हाल के दिनों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अजीबोगरीब व्यवहार और अत्यधिक उग्र बयानों ने राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर से इस बहस को तेज कर दिया है कि क्या वह किसी सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसा कर रहे हैं, या फिर वाकई उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। पिछले एक दशक से यह सवाल लगातार उनके राजनीतिक सफर का हिस्सा रहा है।
पिछले हफ्ते ईरान का नामोनिशान मिटाने और ‘पूरी सभ्यता के खत्म होने’ जैसी धमकियों के बाद, रविवार रात उन्होंने ‘अपराध पर कमजोर’ बताकर पोप पर भी सीधा हमला बोल दिया। इन असंबद्ध, अमर्यादित और कई बार भ्रमित करने वाले बयानों ने कई लोगों के मन में यह धारणा पैदा कर दी है कि सत्ता के नशे में चूर एक तानाशाह अब अपना नियंत्रण खो रहा है।
हालांकि, व्हाइट हाउस ने इन आकलनों को पूरी तरह से खारिज किया है। उनका कहना है कि ट्रंप मानसिक रूप से पूरी तरह चुस्त हैं और अपने ऐसे बयानों से वह विरोधियों को उलझा कर रखते हैं।
लेकिन युद्ध के इस संवेदनशील दौर में राष्ट्रपति के ऐसे बयानों ने अमेरिका के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वैसे तो देश ने पहले भी ऐसे राष्ट्रपतियों को देखा है जिनकी क्षमता पर सवाल उठे हैं—मसलन, जो बाइडेन जिनकी बढ़ती उम्र और शारीरिक क्षमताएं जनता के सामने चर्चा का विषय रहीं—लेकिन आधुनिक समय में किसी भी राष्ट्रपति की मानसिक स्थिरता पर इतनी सार्वजनिक और गहन बहस पहले कभी नहीं हुई, जिसके परिणाम इतने व्यापक हों।
अपनों ने ही उठाए सवाल
ट्रंप की मनोवैज्ञानिक स्थिति पर लंबे समय से सवाल उठाने वाले डेमोक्रेट्स ने एक बार फिर 25वें संशोधन को लागू कर उन्हें ‘अक्षमता’ के आधार पर सत्ता से हटाने की मांग तेज कर दी है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि अब यह चिंता केवल वामपंथी नेताओं, लेट-नाइट कॉमेडियन्स या दूर बैठे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों तक सीमित नहीं है।
सेवानिवृत्त जनरल, राजनयिक और विदेशी अधिकारी भी अब यही बात कह रहे हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि कभी ट्रंप के बेहद करीबी रहे दक्षिणपंथी सहयोगी भी अब उनके खिलाफ मुखर हो रहे हैं।
हाल ही में ट्रंप से अलग हुईं जॉर्जिया की रिपब्लिकन सांसद मार्जोरी टेलर ग्रीन ने 25वें संशोधन के इस्तेमाल की वकालत करते हुए एक न्यूज चैनल को बताया कि ईरान की सभ्यता को नष्ट करने की धमकी देना कोई ‘कठोर बयानबाजी’ नहीं, बल्कि पूरी तरह से पागलपन है।
धुर दक्षिणपंथी पॉडकास्टर कैंडेस ओवेन्स ने उन्हें ‘नरसंहार करने वाला पागल’ करार दिया। वहीं, इंफोवार्स के संस्थापक और कॉन्सपिरेसी थियरीस्ट एलेक्स जोंस ने कहा कि ट्रंप अब बड़बड़ाने लगे हैं और उनका दिमाग सही से काम नहीं कर रहा है।
ट्रंप के पहले कार्यकाल में व्हाइट हाउस के वकील रहे टाय कोब ने एक पत्रकार से कहा कि राष्ट्रपति स्पष्ट रूप से विक्षिप्त हो चुके हैं और उनके आधी रात के आक्रामक सोशल मीडिया पोस्ट उनके पागलपन के स्तर को उजागर करते हैं। पूर्व व्हाइट हाउस प्रेस सचिव स्टेफनी ग्रिशम ने भी पिछले हफ्ते ऑनलाइन लिखा था कि वह स्पष्ट रूप से ठीक नहीं हैं।
इन आलोचनाओं पर ट्रंप ने एक लंबे और गुस्से से भरे सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पलटवार किया, जिसमें किसी भी तरह का संयम नहीं झलक रहा था। उन्होंने कैंडेस ओवेन्स, एलेक्स जोंस, मेगिन केली और टकर कार्लसन जैसे आलोचकों को ‘कम आईक्यू’ वाला बताया।
