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गुजरात: दोस्त की पत्नी के नाम खरीदी थी मर्सिडीज, 7 साल बाद कोर्ट ने छीन ली चाबी; जानें क्या है पूरा विवाद

| Updated: May 21, 2026 18:27

'सिर्फ कब्ज़े से नहीं मिलता मालिकाना हक': मर्सिडीज एसयूवी विवाद में कोर्ट ने रजिस्टर्ड मालकिन के पक्ष में सुनाया अहम फैसला

अहमदाबाद: एक लग्जरी मर्सिडीज बेंज एसयूवी (Mercedes-Benz SUV) के मालिकाना हक को लेकर अहमदाबाद की एक अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने वाहन की कस्टडी उसकी रजिस्टर्ड मालकिन को सौंपने का आदेश दिया है।

इसके साथ ही कोर्ट ने प्रह्लादनगर के एक प्रॉपर्टी ब्रोकर के उस दावे पर भी गहरा संदेह जताया है, जिसमें उसने कहा था कि उसने यह गाड़ी अपने दोस्त की पत्नी के नाम पर खरीदी थी और सात साल तक इसका इस्तेमाल किया।

मर्सिडीज बेंज जीएलएस 350डी (Mercedes-Benz GLS 350D) से जुड़े इस विवाद में दायर एक पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए सत्र न्यायालय ने एक बेहद तार्किक सवाल उठाया। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह बात काफी संदिग्ध लगती है कि कोई व्यक्ति किसी अन्य की पत्नी के नाम पर इतनी महंगी लग्जरी कार क्यों खरीदेगा।

इस मामले में प्रॉपर्टी ब्रोकर ने अदालत को बताया था कि उसने साल 2019 में यह एसयूवी खरीदी थी। उसका दावा था कि उसके दोस्त को कागजी कार्रवाई और दस्तावेजों से जुड़ी कुछ परेशानियां थीं, इसलिए वह कार अपने नाम पर नहीं खरीद सकता था।

ऐसे में ब्रोकर ने यह कार अपने दोस्त की पत्नी के नाम पर रजिस्टर करवाई। ब्रोकर के मुताबिक, कार की लोन की किश्तें उसने खुद चुकाईं और रजिस्ट्रेशन किसी और के नाम होने के बावजूद गाड़ी लगातार उसी के पास रही।

यह पूरा विवाद दिसंबर 2024 में तब सामने आया, जब आनंदनगर पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज की गई। ब्रोकर ने शिकायत की थी कि उसके घर से यह एसयूवी चोरी हो गई है। पुलिस की जांच में पता चला कि ब्रोकर के दोस्त ने कथित तौर पर एक डुप्लीकेट चाबी का इस्तेमाल करके गाड़ी निकाली थी।

इसके बाद पुलिस ने दोस्त पर चोरी का मामला दर्ज कर लिया। बाद में एक सर्विस स्टेशन मैनेजर द्वारा गाड़ी वापस ब्रोकर के घर लाए जाने पर पुलिस ने उसे जब्त कर लिया।

गाड़ी जब्त होने के बाद ब्रोकर और उसके दोस्त की पत्नी, दोनों ने अंतरिम कस्टडी के लिए मजिस्ट्रेट कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शुरुआत में मजिस्ट्रेट ने महिला की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने ब्रोकर के कब्जे तथा किश्तें चुकाने के दावे को आधार मानते हुए कस्टडी उसे सौंप दी।

इसके बाद महिला ने कानूनी तौर पर असली मालिक होने का दावा करते हुए इस आदेश को सत्र न्यायालय में चुनौती दी। सत्र न्यायालय ने ब्रोकर की दलीलों पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सर्विस स्टेशन मैनेजर का बयान अहम होगा और मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया।

हालांकि, पुनर्विचार के बाद भी मजिस्ट्रेट ने फिर से ब्रोकर के पक्ष में ही फैसला सुनाया। मजिस्ट्रेट ने यह तर्क दिया कि रजिस्ट्रेशन भले ही महिला के नाम पर है, लेकिन इसका फाइनेंस ब्रोकर ने किया था। मजिस्ट्रेट के इस फैसले के खिलाफ महिला ने एक बार फिर सत्र न्यायालय का रुख किया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नम्रता उनादकट ने मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर गौर किया। न्यायाधीश ने पाया कि वाहन का लोन महिला के नाम पर ही मंजूर हुआ था और लोन क्लोजर सर्टिफिकेट भी उसी के पक्ष में जारी किया गया था। अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि ब्रोकर ने 2019 से लेकर अब तक वाहन को अपने नाम पर ट्रांसफर कराने की कोई कोशिश नहीं की।

अपने आदेश में अदालत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट का काम यह तय करना है कि कानूनी तौर पर वाहन की कस्टडी का असली हकदार कौन है, न कि यह देखना कि जब्ती के समय भौतिक रूप से गाड़ी किसके पास थी। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ भौतिक कब्ज़ा कानूनी मालिकाना हक से ऊपर नहीं हो सकता, खासकर तब जब आवेदक ने रजिस्ट्रेशन और अन्य दस्तावेजों के जरिए अपना मालिकाना हक साबित कर दिया हो।

सत्र न्यायालय के कस्टडी सौंपने के इस आदेश के बाद अब यह कानूनी लड़ाई गुजरात हाई कोर्ट पहुंच गई है। हाई कोर्ट ने फिलहाल कस्टडी ट्रांसफर करने के आदेश पर 31 अगस्त तक रोक लगा दी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त को ही निर्धारित की गई है।

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