12 जून 2025 का वह मनहूस दिन, जब अहमदाबाद में एयर इंडिया के विमान AI-171 के क्रैश ने 260 लोगों की जान ले ली और अनगिनत परिवारों को गहरे सदमे में छोड़ दिया। इन्हीं अभागे लोगों में 34 वर्षीय गुजराती फिल्म निर्माता महेश जीरावाला भी शामिल थे। उनकी मौत ने उनके प्रियजनों को नौ दिनों की खौफनाक अनिश्चितता में धकेल दिया।
महेश जीरावाला की कहानी इस बात का दर्दनाक उदाहरण है कि किस्मत कितनी क्रूर हो सकती है। वह उस बदकिस्मत एयर इंडिया फ्लाइट AI-171 में सवार भी नहीं थे, लेकिन फिर भी वह इस विमान हादसे का शिकार बन गए।
लंदन जाने वाले बोइंग 787 ड्रीमलाइनर में सवार यात्रियों के विपरीत, जब यह भयानक हादसा हुआ तब महेश जमीन पर थे। उस दोपहर महेश एक मीटिंग के बाद अपने स्कूटर से घर लौट रहे थे। अहमदाबाद एयरपोर्ट से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद, एयर इंडिया की फ्लाइट AI-171 अपनी ऊंचाई खो बैठी और मेघानीनगर में बीजे मेडिकल कॉलेज हॉस्टल कॉम्प्लेक्स से जा टकराई।
टकराते ही वहां आग का एक विशाल गोला उठ खड़ा हुआ। इस जोरदार टक्कर और उसके बाद लगी भीषण आग ने यात्रियों, क्रू मेंबर्स और जमीन पर मौजूद कई लोगों की जान ले ली। महेश ठीक उसी वक्त उस इलाके से गुजर रहे थे। पलक झपकते ही वह भारत की सबसे भीषण विमानन आपदाओं में से एक के जमीनी शिकार बन गए।

भय और दहशत की वह रात
महेश के परिवार को इस बात की भनक तक नहीं थी। जब महेश घर नहीं लौटे, तो रात ढलने के साथ ही परिवार की चिंता दहशत में बदल गई। उनका मोबाइल फोन नॉट रिचेबल हो गया। बार-बार की जा रही कॉल्स का कोई जवाब नहीं मिल रहा था।
जैसे-जैसे टीवी चैनलों पर जलते हुए मलबे की तस्वीरें दिखाई जा रही थीं, उनके रिश्तेदारों ने यह उम्मीद बांधनी शुरू कर दी कि शायद वह बच गए हों और उन्हें किसी अस्पताल में भर्ती कराया गया हो। परिवार यह नहीं जानता था कि वह मीटिंग के लिए कहां गए थे और किस रास्ते से लौटने वाले थे।
हालांकि, जब उनकी कॉल्स का कोई जवाब नहीं मिला, तो उनका शक डर में बदल गया। परिवार जानता था कि दूसरे इलाकों में जाते समय अक्सर बीजे मेडिकल कॉलेज उनके रास्ते में पड़ता था। फिर भी वे उम्मीद करते रहे। उन्होंने उनकी तलाश शुरू कर दी। जब वह नहीं मिले, तो उन्होंने एक-एक करके सभी अस्पतालों में खोजना शुरू किया।

सबूत और नौ दिन का खौफनाक इंतजार
बिना किसी जवाब के कई दिन बीत गए। जांचकर्ताओं ने बाद में परिवार को सूचित किया कि महेश का स्कूटर क्रैश ज़ोन के पास मिला है। उनके मोबाइल फोन की आखिरी लोकेशन भी इसी आपदा स्थल के करीब दर्ज की गई थी। इसके बाद सीसीटीवी फुटेज से यह भी साबित हो गया कि विमान दुर्घटनाग्रस्त होने से कुछ समय पहले उन्होंने वास्तव में उसी रास्ते से यात्रा की थी।
इन सबूतों के बावजूद कोई पुख्ता बात सामने नहीं आ रही थी। आग इतनी भयानक थी कि कई पीड़ितों के शव बुरी तरह जल चुके थे, जिससे उन्हें देखकर पहचान पाना असंभव हो गया था। इसलिए अधिकारियों को पीड़ितों की पहचान करने के लिए डीएनए (DNA) टेस्टिंग का सहारा लेना पड़ा।
महेश के परिवार ने भी अपने डीएनए सैंपल दिए और फिर शुरू हुआ एक दर्दनाक इंतजार। पूरे नौ दिनों तक, वे आशा और निराशा के बीच झूलते रहे। हर बजने वाला फोन किसी नई खबर की उम्मीद लेकर आता था। बीतता हुआ हर घंटा इस डर को और गहरा कर रहा था कि कहीं कोई अनहोनी न हो गई हो।
उन्हें लगा कि वह जिंदा होंगे, खासकर तब जब उन्हें पता चला कि एयर इंडिया की फ्लाइट में सवार एक यात्री लगभग बिना किसी चोट के मलबे से बाहर निकल आया था और जीवित था। महेश की मां बार-बार यही पूछती रहीं कि अगर विमान दुर्घटना का शिकार हुआ इंसान जीवित हो सकता है, तो उनका बेटा क्यों नहीं, जो तो उस विमान में था भी नहीं?

