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2029 में विपक्ष का पीएम चेहरा बनेंगी ममता बनर्जी? जानिए क्या हैं इस दांव के राजनीतिक मायने

| Updated: February 23, 2026 16:31

क्या 2029 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की ओर से ममता बनर्जी प्रधानमंत्री पद का चेहरा होंगी? अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया के साथ समझिए इस बड़े राजनीतिक दांव के पीछे 2026 बंगाल चुनाव का असली खेल।

हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय बारू ने एक लेख में यह विचार रखा कि ममता बनर्जी प्रधानमंत्री पद की एक मजबूत और संभावित दावेदार हो सकती हैं। पत्रकार से राजनेता बनीं तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद सागरिका घोष ने भी उनके इस विचार का पुरजोर समर्थन किया है।

टीएमसी नेताओं के अलावा इस प्रस्ताव को डीएमके (DMK) और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) का भी साथ मिला है। हालांकि, लोकसभा में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (SP) ने इस मुद्दे पर बहुत सधी हुई प्रतिक्रिया दी है।

अखिलेश यादव का सतर्क रुख

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का मानना ​​है कि अभी 2029 के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के बारे में सोचना “जल्दबाजी” होगी। उनका स्पष्ट कहना है कि विपक्ष को अपनी मूल प्राथमिकताओं से भटकना नहीं चाहिए।

उन्होंने एक बातचीत में कहा, “सबसे पहले, हमें पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराना है। फिलहाल, हम किसी और चीज के बारे में नहीं सोच रहे हैं।”

अखिलेश नहीं चाहते कि किसी भी तरह की नई “राजनीतिक उलझनें” गैर-भाजपा दलों का ध्यान सत्तारूढ़ व्यवस्था से मुकाबले से हटाएं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि “इस मामले पर किसी ने भी हमसे संपर्क नहीं किया है।”

भले ही अखिलेश ने खुलकर कुछ न कहा हो, लेकिन ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के नेतृत्व जैसे संवेदनशील मुद्दे को सार्वजनिक रूप से सुलझाए जाने की गुंजाइश कम ही है, क्योंकि ऐसे फैसले आमतौर पर बंद दरवाजों के पीछे ही होते हैं। फिर भी, विपक्ष के एक बड़े धड़े को यह विचार इसलिए आकर्षित कर रहा है क्योंकि ममता को आगे करने से देश के महिला मतदाताओं के बीच एक मजबूत संदेश जाएगा, जो अब चुनावों में एक बेहद निर्णायक कारक बन चुकी हैं।

बिना किसी ‘गॉडफादर’ के शीर्ष तक का सफर

ममता बनर्जी उन गिने-चुने महिला राजनेताओं में से हैं, जिन्होंने जमीनी स्तर से शुरुआत कर अपनी एक अलग पहचान बनाई और जननेता के रूप में खुद को स्थापित किया। देश की ज्यादातर सफल महिला नेताओं के विपरीत, उन्होंने यह मुकाम बिना किसी राजनीतिक परिवार के बैकग्राउंड या किसी मेंटर (गॉडफादर) की मदद के हासिल किया है।

आप उनकी राजनीति को पसंद करें या नापसंद, लेकिन उनके राजनीतिक रिकॉर्ड को नकारा नहीं जा सकता। उनकी कुछ प्रमुख राजनीतिक उपलब्धियां इस प्रकार हैं:

  • दिग्गजों को दी मात: उन्होंने अपनी ही पूर्व पार्टी में प्रणब मुखर्जी और प्रियरंजन दासमुंशी जैसे कद्दावर नेताओं को पीछे छोड़ा।
  • टीएमसी की स्थापना: कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने 1998 में अपनी पार्टी बनाई और राज्य में कांग्रेस की जगह ली।
  • वामपंथ का किला ढहाया: पश्चिम बंगाल में 34 वर्षों से सत्ता पर काबिज वाम मोर्चे (Left Front) को उखाड़ फेंका।
  • भाजपा को रोका: इसके बाद से, वह दो विधानसभा और तीन लोकसभा चुनावों में तेजी से उभरती हुई भाजपा को भी सफलतापूर्वक पीछे धकेलने में कामयाब रही हैं।

ममता शुरू से ही एक जुझारू नेता के रूप में जानी जाती हैं। आपातकाल के दौरान एक युवा कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़कर विरोध प्रदर्शन करने का उनका वाकया आज भी लोगों को याद है। इसी तरह, वामपंथियों के इशारे पर पिटाई का आरोप लगाते हुए, पट्टियों में लिपटी हुई व्हीलचेयर पर बैठकर संसद में उनकी नाटकीय एंट्री ने भी खूब सुर्खियां बटोरी थीं।

राह के कांटे और चुनौतियां

हालांकि, ममता बनर्जी के सामने कुछ बड़ी राजनीतिक चुनौतियां भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता:

