गांधीनगर। गुजरात में लगातार गिरते भूजल स्तर से निपटने और प्राकृतिक जल स्रोतों के बेहतर प्रबंधन के लिए राज्य सरकार एक ऐतिहासिक और कड़ा कानून बनाने जा रही है। नए कानून के तहत जमीन के नीचे मौजूद पानी को किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति मानने के बजाय एक साझी सार्वजनिक संपत्ति का दर्जा दिया जाएगा। ‘गुजरात भूजल विधेयक, 2026’ (Gujarat Groundwater Bill, 2026) नाम के इस कानूनी मसौदे को अगले महीने राज्य विधानसभा में पेश किए जाने की पूरी संभावना है।
इस प्रस्तावित कानून में पीने के पानी, कृषि और आजीविका से जुड़ी जरूरतों के लिए भूजल के इस्तेमाल को सबसे पहली प्राथमिकता दी जाएगी। राज्यभर में पानी की खपत और उसके नियमन की निगरानी के लिए एक विशेष संस्था ‘गुजरात राज्य भूजल विनियमन और विकास प्राधिकरण’ (Gujarat State Groundwater Regulation and Development Authority) का गठन किया जाएगा। यह प्राधिकरण टिकाऊ भूजल प्रबंधन से जुड़ी नीतियों को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए जिम्मेदार होगा।
विधेयक में पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील और संकटग्रस्त इलाकों को ‘भूजल संरक्षण क्षेत्र’ घोषित करने का अधिकार सरकार के पास होगा। ऐसे क्षेत्रों में जलभृतों (Aquifers) को पूरी तरह सूखने से रोकने के लिए पानी निकालने और उसके इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाएंगे। नियमों की अनदेखी करने वालों के लिए कानून में कठोर सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
कानूनी प्रावधानों के अनुसार, भूजल को दूषित या प्रदूषित करने वाले दोषियों पर 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वहीं घोषित संरक्षण क्षेत्र के भीतर से अवैध रूप से पानी की निकासी करने पर 10 लाख रुपये तक का भारी जुर्माना लग सकता है। अवैध दोहन और पानी को जहरीला बनाने जैसे गंभीर अपराधों में दोषियों को आर्थिक दंड के साथ-साथ जेल की सजा का सामना भी करना पड़ सकता है।
व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर भी कड़े नियम तय किए गए हैं। अब किसी भी कारखाने या औद्योगिक इकाई को भूजल पंप करने से पहले सरकार से आधिकारिक अनुमति लेनी होगी। इसके अलावा, औद्योगिक और भारी मात्रा में पानी इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं पर जल शुल्क भी वसूला जाएगा। इस शुल्क और जुर्माने से एकत्र होने वाली पूरी राशि को वापस जल संरक्षण के कार्यों में ही लगाया जाएगा। राहत की बात यह है कि आम किसानों और कृषि क्षेत्र को इस जल शुल्क व्यवस्था से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
प्रस्तावित कानून में जल प्रबंधन को सुचारू बनाने के लिए गांव से लेकर राज्य स्तर तक एक विकेंद्रीकृत संस्थागत ढांचा तैयार किया जाएगा। इसके तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत, तालुका, नगरपालिका, नगर निगम और जिला स्तर पर स्थानीय जल सुरक्षा योजनाएं तैयार की जाएंगी ताकि संरक्षण के उपायों को बेहतर तरीके से लागू किया जा सके।
इमारतों के निर्माण को लेकर भी सख्त प्रावधान किए जा रहे हैं। नए नियमों के अनुसार वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) और जल पुनर्चक्रण (वॉटर रीसाइक्लिंग) को पूरी तरह अनिवार्य बना दिया गया है। किसी भी भवन के नक्शे को स्वीकृति तभी दी जाएगी जब उसमें जल संचयन की व्यवस्था शामिल होगी। इमारतों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम न लगाने पर भारी जुर्माना लगाने के साथ-साथ दोषी को जेल भी भेजा जा सकता है।
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