बिहार की सत्ता पर दो दशकों तक राज करने के बाद, नीतीश कुमार को अचानक राज्यसभा जाने का अपना पुराना सपना याद आ गया है। इस बड़े राजनीतिक कदम की टाइमिंग निश्चित रूप से बेहद दिलचस्प है।
जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) प्रमुख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर यह घोषणा करके सभी अटकलों पर विराम लगा दिया है कि वह मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने और राज्यसभा जाने का मन बना चुके हैं। उनके अनुसार, यह उनकी एक व्यक्तिगत संसदीय महत्वाकांक्षा की पूर्ति मात्र है, जिससे वह सांसद, विधायक और विधान पार्षद (MLC) रहने के बाद अपना राजनीतिक ‘चौका’ (quartet) पूरा कर लेंगे।
एक नपे-तुले संदेश में, जिसे एक तरह से बिना कहे विदाई लेने जैसा माना जा सकता है, नीतीश कुमार ने दो दशकों से अधिक समय तक उन पर भरोसा जताने के लिए बिहार की जनता का आभार व्यक्त किया। उन्होंने दावा किया कि राज्य विकास के नए मानदंड स्थापित कर रहा है और लोगों को यह आश्वासन भी दिया कि जनता के साथ उनका रिश्ता हमेशा कायम रहेगा, भले ही पटना में उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी न रहे।
राजनीतिक गणित और एनडीए का दबदबा
भावनात्मक बयानों से इतर जमीनी राजनीतिक गणित कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। नीतीश कुमार के उच्च सदन में जाने से मुख्यमंत्री की कुर्सी ऐसे समय में खाली होने जा रही है जब एनडीए ने हाल ही में बिहार विधानसभा चुनावों में 243 में से 202 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया है।
इस चुनाव के नतीजों में सबसे खास बात यह रही कि 89 सीटों के साथ भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जो जेडीयू की 85 सीटों के आंकड़े से आगे है। यह एक ऐसा समीकरण है जो अचानक से मुख्यमंत्री पद को मोलभाव के दायरे में लाकर खड़ा कर देता है।
राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया पहले से ही जोरों पर है। चुनाव आयोग द्वारा 26 फरवरी को अधिसूचना जारी की गई थी, नामांकन की प्रक्रिया आज (5 मार्च) समाप्त हो रही है, 6 मार्च को नामांकन पत्रों की जांच (स्क्रूटनी) होगी और 9 मार्च तक नाम वापस लिए जा सकेंगे।
नीतीश कुमार आज भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ अपना नामांकन दाखिल करने वाले हैं। बिहार में राज्यसभा की कुल पांच सीटों के लिए चुनाव होना है, जिनमें से जेडीयू के पास दो सीटें हैं और भाजपा के भी दो सीटों पर चुनाव लड़ने की उम्मीद है। एनडीए के पास मौजूद मजबूत संख्या बल को देखते हुए इस चुनाव के नतीजे लगभग तय माने जा रहे हैं।
दिल्ली की खामोशी और राजनीतिक फुसफुसाहटें
आधिकारिक बयानों से दूर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं काफी तेज हैं। कुछ नेताओं का मानना है कि राज्यसभा जाने की यह ‘इच्छा’ पूरी तरह से नीतीश कुमार का अपना निजी विचार नहीं भी हो सकती है, बल्कि यह भाजपा का एक कूटनीतिक इशारा हो सकता है, जिसके पास अब बिहार विधानसभा में अधिक ताकत है।
एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने वाइब्स ऑफ इंडिया को यहां तक बताया कि यह नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक सफर के ‘अंत की शुरुआत’ हो सकती है, क्योंकि उम्र और बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण उनका करियर पहले ही धीमा पड़ चुका है।
जैसा कि अमूमन होता है, पार्टी के वरिष्ठ नेता इन सभी चर्चाओं को सिरे से खारिज कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने इसे “होली का मजाक” करार देते हुए इस बात पर जोर दिया कि नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