ट्रंप ने लिखा कि ये लोग बेवकूफ हैं और ये बात उनका परिवार और बाकी सब भी जानते हैं। उन्होंने उल्टे अपने आलोचकों को ही ‘पागल और उपद्रवी’ करार देते हुए कहा कि वे मुफ्त पब्लिसिटी के लिए कुछ भी कहने को तैयार हैं।
उम्र और मानसिक स्वास्थ्य पर गिरता ग्राफ
दक्षिणपंथियों का यह विरोध अभी अमेरिकी कांग्रेस (संसद) तक नहीं पहुंचा है। रिपब्लिकन सांसद सार्वजनिक रूप से राष्ट्रपति के प्रति वफादार बने हुए हैं। कैबिनेट ने भी 25वें संशोधन को लागू करने के विचार को सिरे से खारिज कर दिया है। लेकिन ये सब आम अमेरिकियों के बीच बढ़ती बेचैनी को जरूर दर्शाता है।
हालिया सर्वेक्षणों से पता चलता है कि लोग तेजी से ट्रंप के मानसिक स्वास्थ्य पर सवाल उठा रहे हैं, जो अपने 80वें जन्मदिन के करीब पहुंच रहे हैं और पद की शपथ लेने वाले अब तक के सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति हैं।
फरवरी में हुए रॉयटर्स/इप्सोस पोल के अनुसार, 61 प्रतिशत अमेरिकियों का मानना है कि उम्र के साथ ट्रंप का व्यवहार अधिक अस्थिर हो गया है। केवल 45 प्रतिशत लोग ही मानते हैं कि वह मानसिक रूप से तेज हैं और चुनौतियों से निपटने में सक्षम हैं, जो कि साल 2023 के 54 प्रतिशत से कम है।
सितंबर के यूगॉव पोल में लगभग आधे (49 प्रतिशत) अमेरिकियों ने ट्रंप को राष्ट्रपति बनने के लिए बहुत बूढ़ा माना, जबकि फरवरी 2024 में यह आंकड़ा 34 प्रतिशत था। केवल 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनकी उम्र ज्यादा नहीं है।
डेमोक्रेट नेताओं ने इस मुद्दे को और आक्रामक तरीके से उठाया है। सीनेटर चक शूमर ने ट्रंप को ‘बेहद बीमार व्यक्ति’ कहा, जबकि प्रतिनिधि हकीम जेफ्रीस ने उन्हें ‘बेलगाम’ और ‘नियंत्रण से बाहर’ बताया। प्रतिनिधि टेड लियू ने तो उन्हें सीधे तौर पर ‘पागल’ करार दिया।
मैरीलैंड के प्रतिनिधि जेमी रस्किन ने व्हाइट हाउस के चिकित्सक को पत्र लिखकर मूल्यांकन का अनुरोध किया है। उन्होंने ट्रंप के व्यवहार में डिमेंशिया और मानसिक गिरावट के लक्षणों के साथ-साथ असंगत, हिंसक और अपमानजनक बयानों का जिक्र किया।
‘पागलपन’ या एक सोची-समझी रणनीति?
दूसरी ओर, राष्ट्रपति के समर्थकों ने इन आरोपों का कड़ा विरोध किया है। उनका तर्क है कि जिसे आलोचक मानसिक विक्षिप्तता कह रहे हैं, वह दरअसल एक सोची-समझी रणनीति है। एक प्रमुख मीडिया स्तंभकार ने लिखा कि ट्रंप अच्छी तरह जानते हैं कि वह क्या कर रहे हैं और वे मध्य पूर्व को आतंकवाद से मुक्त कराने के अपने अभियान में चरम सैन्य और कूटनीतिक दबाव का इस्तेमाल करते रहेंगे।
अपने पहले कार्यकाल में खुद को ‘बेहद स्थिर जीनियस’ बताने वाले और डिमेंशिया का पता लगाने वाले संज्ञानात्मक परीक्षणों को पास करने का दावा करने वाले ट्रंप ने पिछले हफ्ते एक रिपोर्टर के सवाल पर अपनी मानसिक स्थिति की आलोचनाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया।
उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी कोई बात नहीं सुनी है, और अगर ऐसा है, तो देश को उनके जैसे और लोगों की जरूरत है। उन्होंने तर्क दिया कि उनके आने से पहले व्यापार और अन्य मामलों में देश को बुरी तरह लूटा जा रहा था।
इस बारे में पूछे जाने पर व्हाइट हाउस के प्रवक्ता डेविस इंगल ने एक ईमेल में जवाब दिया कि राष्ट्रपति ट्रंप की फुर्ती, बेजोड़ ऊर्जा और ऐतिहासिक पहुंच पिछले चार वर्षों में देखे गए हालात के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने दावा किया कि उस दौरान जो बाइडेन शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर हो गए थे, जिसे कुछ प्रमुख मीडिया घरानों ने छिपाने की कोशिश की थी।
