस्लवाद

प्रकाश याद करते हैं कि उन्होंने तर्क देने की कोशिश की थी कि किचन एक कॉमन स्पेस है। उन्होंने कहा, “मेरा भोजन मेरा गर्व है। किसी को क्या महक अच्छी लगती है या बुरी, यह सांस्कृतिक रूप से निर्धारित होता है।”

जब विभाग के एक सदस्य ने तर्क दिया कि तेज गंध के कारण ब्रोकोली को गर्म करना भी मना है, तो प्रकाश ने जवाब दिया, “संदर्भ मायने रखता है। आप ऐसे कितने लोगों को जानते हैं जिन्हें ब्रोकोली खाने की वजह से नस्लवाद का सामना करना पड़ता है?”

राहत की बात यह रही कि एंथ्रोपोलॉजी विभाग के 29 साथी छात्र उनके समर्थन में आए और “भेदभावपूर्ण खाद्य नीतियों” की आलोचना की।

वापसी और नया आगाज़

मई 2025 में, दोनों ने संघीय नागरिक अधिकार मुकदमा दायर किया। जब तक समझौता हुआ, तब तक दोनों का मन अमेरिका से उचाट हो चुका था। प्रकाश कहते हैं, “वापस जाने का मतलब है उसी सिस्टम में दोबारा जाना और वीज़ा की वही अनिश्चितता झेलना। मैं खुद को वापस जाते हुए नहीं देख रहा।”

अब वे भारत में नई शुरुआत करने के लिए तैयार हैं। प्रकाश का मानना है कि उनकी जीत पैसों से ज्यादा स्वाभिमान की है।

वे कहते हैं, “अगर यह केस यह संदेश दे सके कि ‘फूड रेसिज्म’ (खाने को लेकर नस्लवाद) अब बिना किसी अंजाम के नहीं किया जा सकता, और हम भारतीय होने के नाते इसका डटकर मुकाबला करेंगे, तो यही असली जीत होगी।”

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