शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुनवाई के दौरान हत्या की आरोपी सोनम रघुवंशी को वापस जेल भेजने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने मेघालय हाईकोर्ट द्वारा दिए गए जमानत के फैसले पर गंभीर चिंता जरूर व्यक्त की। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की पीठ मेघालय सरकार की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 29 जून के जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गंभीर आरोपों के बावजूद ‘जमानत नियम है और जेल एक अपवाद है’ का कानूनी सिद्धांत हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए।
पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अपराध चाहे कितना भी जघन्य क्यों न हो, न्यायपालिका हमेशा एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास करेगी। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आरोपी महिला पहले ही कुछ समय जेल में बिता चुकी है।
न्यायाधीशों का मानना था कि अगर सोनम को जेल से रिहा नहीं किया गया होता, तो शायद वे जमानत आदेश पर रोक लगा देते। लेकिन चूंकि वह रिहा हो चुकी है, इसलिए कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में कोई भी दखल देने से इनकार कर दिया। अदालत ने अब सोनम को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 9 जुलाई के लिए तय की है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी आरोपी को न्यायिक आदेश के तहत रिहा कर दिया जाता है, तो उसे दोबारा जेल भेजने से पहले अदालतों को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। यह सतर्कता तब और जरूरी हो जाती है जब मामले का ट्रायल पहले ही शुरू हो चुका हो। जजों ने इस बात को दोहराया कि आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, उन्हें अंततः ट्रायल के दौरान ही साबित करना होता है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन आरोपों को बेहद ‘चौंकाने वाला’ बताया था, लेकिन इसके बावजूद कोर्ट ने कहा कि जब तक दोष साबित नहीं हो जाता, तब तक आरोपी को निर्दोष मानने का सिद्धांत लागू रहता है।
मेघालय सरकार ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद सोनम को रिहा कर दिया गया है और वह फिलहाल शिलांग में है। इस जानकारी के बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर अंतरिम रोक लगाने के विचार को टाल दिया।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी साफ किया कि वह मेघालय हाईकोर्ट के उस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं है जिसके आधार पर यह जमानत दी गई थी। जस्टिस सुंदरेश ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया उन्हें हाईकोर्ट के इस मामले को संभालने के तरीके पर आपत्ति है।
दरअसल, हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से एक तकनीकी त्रुटि के आधार पर जमानत दी थी। गिरफ्तारी के दस्तावेजों में हत्या से जुड़ी धारा 103 की जगह बार-बार भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 403 का जिक्र किया गया था। गिरफ्तारी के कागजातों में भारत के बाहर अपराध और सशस्त्र बलों से भागने जैसे अप्रासंगिक आरोपों का भी उल्लेख था, जिसे हाईकोर्ट ने ‘दिमाग का बिल्कुल इस्तेमाल न करने’ का उदाहरण बताया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर कड़ा सवाल उठाया कि क्या हत्या जैसे गंभीर मामले में केवल एक तकनीकी खामी जमानत का आधार बन सकती है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को उसकी गिरफ्तारी का कारण पहले से पता था। साथ ही, अपनी पिछली तीन असफल जमानत याचिकाओं में उसने कभी भी इस तकनीकी त्रुटि का मुद्दा नहीं उठाया था। अदालत ने मौखिक रूप से स्पष्ट किया कि यह कोई ऐसा मामला नहीं है जहां आरोपी को गिरफ्तारी के आधार न बताए गए हों।
मेघालय सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जांच के दौरान पुलिस ने पुख्ता सबूत जुटाए हैं, लेकिन इसके बावजूद हाईकोर्ट ने केवल एक तकनीकी गलती पर राहत दे दी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, राजा रघुवंशी की हत्या एक सोची-समझी साजिश थी, जिसे कथित तौर पर सोनम ने अपने प्रेमी राज कुशवाहा और अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर रचा था।
मेहता ने अदालत को बताया कि सोनम ने तीन साथियों के साथ मेघालय की यात्रा की, हमले में सक्रिय भूमिका निभाई और बाद में राजा के शव को खाई में फेंकने में मदद की। राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि दस्तावेजों में धारा 103 की जगह धारा 403 का लिखा जाना महज एक टाइपिंग की गलती थी, जिससे आरोपी को कोई नुकसान नहीं हुआ।
यह मामला 29 वर्षीय राजा रघुवंशी से जुड़ा है, जो इंदौर के एक व्यवसायी थे। मई 2025 में शादी के तुरंत बाद यह नवविवाहित जोड़ा हनीमून के लिए मेघालय गया था। 23 मई को नोंगियाट के एक होमस्टे से चेक आउट करने के बाद दोनों अचानक लापता हो गए। बाद में राजा का शव सोहरा के वेसावडोंग फॉल्स के पास एक गहरी खाई से बरामद हुआ, जबकि सोनम को कई दिनों बाद उत्तर प्रदेश से खोज निकाला गया।
इस हाई-प्रोफाइल मामले में मेघालय पुलिस ने 700 से अधिक पन्नों की भारी-भरकम चार्जशीट दाखिल की है। पुलिस का दावा है कि यह हत्या एक पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा थी जिसमें सोनम और उसके साथी सीधे तौर पर शामिल थे। फिलहाल इस मामले की सुनवाई चल रही है और गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया जारी है।
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