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‘लोग मुझे अफ्रीकन कहते थे’: तानों को ताकत बनाकर एशियन गेम्स तक पहुंचने वाले जुडोका रोहित मजगुल की कहानी

| Updated: February 27, 2026 13:05

गुजरात के 'मिनी अफ्रीका' जांबुर से निकलकर एशियन और कॉमनवेल्थ गेम्स तक का सफर तय करने वाले 21 वर्षीय रोहित मजगुल ने नस्लीय टिप्पणियों और घोर गरीबी को हराकर रचा है नया इतिहास।

भारत के उभरते हुए जुडो चैंपियन रोहित मजगुल के दिल में आज भी एक गहरी टीस है। वह कहते हैं, “लोग मुझे अफ्रीकी समझते हैं।” उनकी किशोरावस्था की एक घटना आज भी उनके जहन में ताजा है। यह साल 2019 की बात है, जब रोहित ने गुजरात के नडियाद में आयोजित नेशनल अंडर-17 चैंपियनशिप के फाइनल में जगह बनाई थी।

उनके चचेरे भाई और पूर्व जुडोका अफरुदीन चोवत याद करते हुए बताते हैं, “जब वह मुकाबले के लिए तैयार हो रहा था, तो कुछ लोगों ने उस पर नस्लीय टिप्पणियां कीं और उसे ‘अफ्रीकन’ कहकर पुकारने लगे।”

रोहित के लिए इस तरह के तंज कोई नई बात नहीं थे। वह खुद बताते हैं, “मेरे घुंघराले बालों और रूप-रंग की वजह से पूरी जिंदगी मुझे अलग-अलग नामों से बुलाया गया। कभी लोग गाली के तौर पर, तो कभी सिर्फ चिढ़ाने के लिए ऐसा करते थे।”

उस दिन नडियाद में वह काफी आहत हुए थे। उन्हें बहुत बुरा लगा था, लेकिन उनके कुछ अच्छे दोस्तों ने उन्हें इन सब बातों को नजरअंदाज कर सिर्फ अपने खेल पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी। रोहित ने उस टूर्नामेंट में ‘बेस्ट जुडोका’ का खिताब जीता और खुद से एक वादा किया।

चोवत बताते हैं, “रोहित ने हमसे कहा था कि एक दिन ऐसा आएगा जब लोग मेरे साथ फोटो खिंचवाना चाहेंगे।”

आज सात साल बाद, 21 वर्षीय यह खिलाड़ी सिद्दी समुदाय से इस वर्ष के कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स के लिए क्वालीफाई करने वाला पहला एथलीट बन गया है। पिछले हफ्ते नई दिल्ली में हुए सिलेक्शन ट्रायल्स के बेहद रोमांचक ‘बेस्ट-ऑफ-थ्री’ फाइनल में, रोहित ने -66 किलोग्राम वर्ग में हरियाणा के गर्वित हुड्डा को मात दी।

अपनी इस शानदार जीत के बाद उन्होंने जश्न मनाने में समय बर्बाद नहीं किया। अपना स्थान पक्का करते ही, यह नेशनल चैंपियन ट्रेनिंग के लिए जॉर्जिया के त्बिलिसी रवाना हो गया। वहां की कड़ाके की ठंड के बीच, इन दिनों उन्हें घर की बहुत याद सता रही है और वह एक साधारण सी थाली—दाल, चावल, कचुम्बर और छाछ के लिए तरस रहे हैं। यह विचार उन्हें मीलों दूर उनके घर की याद दिलाता है। इसके बावजूद, वह किसी और जगह नहीं जाना चाहते। वह धीमी आवाज में कहते हैं, “यह जगह मुझे याद दिलाती है कि मैं कितनी दूर आ गया हूं। बहुत दूर।”

और वाकई उनकी यह यात्रा बहुत लंबी रही है। गिर के जंगलों के बीच बसा उनका गांव जांबुर—जिसे अक्सर ‘मिनी-अफ्रीका’ भी कहा जाता है—भारत के खेल मानचित्र पर बमुश्किल ही नजर आता है। यह गांव सिद्दी समुदाय का घर है, जिनकी जड़ें मूल रूप से अफ्रीका से जुड़ी हैं। यहां के ज्यादातर पुरुष दिन में मजदूरी करते हैं और शाम को पर्यटकों के लिए आसपास के होटलों में पारंपरिक नृत्य करते हैं। रोहित के पिता बशीर और उनके चचेरे भाई भी परिवार का भरण-पोषण करने के लिए यही काम करते हैं।

