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ट्रंप की H-1B वीजा नीति के बाद अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ नफरत बढ़ी, FedEx और Walmart जैसी दिग्गज कंपनियां निशाने पर

| Updated: January 15, 2026 16:10

अमेरिका में भारतीयों को बताया जा रहा 'नौकरी चोर', 1 लाख डॉलर हुई वीजा फीस; FedEx CEO पर हुए नस्लीय हमले, जानें क्यों बिगड़े हालात।

वाशिंगटन: अमेरिका में H-1B वीजा नियमों में हुए हालिया बदलावों के बाद भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी कंपनियों के खिलाफ माहौल तनावपूर्ण हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा कुशल कामगारों (Skilled Workers) के लिए वीजा प्रणाली में किए गए फेरबदल के बाद से भारतीय मूल के लोगों के प्रति शत्रुता में वृद्धि देखी जा रही है।

फाइनेंशियल टाइम्स के हवाले से विशेषज्ञों के अनुसार, इस नए बदलाव ने न केवल आप्रवासियों के लिए मुश्किलें बढ़ाई हैं, बल्कि FedEx, Walmart और Verizon जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियों को भी ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार बना दिया है।

सोशल मीडिया पर इन कंपनियों पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वे अमेरिकी नागरिकों की जगह अवैध रूप से भारतीय कामगारों को नौकरियां ‘बेच’ रही हैं।

1 लाख डॉलर की फीस और सख्त नियम

इस तनाव की मुख्य वजह सितंबर में ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B वीजा कार्यक्रम में किए गए नीतिगत संशोधन हैं। नए ढांचे के तहत, अब आवेदकों को 1,00,000 डॉलर (एक लाख डॉलर) की भारी-भरकम आवेदन फीस का सामना करना पड़ रहा है।

इसके साथ ही, चयन प्रक्रिया में भी बदलाव किया गया है, जिसमें अब ज्यादा वेतन वाले पदों को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रशासन ने इन सख्त कदमों का बचाव करते हुए तर्क दिया है कि यह “अमेरिकी श्रमिकों की सुरक्षा” के लिए आवश्यक है।

हालात फरवरी से और अधिक कठिन होने की उम्मीद है। अमेरिकी अधिकारी अब सबसे अधिक भुगतान पाने वाले उम्मीदवारों (जिन्हें Level-IV H-1B आवेदक के रूप में वर्गीकृत किया गया है) के पक्ष में नीतियां लागू करने की तैयारी में हैं। इससे कई कुशल प्रवासियों के लिए योग्यता हासिल करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

‘नौकरी चोर’ और ‘वीजा स्कैमर’ जैसे शब्दों से हमले

जैसे ही ये नियम लागू हुए, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर नफरत की बाढ़ आ गई। ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट’ के कार्यकारी निदेशक रकीब नाइक के अनुसार, इनमें से कई हमले सुनियोजित अभियानों का हिस्सा लगते हैं। उन्होंने बताया कि सरकार समर्थित ‘स्मॉल बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन’ से ऋण प्राप्त करने वाले भारतीय-अमेरिकी उद्यमियों को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें परेशान किया जा रहा है।

नाइक ने चेतावनी दी है कि भेदभाव अब खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है, जहां भारतीयों को लगातार “नौकरी चोर (Job stealers)” और “वीजा स्कैमर” के रूप में चित्रित किया जा रहा है।

धमकियों में भारी उछाल: क्या कहते हैं आंकड़े?

एडवोकेसी ग्रुप ‘स्टॉप AAPI हेट’ और आतंकवाद विरोधी फर्म ‘मूनशॉट’ के विश्लेषण ने इस चिंताजनक स्थिति की पुष्टि की है। उनके आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल नवंबर में दक्षिण एशियाई समुदायों के खिलाफ हिंसा की धमकियों में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई। उसी अवधि के दौरान, ऑनलाइन अभद्र भाषा और नस्लीय टिप्पणियों (Slurs) के इस्तेमाल में 69% का भारी उछाल दर्ज किया गया।

यह शत्रुता ऐसे समय में बढ़ी है जब अमेरिका में भारतीय पेशेवरों का प्रवासन बढ़ रहा है। अमेरिकी कंपनियां घरेलू स्तर पर उम्मीदवारों की कमी को पूरा करने के लिए भारत से सॉफ्टवेयर डेवलपर्स, इंजीनियरों, डॉक्टरों और शोधकर्ताओं की भर्ती कर रही हैं।

वायरल वीडियो के बाद FedEx सीईओ बने निशाना

क्रिसमस से ठीक पहले एक क्षतिग्रस्त FedEx ट्रक का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद तनाव और भड़क गया। इस वीडियो के बाद FedEx के भारतीय मूल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), राज सुब्रमण्यम पर तीखे हमले शुरू हो गए। इंटरनेट पर वायरल हो रही पोस्ट्स में से एक में लिखा था, “हमारी महान अमेरिकी कंपनियों पर भारतीयों के कब्जे को रोको।”

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म गैब (Gab) के संस्थापक एंड्रयू तोर्बा सहित कई दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों ने सुब्रमण्यम पर आरोप लगाया कि उन्होंने श्वेत अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया और उनकी जगह भारतीय श्रमिकों को रख लिया।

आरोपों पर FedEx की सफाई

FedEx ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। कंपनी ने स्पष्ट किया कि उनके यहां भर्ती के निर्णय राष्ट्रीयता के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता (Merit) के आधार पर लिए जाते हैं।

कंपनी ने अपने बयान में कहा, “50 से अधिक वर्षों से, FedEx ने एक योग्यता-आधारित संस्कृति को बढ़ावा दिया है जो सभी के लिए अवसर पैदा करती है। हमें इस बात पर बहुत गर्व है कि इसके परिणामस्वरूप हमारे पास एक ऐसा कार्यबल है जो उन 220 से अधिक देशों और क्षेत्रों की विविधता का प्रतिनिधित्व करता है जहां हम सेवा देते हैं।”

DEI कार्यक्रमों में कटौती ने बढ़ाईं मुश्किलें

जानकारों का मानना है कि यह प्रतिक्रिया कॉर्पोरेट अमेरिका में हो रहे एक व्यापक बदलाव के बीच सामने आ रही है। पिछले एक साल में, दर्जनों कंपनियों ने रूढ़िवादी आलोचकों के दबाव में विविधता, समानता और समावेशन (DEI) की पहल को या तो कम कर दिया है या बंद कर दिया है। आलोचकों का तर्क था कि ये कार्यक्रम श्वेत अमेरिकियों के साथ अन्याय करते हैं।

पर्यवेक्षकों का कहना है कि DEI कार्यक्रमों की वापसी, सख्त आप्रवासन नियमों और नौकरियों को लेकर चल रही राजनीतिक बयानबाजी ने मिलकर एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया है, जहां भारतीय पेशेवर और व्यवसाय अब सीधे तौर पर निशाने पर हैं।

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