डीएनए मैच और टूटी उम्मीदें
आखिरकार 21 जून को, हादसे के नौ दिन बाद, फोरेंसिक विशेषज्ञों ने डीएनए मैच होने की पुष्टि कर दी। दुर्घटनास्थल से बरामद किए गए अज्ञात अवशेष महेश जीरावाला के ही थे। पुलिस ने साइट के पास से मिले जले हुए स्कूटर के इंजन और चेसिस नंबर का मिलान भी महेश के वाहन से कर लिया, जिससे किसी भी संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बची।
इस पुष्टि ने परिवार की हताश तलाश को तो खत्म कर दिया, लेकिन इससे एक और भी गहरे शोक की शुरुआत हुई। यह त्रासदी विशेष रूप से क्रूर थी क्योंकि महेश ने अपने जीवन के अंतिम महीने अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करने की कोशिश में बिताए थे।
अधूरा वादा जो मौत के बाद पूरा हुआ
दुर्घटना से ठीक दो हफ्ते पहले, उनके पिता गिरधरभाई कलावड़िया को दिल का दौरा पड़ा था। पेशे से हीरा मजदूर गिरधरभाई सर्जरी के बाद काम जारी रखने में असमर्थ थे। अपने माता-पिता की भलाई को लेकर चिंतित महेश ने बार-बार अपने पिता को आश्वस्त किया था कि वह सब कुछ संभाल लेंगे।
गिरधरभाई आज भी उन बातों को याद करते हुए बताते हैं कि उनके बेटे ने उनसे चिंता न करने को कहा था। उसने कहा था कि वह परिवार के सारे कर्ज चुका देगा और दिवाली से पहले उनके लिए एक घर खरीदेगा। उस समय यह परिवार अहमदाबाद के नरोडा इलाके में एक किराए के मकान में रह रहा था और उन पर लगभग 15 लाख रुपये का भारी कर्ज था।
महेश को अपना यह वादा खुद पूरा करने का अवसर कभी नहीं मिल पाया। इस भयानक आपदा के बाद, परिवार को एयर इंडिया, टाटा समूह और गुजरात सरकार से लगभग 1.29 करोड़ रुपये का कुल मुआवजा पैकेज मिला। परिवार के अनुसार, महेश की पत्नी को 54 लाख रुपये मिले और वह बाद में अपने मायके चली गईं।
मुआवजा और सपनों का नया घर
बची हुई मुआवजा राशि से परिवार ने सबसे पहले लगभग 15 लाख रुपये का अपना पुराना कर्ज चुकाया। इसके बाद गिरधरभाई ने नरोडा में लगभग 45 लाख रुपये में दो बेडरूम का एक साधारण फ्लैट खरीदा। घर को सजाने और जरूरी सामान पर 10 लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि 5 लाख रुपये परिवार की छोटी पोती के भविष्य के लिए अलग रख दिए गए।
आज, इस त्रासदी के लगभग एक साल बाद, गिरधरभाई उसी फ्लैट में अपनी पत्नी, छोटे बेटे कार्तिक और पोती के साथ रहते हैं। यह घर नुकसान और वादे के पूरे होने, दोनों का एक दर्दनाक प्रतीक बनकर खड़ा है। जिस बेटे ने अपने माता-पिता को घर दिलाने का वादा किया था, उसे कभी अपने हाथों से घर की चाबियां सौंपने का मौका नहीं मिला। फिर भी उसकी मृत्यु के बाद मिले मुआवजे के जरिए उसका वह सपना हकीकत में बदल गया।
गिरधरभाई कहते हैं कि महेश हमेशा उनसे कहते थे कि वे चिंता न करें। आज उसी की वजह से वे अपने खुद के घर में रह रहे हैं। उनके बेटे ने मौत के बाद भी अपना वादा निभाया। दुखी पिता स्वीकार करते हैं कि आज भी हर शाम उन्हें ऐसा लगता है कि उनका बेटा दरवाजे से अंदर आएगा।
अहमदाबाद के इस विमान हादसे ने एक फिल्म निर्माता, एक बेटा और एक परिवार का मुख्य सहारा छीन लिया। लेकिन जो लोग पीछे रह गए, उनके लिए महेश जीरावाला की स्थायी विरासत केवल उनके बनाए गए संगीत वीडियो और एल्बम नहीं हैं। बल्कि वह गरिमा, सुरक्षा और उम्मीद है जो वह अपने परिवार को प्रदान करने में कामयाब रहे- भले ही उनकी अंतिम यात्रा भारत की सबसे भीषण विमानन त्रासदियों में से एक में ही क्यों न समाप्त हुई हो।
(सभी तस्वीरें स्वर्गीय महेश जीरावाला के सोशल मीडिया अकाउंट्स या उनके परिवार और दोस्तों द्वारा प्रदान की गई हैं।)
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