इतिहास के झरोखे से
साल 2016 में जब ट्रंप ने पहली बार राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ा था, तब से ही उनकी स्थिरता एक आवर्ती मुद्दा रही है। कई मनोचिकित्सकों और मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों ने बिना आधिकारिक मूल्यांकन किए ही अपनी राय दी है।
पहले कार्यकाल में उनके सबसे लंबे समय तक रहे चीफ ऑफ स्टाफ जॉन एफ. केली ने अपने बॉस को समझने के लिए 27 ऐसे ही विशेषज्ञों द्वारा लिखी गई किताब तक खरीदी थी और इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ट्रंप मानसिक रूप से बीमार हैं।
वैसे यह पहली बार नहीं है जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की मानसिक फिटनेस पर शक किया गया हो। जॉन एडम्स, एंड्रयू जैक्सन और दोनों रूजवेल्ट पर भी उनके राजनीतिक विरोधियों ने मानसिक रूप से असंतुलित होने के आरोप लगाए थे।
अब्राहम लिंकन ने अवसाद से लंबा संघर्ष किया था। वुडरो विल्सन एक स्ट्रोक के बाद कभी पहले जैसे नहीं रहे। लिंडन बी. जॉनसन अत्यधिक ऊर्जा और गहरी उदासी के दौर के बीच झूलते रहते थे। रोनाल्ड रीगन अपने कार्यकाल के अंत में याददाश्त के मोर्चे पर लड़खड़ाते दिखे थे, और कई लोगों को शक था कि वर्षों बाद जिस अल्जाइमर रोग की घोषणा हुई, उसने उन्हें पहले ही प्रभावित करना शुरू कर दिया था।
ट्रंप के कुछ प्रशंसक उनकी तुलना रिचर्ड एम. निक्सन से करते हैं, जिन्होंने बहुचर्चित ‘मैडमैन थ्योरी’ का इस्तेमाल किया था।
निक्सन ने वियतनाम शांति वार्ता का नेतृत्व कर रहे अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी ए. किसिंजर को निर्देश दिया था कि वे वार्ताकारों को बताएं कि राष्ट्रपति अस्थिर और अप्रत्याशित हैं। यह एक बेहतर समझौता हासिल करने के लिए दबाव बनाने की रणनीति थी।
हालांकि, निक्सन के कुछ सलाहकारों को निजी तौर पर लगता था कि यह सब सिर्फ एक नाटक नहीं था।
ट्रंप ने भी समय-समय पर अपनी इस ‘पागलपन’ की छवि का फायदा उठाने की कोशिश की है। उत्तर कोरियाई लोगों का जिक्र करते हुए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में अपनी पूर्व राजदूत निक्की हेली से कहा था कि उन्हें यह सोचने दें कि मैं पागल हूं। एक बार उन्होंने तत्कालीन अटॉर्नी जनरल विलियम पी. बर्र से पूछा था कि एक बहुत अच्छे ट्वीट का रहस्य क्या है? फिर खुद ही जवाब दिया- ‘बस थोड़ी सी पागलपन की झलक।’
हालांकि, ट्रंप ने पिछले सप्ताह एक मीडिया साक्षात्कार में स्वीकार किया कि कम से कम इस बार वह कोई दिखावा नहीं कर रहे थे। ईरान की सभ्यता को नष्ट करने की अपनी धमकी के बारे में उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह सच में ऐसा करने को तैयार थे।
सार्वजनिक मंच और बेलगाम बयानबाजी
ट्रंप की मानसिक स्थिति पर जनता का ध्यान किसी भी पिछले राष्ट्रपति की तुलना में कहीं अधिक केंद्रित है। इतिहासकार जूलियन ई. जेलिज़र के अनुसार, निक्सन के अलावा समय के साथ चिंता का ऐसा स्तर कभी नहीं देखा गया। असल में, आज की स्थिति निक्सन के दौर को भी काफी पीछे छोड़ चुकी है।
जेलिज़र कहते हैं कि 1970 के दशक के विपरीत, अब सोशल मीडिया और 24 घंटे चलने वाले टेलीविजन के कारण सब कुछ पूरी तरह सार्वजनिक रूप से हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि मर्यादाओं की परवाह न करने वाले राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप अपने गुस्से और आवेग पर निक्सन से भी ज्यादा स्वतंत्र महसूस करते हैं।
