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गुजरात: जब जज बनीं ‘प्रिंसिपल’ और आरोपी के हाथ में थमाया गया खिलौना, तब जाकर 7 साल की मासूम को मिला न्याय

| Updated: January 21, 2026 14:43

वर्दी उतरी, जज बनीं 'प्रिंसिपल': राजकोट में 7 साल की बच्ची को ऐसे मिला 41 दिन में न्याय

राजकोट: अपराध जगत में कई बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो सिर्फ शरीर पर घाव नहीं देतीं, बल्कि इंसान की आत्मा को खामोश कर देती हैं। राजकोट जिले के आटकोट में 7 साल की बच्ची के साथ हुई दरिंदगी भी कुछ ऐसी ही थी। लेकिन, इस अंधेरे के बीच पुलिस, अभियोजन पक्ष और न्यायपालिका ने संवेदनशीलता, सूझबूझ और मानवता की जो मिसाल पेश की, उसने न केवल एक टूटी हुई बच्ची का भरोसा जीता, बल्कि महज 41 दिनों के भीतर दरिंदे को फांसी के फंदे तक पहुंचा दिया।

यह कहानी सिर्फ एक अपराध की सजा की नहीं है, बल्कि उस ‘खाकी’ और ‘कानून’ की है, जिसने न्याय के लिए वर्दी और काले कोट का त्याग कर दोस्ती का हाथ बढ़ाया।

खौफ ऐसा कि 6 दिन तक जुबान नहीं खुली

घटना 4 दिसंबर की है, जब 7 साल की मासूम का अपहरण कर उसके साथ लोहे की रॉड से क्रूरता की गई। बच्ची के शरीर पर गहरे जख्म थे, लेकिन उसके मन पर लगा घाव उससे भी गहरा था। वह इस कदर सहम गई थी कि घटना के बाद छह दिनों तक उसने एक शब्द भी नहीं बोला। पुलिस की वर्दी या वकील का काला कोट देखते ही वह कांप उठती थी।

आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर था और जांच आगे बढ़ाने के लिए बच्ची का बयान बेहद जरूरी था। राजकोट ग्रामीण पुलिस की सहायक पुलिस अधीक्षक (ASP) सिमरन भारद्वाज ने महसूस किया कि पारंपरिक पुलिसिया तरीका यहाँ काम नहीं करेगा। हैवान को पकड़ने के लिए पुलिस को पहले बच्ची का ‘दोस्त’ बनना होगा।

वर्दी उतरी, गाड़ी में भरी चॉकलेट्स

एएसपी सिमरन भारद्वाज ने जांच की शुरुआत सवालों से नहीं, बल्कि संवेदनाओं से की। उन्होंने अपनी वर्दी उतार दी और अपनी सरकारी गाड़ी को चॉकलेट से भर दिया। सादे कपड़ों में दो महिला पुलिसकर्मियों को बच्ची के साथ तैनात किया गया, जो चौबीसों घंटे साये की तरह उसके साथ रहीं। धीरे-धीरे बच्ची का डर कम हुआ और आंसुओं के बीच उसने उस डरावनी रात का सच बताना शुरू किया।

जब अदालत बनी ‘स्कूल’ और जज बनीं ‘प्रिंसिपल’

कानूनी चुनौती अभी बाकी थी। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज होना अनिवार्य था। पहली कोशिश में बच्ची इतना डर गई कि बयान नहीं दे सकी। तब अधिकारियों ने नियम-कायदों से ऊपर उठकर करुणा का रास्ता चुना।

पुलिस और अधिकारियों ने बच्ची को विश्वास दिलाया कि उसे एक नए स्कूल में एडमिशन के लिए ‘प्रिंसिपल मैम’ को इंटरव्यू देने जाना है। पुलिस उसे बाजार ले गई, नई स्कूल ड्रेस और बैग दिलाया गया। बच्ची ने उत्साह में अपनी पसंद से बाल भी बनवाए।

उधर, ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने भी अपनी भूमिका पूरी संवेदनशीलता से निभाई। वे कोर्ट रूम की जगह सादे कपड़ों में एक कमरे में ‘प्रिंसिपल’ बनकर बैठीं। करीब छह घंटे तक जज ने बच्ची के साथ खेल खेले, चॉकलेट्स साझा कीं और जब बच्ची को भूख लगी तो कार्यवाही रोककर पानी-पुरी का ब्रेक भी लिया गया। दिन के अंत तक, बच्ची ने खेल-खेल में दो पन्नों का महत्वपूर्ण बयान दर्ज करा दिया, यह सोचते हुए कि उसने स्कूल का इंटरव्यू पास कर लिया है।

खिलौने से हुई आरोपी की पहचान

आरोपी की पहचान (Test Identification Parade) के लिए भी पुलिस ने नायाब तरीका अपनाया। कोर्ट की अनुमति से ‘वल्नरेबल विटनेस डिपोजिशन सेंटर’ (VWDC) का उपयोग किया गया, जहाँ वन-वे मिरर के जरिए बच्ची आरोपी को देख सकती थी, लेकिन आरोपी उसे नहीं।

एएसपी भारद्वाज ने बताया कि बच्ची का डर खत्म करने के लिए कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने लाइन में खड़े सभी पुरुषों, यहां तक कि आरोपी के हाथ में भी खिलौने थमा दिए। जब बच्ची से पूछा गया, तो उसने आरोपी को ‘अपराधी’ के रूप में नहीं, बल्कि “उस आदमी के रूप में पहचाना जिसके हाथ में वह विशेष खिलौना था।”

कोर्ट परिसर से हटा दी गई हर वर्दी

अंतिम चुनौती थी कोर्ट में गवाही। वकीलों और पुलिस की भीड़ बच्ची को फिर से डरा सकती थी। इसलिए पहले एक ‘मूट कोर्ट’ (नकली अदालत) बनाकर उसे और उसके परिवार को तैयार किया गया।

गवाही वाले दिन राजकोट कोर्ट ने अद्भुत समन्वय देखा। जांच अधिकारी से लेकर कोर्ट स्टाफ तक, सबने वर्दी और काले कोट हटा दिए। पुलिसकर्मियों को एक कमरे में बंद कर दिया गया और कॉरिडोर पूरी तरह खाली करा दिए गए। जब सब सामान्य हो गया, तब बच्ची को जज के चैंबर में ले जाया गया। इस सुरक्षित माहौल में उसने बिना डरे अपनी गवाही पूरी की।

41 दिनों में ऐतिहासिक फैसला

इन मानवीय प्रयासों और ठोस सबूतों के आधार पर, कोर्ट ने 32 वर्षीय आरोपी रामसिंग डूडवा को दोषी करार देते हुए एफआईआर दर्ज होने के महज 41 दिनों के भीतर फांसी की सजा सुनाई।

राजकोट ग्रामीण पुलिस अधीक्षक (SP) विजयसिंह गुर्जर ने बताया कि परिवार भी गहरे सदमे में था, इसलिए एक अलग टीम सिर्फ उन्हें संबल देने के लिए तैनात की गई थी। राजकोट पुलिस और न्यायपालिका की इस पहल ने साबित कर दिया कि न्याय सिर्फ कानून की किताबों से नहीं, बल्कि दिल से भी किया जा सकता है।

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