चुनौतियांविवरण
सीमित प्रभाव क्षेत्रममता की राजनीतिक पकड़ केवल एक राज्य (पश्चिम बंगाल) तक ही सीमित है। 2021 के बाद गोवा, मेघालय और त्रिपुरा जैसे राज्यों में उनका विस्तार अभियान असर छोड़ने में विफल रहा।
राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय चेहरापीएम पद की उम्मीदवार बनने पर उनका सीधा मुकाबला नरेंद्र मोदी से होगा, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्वीकार्यता हासिल है।
कांग्रेस का विरोधकांग्रेस नेता स्वाभाविक रूप से राहुल गांधी को पीएम पद का विकल्प मानते हैं, क्योंकि लोकसभा में कांग्रेस सबसे बड़ा विपक्षी दल है और उसकी अखिल भारतीय उपस्थिति है।

वैसे, किसी “एक राज्य” तक सीमित क्षेत्रीय नेता के राष्ट्रीय गठबंधन का नेतृत्व करने पर कोई पाबंदी नहीं है। साल 1996 में ऐसा हो चुका है जब कर्नाटक के पूर्व सीएम एच.डी. देवेगौड़ा बहुदलीय संयुक्त मोर्चे (United Front) की सरकार के प्रधानमंत्री बने थे, जिसे कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था। लेकिन वह चुनाव के बाद बना गठबंधन था और देवेगौड़ा भी ज्यादा दिन टिक नहीं पाए।

कई विपक्षी नेताओं का यह भी मानना ​​है कि अगर 2023 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन का पीएम चेहरा घोषित किया गया होता, तो वह शायद विपक्ष के साथ ही बने रहते। ऐसे में कुमार की जेडीयू (JD-U) बिहार में इंडिया गठबंधन को सीटों का बड़ा हिस्सा दिला सकती थी, जिससे 2024 में कुल आंकड़ा बहुमत के करीब पहुंच सकता था।

दिलचस्प बात यह है कि कथित तौर पर ममता ने ही नीतीश को इंडिया गठबंधन का नेता बनाने के प्रस्ताव पर रोक लगाई थी।

2029 का बहाना, बंगाल (2026) पर निशाना

आज की स्थिति में, इंडिया ब्लॉक एक चुनावी गठबंधन के बजाय एक साझा मंच अधिक है। पार्टियां द्विपक्षीय रूप से तय कर रही हैं कि वे चुनाव में किसके साथ जाएंगी। उदाहरण के लिए, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस (न कि इंडिया ब्लॉक) यह तय करेंगे कि 2027 के यूपी चुनावों में वे साथ लड़ेंगे या नहीं। ऐसे में अचानक पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, ममता को संभावित पीएम उम्मीदवार के रूप में क्यों पेश किया जा रहा है?

दरअसल, यह पूरा दांव बंगाल के इर्द-गिर्द घूमता है। ममता अब तक अपनी सामाजिक कल्याण योजनाओं, महिलाओं, अल्पसंख्यकों, बूथ-स्तरीय संगठन और एक सूक्ष्म ‘बंगाली उप-राष्ट्रवाद’ के दम पर जीतती आई हैं।

हाल ही में उन्होंने रामकृष्ण परमहंस (जिन्हें बंगाल में पूजा जाता है) के लिए “ठाकुर” के बजाय “स्वामी” शब्द का इस्तेमाल करने पर प्रधानमंत्री को तुरंत आड़े हाथों लिया था। इसके जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा “बाहरी” लोगों की पार्टी है, जो बंगाली संस्कृति को नहीं समझती।

पश्चिम बंगाल ने आज तक देश को कोई प्रधानमंत्री नहीं दिया है। 1996 में ज्योति बसु को इस पद की पेशकश की गई थी, लेकिन सीपीएम (CPI-M) पोलित ब्यूरो ने इसे रोक दिया था—एक ऐसा फैसला जिसे पूर्व सीएम ने बाद में “ऐतिहासिक भूल” बताया था। वहीं, कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी ने रक्षा से लेकर वित्त और विदेश मामलों तक के सभी शीर्ष विभाग संभाले, लेकिन उन्हें सर्वोच्च पद नहीं मिला।

सच कहा जाए तो, “ममता फॉर पीएम” का यह शिगूफा भारत या इंडिया ब्लॉक से ज्यादा पश्चिम बंगाल के बारे में है। 15 साल की सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency) का सामना कर रहीं ममता बनर्जी को 2026 के विधानसभा चुनावों में अपने पक्ष में नई ऊर्जा भरने के लिए केवल पुराने नारों से कुछ ज्यादा चाहिए। और पीएम पद की दावेदारी वाली यह चर्चा उसी नई ऊर्जा को पैदा करने का एक अचूक राजनीतिक हथियार है।

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