“आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है” वाली पुरानी कहावत एक बार फिर बिल्कुल सच साबित हुई है। देश भर में चल रहे एलपीजी गैस संकट के बीच विशेषज्ञों ने एक ऐसा गैस स्टोव तैयार किया है, जो एलपीजी के बजाय पानी से चलता है।
इसे ‘प्लग-एंड-प्ले’ हाइड्रोजन कुकिंग स्टोव के रूप में पेश किया गया है। पूरी तरह से ग्रीन हाइड्रोजन पर काम करने वाले इस अनोखे गैस स्टोव की कीमत 1,50,000 रुपये प्रति यूनिट रखी गई है।
यह पूरी तरह से भारत में बना (मेड-इन-इंडिया) उत्पाद है, जिसे घरेलू और व्यावसायिक दोनों तरह के उपयोग के लिए डिजाइन किया गया है। एलपीजी की बढ़ती समस्या को देखते हुए इसे वैकल्पिक और स्वच्छ कुकिंग के लिए एक बेहतरीन समाधान माना जा रहा है।
क्या है इस हाइड्रोजन स्टोव की खासियत
यह गैस स्टोव 100 प्रतिशत ग्रीन हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करता है और इसमें दो बर्नर दिए गए हैं। स्टेनलेस स्टील से बना यह टेबल-टॉप मॉडल मैनुअल इग्निशन पर काम करता है।
देखने में यह आपको किसी आम गैस स्टोव जैसा ही लग सकता है, लेकिन इसके काम करने का तरीका बिल्कुल अलग और आधुनिक है। इस क्रांतिकारी स्टोव का निर्माण ‘ग्रीनवीज’ (Greenvize) नामक कंपनी द्वारा किया गया है।
इस स्टोव के अंदर ही एक प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (PEM) इलेक्ट्रोलाइजर लगा हुआ है। यह खास तकनीक बिना किसी बड़े टैंक या पाइपलाइन की मदद के, सीधे साधारण पानी से उसी समय हाइड्रोजन तैयार कर लेती है।
आंकड़ों के अनुसार, इस स्टोव में लगातार छह घंटे तक खाना पकाने के लिए केवल 100 मिलीलीटर डिस्टिल्ड या आरओ (RO) पानी और 1 kWh बिजली की आवश्यकता होती है।
बाजार में मौजूद इंडक्शन स्टोव और इस नए सिस्टम दोनों में बिजली का उपयोग होता है, लेकिन इनकी दक्षता और व्यावहारिकता में बड़ा अंतर है। एक इंडक्शन प्रति बर्नर लगभग 1.5 से 2 kW बिजली की खपत करता है, जबकि यह हाइड्रोजन कुकिंग सिस्टम केवल 1 kWh बिजली लेता है।
इसकी एक और बड़ी खासियत यह है कि इंडक्शन की तरह इसके लिए किसी खास या महंगे बर्तन की जरूरत नहीं पड़ती। आप इस स्टोव पर अपने घर के किसी भी सामान्य बर्तन में आसानी से खाना पका सकते हैं।
कैसे काम करता है यह स्टोव
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह स्टोव उत्प्रेरक (कैटेलिटिक) हाइड्रोजन बर्नर का उपयोग करता है। इसका सीधा मतलब यह है कि इसमें मुख्य ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग होता है, जो बेहद नियंत्रित, कम-आंच या लगभग बिना लौ वाली सुरक्षित कुकिंग की सुविधा देता है।
एलपीजी स्टोव के विपरीत, यह किसी भारी गैस सिलेंडर पर निर्भर नहीं है। इसके बजाय, यह पूरी तरह से एक नियंत्रित हाइड्रोजन प्रवाह प्रणाली पर कार्य करता है।
पर्यावरण के लिए है पूरी तरह सुरक्षित
इस गैस स्टोव की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) इसका शून्य उत्सर्जन (Zero Emission) है। इससे किसी भी तरह का कार्बन मोनोऑक्साइड या दिखाई देने वाला धुंआ नहीं निकलता है।
यह बिना किसी शोर या कंपन के बिल्कुल शांति से काम करता है। इस वजह से यह उन इंडोर जगहों के लिए एकदम उपयुक्त है जहां प्रदूषण मुक्त माहौल जरूरी होता है।
इस पूरी प्रक्रिया में बाई-प्रोडक्ट (उपोत्पाद) के तौर पर सिर्फ पानी की भाप निकलती है। यही कारण है कि इसे पर्यावरण के लिए पूरी तरह से इको-फ्रेंडली माना जा रहा है।
घरेलू और कमर्शियल इस्तेमाल के लिए कितना उपयोगी
हालांकि इस स्टोव को घरेलू रसोई में बहुत आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल इसका लक्ष्य बड़ा रखा गया है।
वर्तमान में इसका परीक्षण सामुदायिक रसोई, कैंटीन, सरकारी स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं और बड़े संस्थागत तथा औद्योगिक किचन के लिए किया जा रहा है।
कीमत और इसकी व्यावहारिकता
लगभग 1,50,000 रुपये प्रति पीस की कीमत होने के कारण, यह स्टोव अभी आम घरों की रोजमर्रा की पहुंच से थोड़ा दूर है।
फिलहाल इसे एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है और इसका मुख्य फोकस बड़े पैमाने पर खाना पकाने वाली जगहों पर है।
भले ही यह तुरंत हमारे घरों से एलपीजी गैस सिलेंडर की जगह न ले पाए, लेकिन खाना पकाने की नई और स्वच्छ तकनीक की दिशा में यह एक बेहद स्पष्ट और महत्वपूर्ण कदम है।
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