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शेयर बाजार में भारी गिरावट: दलाल स्ट्रीट पर हाहाकार, निवेशकों के 13 लाख करोड़ रुपये डूबे

| Updated: March 9, 2026 12:47

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से दलाल स्ट्रीट पर हाहाकार, शुरुआती कारोबार में ही सेंसेक्स और निफ्टी बुरी तरह धड़ाम।

सोमवार को दलाल स्ट्रीट का माहौल काफी बिगड़ गया और भारी बिकवाली के बीच शुरुआती कारोबार में ही प्रमुख सूचकांक बुरी तरह धराशायी हो गए। इस बड़ी गिरावट के पीछे मुख्य रूप से बढ़ते वैश्विक तनाव को जिम्मेदार माना जा रहा है।

सुबह 10:48 बजे तक, बीएसई सेंसेक्स 2,179.44 अंक (यानी 2.76%) का गोता लगाते हुए 76,739.46 के स्तर पर आ गया। इसी तरह, निफ्टी 50 भी 678.35 अंक लुढ़ककर 23,772.10 पर पहुंच गया। बाजार में इस भारी उथल-पुथल के कारण शेयर बाजार के निवेशकों को अपने मार्केट कैपिटलाइजेशन में 13 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का भारी नुकसान उठाना पड़ा है।

यह गिरावट निवेशकों की घटती उम्मीदों और घबराहट को दर्शाती है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं और विदेशी निवेशक भी भारतीय इक्विटी बाजार से तेजी से अपना पैसा बाहर निकाल रहे हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि बाजार में यह बिकवाली किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। शुरुआती कारोबार में बैंकिंग, आईटी और मेटल सेक्टर के शेयरों की सबसे ज्यादा पिटाई हुई।

निफ्टी 50 में शामिल प्रमुख कंपनियों के प्रदर्शन की बात करें तो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) में लगभग 6.7% की भारी गिरावट दर्ज की गई, जबकि इंटरग्लोब एविएशन (इंडिगो) के शेयर करीब 6.6% टूट गए। इसके अलावा मारुति सुजुकी, महिंद्रा एंड महिंद्रा और जेएसडब्ल्यू स्टील जैसे बड़े शेयरों में भी 5% से 5.2% के बीच की गिरावट देखी गई। लार्सन एंड टुब्रो, एशियन पेंट्स और टाटा स्टील भी 4% से अधिक फिसल गए, जो यह स्पष्ट करता है कि बाजार के सभी सेक्टर्स में व्यापक कमजोरी छाई हुई है।

मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव

शेयर बाजार में इस भारी गिरावट का एक सबसे बड़ा कारण मध्य पूर्व में लगातार गहराता संघर्ष है, जो हाल के दिनों में एक बेहद अस्थिर और विनाशकारी चरण में प्रवेश कर गया है। इन घटनाक्रमों ने न केवल वैश्विक स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति में संभावित बाधाओं का डर भी पैदा कर दिया है।

मास्टर कैपिटल सर्विसेज लिमिटेड के चीफ रिसर्च ऑफिसर डॉ. रवि सिंह ने बताया कि इस तेज होते संघर्ष ने दुनिया भर के बाजारों को हिलाकर रख दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय इक्विटी में मौजूदा उथल-पुथल के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, पहला कारण मध्य पूर्व के युद्ध का पिछले एक सप्ताह में अधिक विनाशकारी स्थिति में पहुंचना है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का खतरा मंडरा रहा है।

अक्सर देखा गया है कि भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में निवेशक जोखिम भरे शेयर बाजार से दूरी बना लेते हैं और सुरक्षित संपत्तियों की ओर रुख करते हैं। इसी का असर आज वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारतीय बाजार पर भी देखने को मिल रहा है।

कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल

बाजार की धारणा को कमजोर करने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण कारक कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी है। इस बात का डर सता रहा है कि युद्ध के कारण तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे वैश्विक स्तर पर इसकी उपलब्धता में कमी आएगी।

भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है, तेल की ये ऊंची कीमतें देश का आयात बिल बढ़ा सकती हैं और महंगाई को भी हवा दे सकती हैं। डॉ. सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि आपूर्ति पक्ष की चिंताओं के कारण इस सप्ताह कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 25% का भारी उछाल आया है। इस वृद्धि ने दुनिया भर के बाजारों में मुद्रास्फीति की चिंताओं को फिर से जगा दिया है।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट डॉ. वी. के. विजयकुमार ने चेतावनी दी है कि तेल की कीमतों में इस तेज उछाल के व्यापक आर्थिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जो अर्थव्यवस्थाओं और बाजारों के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। यदि पश्चिमी एशिया का यह संघर्ष लंबा खिंचता है और कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहती हैं, तो भारत जैसे बड़े तेल आयातकों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा।

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार निकासी

विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा लगातार की जा रही बिकवाली ने भी भारतीय शेयर बाजार पर अत्यधिक दबाव डाला है। बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता के बीच विदेशी फंड भारतीय शेयरों में अपना निवेश लगातार कम कर रहे हैं।

डॉ. रवि सिंह के मुताबिक, बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से लगातार निकासी जारी है, जो घरेलू इक्विटी पर गिरावट के इस दबाव को और अधिक बढ़ा रही है।

डॉ. विजयकुमार ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संघर्ष कब तक चलेगा, इसे लेकर बनी अनिश्चितता विदेशी निवेशकों को और अधिक सतर्क कर रही है। उनका मानना है कि अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह युद्ध कितनी अवधि तक चलेगा। फरवरी में कुछ समय की खरीदारी करने के बाद विदेशी निवेशक भारत में फिर से आक्रामक रूप से बिकवाली करने लगे हैं।

हालांकि, उन्होंने निवेशकों को आश्वस्त करते हुए यह भी जोड़ा कि इतिहास गवाह है कि युद्ध जैसे भू-राजनीतिक मुद्दों का बाजारों पर प्रभाव आमतौर पर लंबे समय तक नहीं रहता है। इसलिए, इस मुश्किल घड़ी में निवेशकों को धैर्य बनाए रखने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, घरेलू खपत से जुड़े सेक्टर्स जैसे बैंकिंग, फाइनेंशियल, ऑटोमोबाइल, टेलीकॉम और सीमेंट पर इस संकट का बहुत भारी असर पड़ने की संभावना नहीं है। इसके साथ ही, डिफेंस और फार्मास्युटिकल सेक्टर के स्टॉक्स अपेक्षाकृत मजबूत बने रह सकते हैं।

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अल्पावधि में बाजार में उतार-चढ़ाव का यह दौर जारी रह सकता है, क्योंकि निवेशक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेश के प्रवाह पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं।

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