गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम और सख्त फैसला सुनाते हुए लंदन में रहने वाले एक एनआरआई (NRI) को बड़ी कानूनी जीत दिलाई है। अदालत ने वडोदरा में स्थित एक बेशकीमती जमीन का मालिकाना हक वापस असली मालिक को सौंप दिया है। यह आदेश पावर ऑफ अटॉर्नी के घोर दुरुपयोग को उजागर करता है, जहां इसे रखने वाले व्यक्ति ने बिना किसी सहमति के पूरी जमीन अपने ही बेटे और बहू के नाम ‘गिफ्ट डीड’ के रूप में ट्रांसफर कर दी थी।
इस पूरे मामले की नींव साल 1999 में रखी गई थी। पुरुषोत्तम पंखनिया और उनकी पत्नी रंमाबेन ने वडोदरा के सयाजीगंज इलाके में एक हाउसिंग सोसायटी के अंदर 3,200 वर्ग मीटर का प्लॉट खरीदा था। अपनी अनुपस्थिति में इस संपत्ति की देखरेख के लिए दंपति ने हरि पटेल नाम के व्यक्ति को अपनी जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी सौंप दी थी। दुर्भाग्य से साल 2010 में रंमाबेन का निधन हो गया।
पत्नी के निधन के कुछ समय बाद पुरुषोत्तम पंखनिया को एक बड़ा और अप्रत्याशित झटका लगा। उन्हें पता चला कि हरि पटेल ने जनवरी 2011 में एक गिफ्ट डीड बनाकर वह पूरी संपत्ति अपने बेटे शशिकांत और बहू उषाबेन के नाम कर दी है। इस पूरी प्रक्रिया के लिए असली मालिक यानी पंखनिया से कोई अनुमति या जानकारी साझा नहीं की गई थी।
धोखाधड़ी का शिकार होने के बाद पंखनिया ने वडोदरा की सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और इस मनमानी गिफ्ट डीड को रद्द करने की गुहार लगाई। उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि हरि पटेल ने अपने परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए मिलीभगत करके पावर ऑफ अटॉर्नी का अवैध इस्तेमाल किया है।
हालांकि, सिविल कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया। निचली अदालत ने हरि पटेल के उस दावे को मान लिया जिसमें कहा गया था कि शशिकांत और पंखनिया के बीच कुछ वित्तीय लेन-देन हुआ था। पटेल ने तर्क दिया था कि पंखनिया पर 7,800 पाउंड का कर्ज था जिसे उन्होंने चुकाया नहीं था, इसलिए उसी बकाया राशि के समायोजन के रूप में यह संपत्ति ट्रांसफर करने की सहमति बनी थी।
निराश होकर पंखनिया ने गुजरात हाईकोर्ट में अपील की, जहां अदालत ने मामले की कानूनी बारीकियों की गहराई से पड़ताल की। हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से यह जांचा कि क्या जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी किसी ऐसे काम की इजाजत दे सकती है जिसका उसमें स्पष्ट उल्लेख ही न हो। अदालत ने यह भी परखा कि क्या पावर ऑफ अटॉर्नी देने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी धारक का वह अधिकार जीवित रहता है या नहीं।
हाईकोर्ट ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि रंमाबेन द्वारा दी गई पावर ऑफ अटॉर्नी उनके निधन के साथ ही कानूनी रूप से शून्य हो गई थी। इसलिए उनकी मृत्यु के बाद इस दस्तावेज का उपयोग संपत्ति ट्रांसफर करने के लिए बिल्कुल नहीं किया जा सकता था।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि पावर ऑफ अटॉर्नी देने वाले की मृत्यु के बाद इसके आधार पर कोई भी नया लेन-देन नहीं किया जा सकता। भले ही मौत की जानकारी न होने का बहाना बनाया जाए, फिर भी गिफ्ट डीड बनाने का कोई विशेष अधिकार न होने के कारण हरि पटेल का यह कदम पूरी तरह से गैरकानूनी था और कानून की नजर में इसका कोई आधार नहीं है।
अंत में हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट के रवैये पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने मामले के मूल दायरे से बहुत बाहर जाकर काम किया है। सिविल कोर्ट ने केवल मान्यताओं और अनुमानों के आधार पर कथित वित्तीय लेन-देन को संपत्ति ट्रांसफर करने का वैध अधिकार मान लिया था, जो न्याय के सिद्धांत के खिलाफ था।
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