चिराग पासवान ने भी इसी बात का समर्थन करते हुए कहा कि नेतृत्व परिवर्तन पर कोई चर्चा नहीं हो रही है और उन्होंने एनडीए की “डबल-इंजन सरकार” के काम की सराहना की। फिर भी, यह एक कड़वा सच है कि राजनीतिक दिल्ली बिना किसी ठोस इरादे के शायद ही कभी मजाक करती है।
मुख्यमंत्री पद की दौड़ और नए चेहरे
यदि नीतीश कुमार आधिकारिक तौर पर राज्यसभा का रुख करते हैं, तो बिहार के सबसे बड़े पद के लिए दौड़ तुरंत शुरू हो जाएगी। फिलहाल उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को इस रेस में सबसे आगे देखा जा रहा है, जबकि केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय के नाम की भी चर्चा जोरों पर है। इनके अलावा, संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवारों की सूची में उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा, बिहार के मंत्री दिलीप जायसवाल और दीघा से भाजपा विधायक संजीव चौरसिया के नाम भी शामिल हैं।
दूसरी तरफ, जहां नीतीश कुमार राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं, वहीं उनके बेटे निशांत कुमार के अपनी राजनीतिक पारी का आगाज करने की प्रबल संभावनाएं जताई जा रही हैं। निशांत लंबे समय तक लाइमलाइट से दूर रहे हैं, लेकिन अब माना जा रहा है कि वह बिहार के अगले उपमुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार हो सकते हैं।
परिवारवाद की राजनीति में एक नया अध्याय
यहीं से परिवारवाद की एक बेहद दिलचस्प तस्वीर उभरती है। कई रिपोर्टों से यह संकेत मिलता है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार, जिन्हें अब तक राजनीति से पूरी तरह अलग रखा गया था, आखिरकार सियासी अखाड़े में कदम रख सकते हैं और यहां तक कि उन्हें कैबिनेट में भी अहम जगह मिल सकती है।
यह उस नेता के लिए एक बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव होगा जिसने अपना पूरा जीवन वंशवादी राजनीति के खिलाफ बोलने में बिताया है।
सालों तक नीतीश कुमार ने बड़े गर्व के साथ अपने बेटे को इस बात के जीते-जागते प्रमाण के रूप में पेश किया था कि वह उस परिवारवाद की राजनीति से बिल्कुल अलग हैं जिसकी वह हमेशा आलोचना करते आए हैं। बीआईटी मेसरा (BIT Mesra) से इंजीनियरिंग कर चुके निशांत ने कभी कोई पारंपरिक करियर नहीं चुना और वह सार्वजनिक कार्यालयों से हमेशा दूर रहे।
उन्होंने चुनाव रैलियों और पार्टी कार्यालयों के शोरगुल से दूर एक बेहद शांत और निजी जीवन जिया, जिससे उनके पिता के इस दावे को हमेशा बल मिलता रहा कि उनके परिवार में राजनीति केवल उन्हीं तक सीमित रहेगी।
हालांकि, अब वह नैतिक उच्च भूमि थोड़ी डगमगाती हुई नजर आ रही है। हाल के महीनों में निशांत कुमार राजनीतिक समारोहों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई देने लगे हैं, जिससे यह अटकलें तेज हो गई हैं कि उन्हें जल्द ही जनता दल (यूनाइटेड) के जरिए राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रूप से उतारा जा सकता है।
यदि ऐसा होता है, चाहे वह कैबिनेट पद के माध्यम से हो या संगठन में किसी वरिष्ठ भूमिका के जरिए, तो यह उस नेता के लिए एक खामोश लेकिन स्पष्ट यू-टर्न होगा जिसने सालों तक दूसरों को परिवारवाद पर उपदेश दिए हैं।
बिहार की राजनीति में ऐसा लगता है कि बड़े-बड़े सिद्धांत भी अंततः अपनी उत्तराधिकार योजनाएं खुद ही विकसित कर लेते हैं। यह राजनीतिक विरासत के खिलाफ भाजपा के अपने उपदेशों की भी एक बड़ी परीक्षा होगी, खासकर यदि पार्टी चुपचाप उसी प्रथा को स्वीकार कर लेती है जिस पर वह नियमित रूप से दूसरे राजनीतिक दलों पर हमला करती आई है।
बिहार के सत्ता के इस बड़े खेल में, अक्सर आदर्श और सिद्धांत मुख्यमंत्रियों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
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