करीब 300 साल पहले पुर्तगालियों द्वारा जूनागढ़ के राजा के लिए काम करने भारत लाए गए सिद्दी समुदाय के लोगों की शारीरिक क्षमता को खेलों में इस्तेमाल करने की कोशिश 1980 के दशक के अंत से ही हो रही है। ‘स्पेशल एरिया गेम्स’ प्रोजेक्ट के जरिए एथलेटिक्स और मार्शल आर्ट्स में इनकी प्रतिभा निखारने का प्रयास किया गया। इसी योजना से 1993 के ढाका साउथ एशियन गेम्स में 100 मीटर बाधा दौड़ में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली कमला सिद्दी जैसी एथलीट निकलीं।

हालांकि, यह कार्यक्रम कोई बहुत बड़ा सितारा पैदा करने में विफल रहा। इन सब से निराश हुए बिना, रोहित के चाचा हेदूभाई ने अपने भतीजे को एथलेटिक्स में हाथ आजमाने के लिए प्रेरित किया।

हेदूभाई बताते हैं, “इस गांव में उसका कोई भविष्य नहीं था। घर में ढंग का बिस्तर या पीने का साफ पानी तक नहीं था। उसने बेहद गरीबी देखी है। मैं खुद एक एथलीट था और मेरे बेटों को सरकारी खेल योजनाओं का फायदा मिला, जिससे उन्हें स्पोर्ट्स कोटा के तहत नौकरी मिली। इसलिए मैंने रोहित को भी खेलों की ओर मोड़ने का फैसला किया।”

रोहित ने भी इस मौके को पूरी गंभीरता से लिया, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि यह उनकी जिंदगी बदल सकता है। 9वीं कक्षा में ही उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था। वह हंसते हुए कहते हैं, “मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं था, लेकिन खेल के जरिए कुछ हासिल करने की संभावना ज्यादा थी।”

शुरुआत में उन्होंने 400 मीटर दौड़ में किस्मत आजमाई, लेकिन एक कोच की सलाह पर उन्होंने जुडो अपना लिया। गुजरात में रहने वाले सिद्दियों के बीच आज यह खेल काफी लोकप्रिय है। यहीं से उनके खानाबदोश एथलीट जीवन की शुरुआत हुई। गुजरात सरकार की डिस्ट्रिक्ट लेवल स्पोर्ट्स स्कूल योजना का लाभ उठाते हुए वह दाहोद, जूनागढ़, नडियाद और अब अहमदाबाद के हॉस्टलों में रहकर ट्रेनिंग ले रहे हैं।

अहमदाबाद के ‘विजयी भारत फाउंडेशन’ में पिछले पांच सालों से रोहित को ट्रेनिंग दे रहे उनके जुडो कोच आकाश ठाकोर कहते हैं, “सिद्दी समुदाय के एथलीट्स में सहनशक्ति और ताकत जन्मजात होती है। उनका जुझारूपन भी गजब का होता है। कॉम्बैट स्पोर्ट्स (लड़ाकू खेलों) में ये सारी खूबियां बहुत काम आती हैं।”

शुरुआती दिनों में कदम-कदम पर रोहित को एहसास दिलाया गया कि वह “अलग” हैं—लोगों की उत्सुकता, फुसफुसाहटें, घूरती नजरें और नस्लीय तंज इसका हिस्सा थे। लेकिन हर बाधा ने उनके इरादों को और मजबूत कर दिया और उन्होंने खुद से किया अपना वादा निभाया।

रोहित ने आगे चलकर एशिया-पैसिफिक यूथ गेम्स और कॉमनवेल्थ यूथ चैंपियनशिप में मेडल जीते। सीनियर लेवल पर आते ही उन्होंने घरेलू स्तर पर अपना दबदबा कायम किया और दिसंबर 2025 में नेशनल चैंपियनशिप का गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स के लिए उनका क्वालीफाई होना सिर्फ एक खेल की उपलब्धि से कहीं बढ़कर है। रोहित जानते हैं कि वह सिर्फ पदकों के लिए नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि उनके कंधों पर उनके गांव और पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व है।

वह कहते हैं, “मैंने कभी इसके बारे में नहीं सोचा था। जब मैंने जुडो खेलना शुरू किया, तो मैं बस इन बड़े टूर्नामेंट्स में हिस्सा लेने की कल्पना करता था। अब जब मैं यहां पहुंच गया हूं, तो मुझे उम्मीद है कि मैं अपने समुदाय और अपने लोगों के बारे में जागरूकता बढ़ा सकूंगा।”

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