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100 घर, 120 ट्रॉफियां और 179 मेडल: गुजरात के इस गांव को ‘शतरंज की नर्सरी’ बना रहा है एक शिक्षक

| Updated: August 6, 2026 13:39

शिक्षक संदीप उपाध्याय की अनोखी पहल ने 100 घरों वाले छोटे से गांव 'रतुसिंह ना मुवाडा' की तकदीर बदल दी है। अपनी सैलरी से बच्चों को ट्रेनिंग देकर वे ग्रामीण गुजरात से भविष्य के ग्रैंडमास्टर तैयार कर रहे हैं।

वड़ोदरा। रतुसिंह ना मुवाडा, गुजरात का एक ऐसा गांव है जहां चार साल पहले तक शायद ही किसी ने ‘फाइड’ (अंतर्राष्ट्रीय शतरंज महासंघ) रेटिंग या ग्रैंडमास्टर का नाम सुना था। लेकिन आज इस गांव की फिजा पूरी तरह बदल चुकी है। अब यहां की चौपालों में ओपनिंग, एंडगेम, रेटिंग पॉइंट और राष्ट्रीय टूर्नामेंट जैसी बातें आम हो गई हैं। गांव के करीब 200 बच्चे विश्व शतरंज के शीर्ष स्तर पर पहुंचने का सपना देख रहे हैं और इसके लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं।

इस अद्भुत बदलाव के पीछे 45 वर्षीय स्कूल शिक्षक संदीप उपाध्याय की अटूट लगन है। संदीप स्कूल में गणित और गुजराती पढ़ाते हैं, लेकिन उन्होंने चुपचाप भारत के सबसे उल्लेखनीय जमीनी शतरंज आंदोलनों में से एक की मजबूत नींव रख दी है। मात्र 100 घरों वाले इस गांव के बच्चों ने अब तक 120 ट्रॉफियां और 179 मेडल जीतकर सभी को हैरान कर दिया है।

साल 2021 में जब संदीप ने स्कूल में शतरंज की शुरुआत की, तो उनका लक्ष्य उनके साथी शिक्षकों को भी अवास्तविक लगा था। उन्होंने ग्रामीण गुजरात से 50 ग्रैंडमास्टर और 10 विश्व चैंपियन तैयार करने का संकल्प लिया था। आज उनके छात्रों की अभूतपूर्व सफलता और खेल के प्रति जुनून ने इस असंभव से लगने वाले लक्ष्य को मुमकिन साबित करना शुरू कर दिया है।

इस पहल की शुरुआत बिल्कुल भी आसान नहीं थी। दिहाड़ी मजदूरी करके आजीविका कमाने वाले माता-पिता को यह समझाना कि शतरंज उनके बच्चों का भविष्य बदल सकता है, सालों की तपस्या का काम था। संदीप ने कोविड-19 महामारी के दौरान खुद इस खेल की बारीकियां सीखीं। वह रात-रात भर शतरंज की पहेलियां सुलझाते, ओपनिंग थ्योरी पढ़ते और ऑनलाइन ट्यूटोरियल देखते थे, ताकि अगली सुबह अपने छात्रों को बेहतर ढंग से सिखा सकें।

उन्होंने अपनी सैलरी से बच्चों के लिए शतरंज बोर्ड, घड़ियां, किताबें और टूर्नामेंट के उपकरण खरीदे। इतना ही नहीं, जब भी किसी होनहार बच्चे के पास प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेने के पैसे नहीं होते, तो संदीप खुद उनकी एंट्री फीस और यात्रा का खर्च उठाते हैं। उनका बेहद सादगी से कहना है, “मैं अपने छात्रों की वजह से कमाता हूं, और मेरे पैसों पर उनका पूरा अधिकार है।”

अंग्रेजी भाषा बच्चों की कामयाबी की राह में रोड़ा न बने, इसके लिए संदीप ने एक और अनोखा कदम उठाया। उन्होंने ‘द मैग्नस मेथड’ किताब का गुजराती में अनुवाद किया, ताकि बच्चे भाषा से जूझे बिना विश्व चैंपियन मैग्नस कार्लसन की लोकप्रिय और जटिल रणनीतियों को आसानी से समझ सकें।

गर्मियों की छुट्टियों में भी बच्चों का यह अभ्यास थमता नहीं है। वे हर दिन शतरंज की बिसात पर अपना दिमाग दौड़ाते हैं। स्कूल परिसर में मौजूद 10 कंप्यूटरों का उपयोग करके, ये बच्चे दुनिया भर के प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ ऑनलाइन गेम खेलते हैं। वे टैक्टिकल पजल हल करते हैं और एडवांस रणनीतियों का बारीकी से अध्ययन करते हैं। यह सब उस गांव में हो रहा है, जहां कभी इंटरनेट कनेक्टिविटी भी अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती हुआ करती थी।

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