अपने दूसरे कार्यकाल में, ट्रंप और भी कम संयमित और कई बार बेहद असंगत नजर आते हैं। वे पहले से ज्यादा अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, लंबे समय तक बोलते हैं और अक्सर ऐसे बयान देते हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता।
वे लगातार कहते हैं कि उनके पिता का जन्म जर्मनी में हुआ था, जबकि सच यह है कि वे ब्रोंक्स में पैदा हुए थे। वह अपने चाचा (जो एम.आई.टी. के प्रोफेसर थे) के बारे में यह मनगढ़ंत कहानी भी दोहराते हैं कि उन्होंने उनाबॉम्बर नामक आतंकवादी को पढ़ाया था।
वे भाषण देते हुए अक्सर अजीबोगरीब विषयों पर भटक जाते हैं। एक क्रिसमस रिसेप्शन में पेरू के जहरीले सांपों पर आठ मिनट का लंबा भाषण देना, कैबिनेट बैठक के दौरान शार्पी पेन पर बेवजह की चर्चा करना, या व्हाइट हाउस के पर्दों की तारीफ करने के लिए ईरान युद्ध के गंभीर अपडेट के बीच में ही टोक देना इसके कुछ उदाहरण हैं।
वे ग्रीनलैंड और आइसलैंड के बीच भ्रमित हो चुके हैं और एक से अधिक बार कंबोडिया और अज़रबैजान के बीच एक काल्पनिक युद्ध को खत्म करने का दावा कर चुके हैं (संभवतः उनका मतलब आर्मेनिया और अज़रबैजान से था, जिनके बीच लगभग 4,000 मील की दूरी है)।
रविवार रात पोप लियो XIV पर भड़कने और फिर खुद को ईसा मसीह जैसे रूप में पेश करने वाली तस्वीर पोस्ट कर डिलीट करने से पहले भी, ट्रंप आलोचकों पर अपने बयानों से कई लोगों को चौंका चुके हैं।
वह अपने विरोधियों पर राजद्रोह का आरोप लगाते हैं, जिसकी सजा मौत है। उन्होंने अजीबोगरीब दावा किया कि हॉलीवुड निर्देशक रॉब रेनर (जिनकी कथित तौर पर उनके बेटे ने चाकू मारकर हत्या कर दी थी) की मौत ‘ट्रंप का विरोध करने के कारण पैदा हुए गुस्से’ की वजह से हुई।
जब पूर्व एफ.बी.आई. निदेशक रॉबर्ट एस. मुलर III का निधन हुआ, तो ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि उन्हें खुशी है कि वह मर गए।
हाल ही में उन्होंने यह भी घोषित किया कि ईरान के नए शासन के राष्ट्रपति अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में बहुत कम कट्टरपंथी और कहीं अधिक बुद्धिमान हैं। जबकि हकीकत में ईरान के राष्ट्रपति वही हैं जो पहले थे; वहां राष्ट्रपति पद में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
ट्रंप का मतलब शायद नए सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई से हो सकता है, लेकिन उन्हें युद्ध में मारे गए अपने पिता अयातुल्ला अली खामेनेई से भी ज्यादा कट्टरपंथी माना जाता है।
सलाहकारों की कमी और बदलता दौर
उनके पहले कार्यकाल से एक बड़ा अंतर यह भी है कि अब जॉन केली जैसे सलाहकार न के बराबर हैं जो ट्रंप को हद पार करने से रोकना अपनी जिम्मेदारी समझते हों।
जेलिज़र बताते हैं कि जब ट्रंप ऐसा कुछ भी करते हैं, तो उनके आस-पास के सभी लोग नजरें झुका लेते हैं और खामोश रहते हैं। पहले कार्यकाल के विपरीत, अब वे उन्हें रोकने के लिए पर्दे के पीछे से कोई कूटनीतिक कोशिश भी नहीं करते दिखते।
लेकिन उनके कट्टर समर्थकों के बीच शायद इसके लिए अभी भी भरपूर जगह है। ध्रुवीकरण के इस दौर में अमेरिकी राजनीति का एक ऐसा वर्ग है, खासकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर, जो नेतृत्व की इस आक्रामक शैली को बेहद पसंद करता है। आखिरकार, राजनीति में उस व्यक्ति से ज्यादा सत्ता-विरोधी कौन हो सकता है जो पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर होने को तैयार हो?
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