महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए शिक्षा में मुस्लिम आरक्षण से जुड़े एक दशक पुराने सरकारी प्रस्ताव (जीआर) को रद्द कर दिया है। इस फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। एक तरफ विपक्ष इसे ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ करार दे रहा है, तो दूसरी तरफ सत्ताधारी बीजेपी ने इसे कांग्रेस का चुनाव से पहले किया गया ‘तुष्टिकरण का स्टंट’ बताया है, जिसे कभी लागू ही नहीं किया गया।
क्या है पूरा मामला?
राज्य के सामाजिक न्याय विभाग ने मंगलवार को 2014 में जारी उस प्रस्ताव को वापस ले लिया, जिसके तहत लगभग 50 चिन्हित मुस्लिम समुदायों को ‘विशेष पिछड़ा वर्ग-ए’ (SBC-A) के तहत जाति सत्यापन और वैधता प्रमाण पत्र प्राप्त करने की अनुमति थी। इसके साथ ही शिक्षा में आरक्षण के दावे का आखिरी प्रशासनिक रास्ता भी आधिकारिक तौर पर बंद हो गया है।
इस कदम का बचाव करते हुए सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट ने कहा कि कांग्रेस ने सिर्फ मतदाताओं को लुभाने के लिए चुनाव से ठीक पहले इस कोटे की घोषणा की थी। उन्होंने तर्क दिया कि इसे लागू करने के लिए जरूरी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं कभी पूरी ही नहीं की गईं।
विपक्ष का कड़ा प्रहार
बुधवार को विपक्ष ने महायुति सरकार के इस फैसले पर तीखा हमला बोला।
एनसीपी (शरदचंद्र पवार), पार्टी ने कहा कि यह फैसला साबित करता है कि बीजेपी अपनी और अपनी सहयोगी पार्टियों में मौजूद मुस्लिम नेताओं की कोई कद्र नहीं करती। प्रवक्ता क्लाईड क्रास्टो ने कहा, “यह दर्शाता है कि इन मुस्लिम नेताओं को बीजेपी से कभी न्याय नहीं मिलेगा।”
एआईएमआईएम (AIMIM), पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद इम्तियाज जलील ने फैसले की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल नहीं चाहता कि मुस्लिम युवा पढ़-लिखकर आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) जैसे उच्च पदों तक पहुंचें।
कैसे उठी थी आरक्षण की मांग?
महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण की यह मांग 2008 में तब संस्थागत रूप लेने लगी थी, जब तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने राज्य में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी महमूद उर रहमान की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया।
पांच साल के गहन अध्ययन के बाद, इस समिति ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए:
- राज्य में लगभग 60 प्रतिशत मुस्लिम गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे।
- सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 4.4 प्रतिशत था।
- समुदाय के केवल 2.2 प्रतिशत लोग ही स्नातक (ग्रेजुएट) थे।
इस पिछड़ेपन को दूर करने के लिए पैनल ने राज्य के रोजगार, शिक्षा और आवास में 8 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी।
2014 का अध्यादेश और कानूनी लड़ाई
इन निष्कर्षों पर कार्रवाई करते हुए, जुलाई 2014 में कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया। इसमें सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मराठों के लिए 16 प्रतिशत और मुसलमानों के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया।
यह मुस्लिम कोटा पूरे समुदाय के लिए नहीं था। इसके लिए SBC-A श्रेणी बनाई गई, जिसमें मुख्य रूप से बुनकर, कसाई, तेल निकालने वाले और मछुआरे जैसे लगभग 50 सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदायों को शामिल किया गया।
इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। 14 नवंबर, 2014 को अदालत ने मराठा आरक्षण को तो खारिज कर दिया, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में मुसलमानों के लिए 5 प्रतिशत कोटे को हरी झंडी दे दी। बेंच ने स्पष्ट किया था कि राज्य के शिक्षण संस्थानों में 50% की आरक्षण सीमा से 5% ऊपर जाने के लिए ‘असाधारण परिस्थितियां’ मौजूद हैं। अदालत का मानना था कि मुस्लिम युवाओं को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के लिए यह कदम जरूरी है।
क्यों निष्प्रभावी हुआ कानून?
संवैधानिक समय सीमा के भीतर इस अध्यादेश को स्थायी कानून में नहीं बदला जा सका। राज्य में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद 23 दिसंबर, 2014 को यह अध्यादेश स्वतः ही समाप्त (lapse) हो गया। सरकार ने मराठा आरक्षण बहाल करने के लिए तो कानूनी रास्ते तलाशे, लेकिन मुस्लिम कोटे को बचाने के लिए कोई विधायी प्रयास नहीं किया।
महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (MVA) सरकार के सत्ता में आने के बाद यह मुद्दा कुछ समय के लिए फिर गरमाया। फरवरी 2020 में अल्पसंख्यक कार्य मंत्री नवाब मलिक ने विधान परिषद में कहा कि सरकार मुसलमानों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए एक कानून लाएगी। लेकिन एक हफ्ते के भीतर ही तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने साफ कर दिया कि ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
नए फैसले का क्या होगा असर?
ताजा सरकारी प्रस्ताव ने पिछली नीति से जुड़े सभी निर्देशों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया है। इसका सीधा मतलब है कि अब महाराष्ट्र में शिक्षा सहित किसी भी क्षेत्र में मुसलमानों के लिए SEBC या विशेष श्रेणी के तहत 5 प्रतिशत का कोई सक्रिय आरक्षण नहीं बचा है।
सपा विधायक रईस शेख ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “मुसलमानों को वैसे भी इस आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा था, इसलिए इस आदेश का जमीनी स्तर पर ज्यादा असर नहीं होगा। लेकिन यह स्पष्ट रूप से सत्ताधारी सरकार की उस राजनीतिक मंशा को दर्शाता है कि वह मुस्लिम आरक्षण के विचार का कितनी दृढ़ता से विरोध करती है।”
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