फूकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की फ्लाइट एआई-2379 (AI2379) के हवा में अचानक 300 फीट नीचे गिरने के मामले में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस विमान के मुख्य पायलट (पायलट-इन-कमांड) का डोप टेस्ट पॉजिटिव पाया गया है। इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए एयर इंडिया समूह ने एक बड़ा और अभूतपूर्व फैसला लिया है। कंपनी ने अब अपने सभी 5,000 पायलटों का एकमुश्त ड्रग टेस्ट कराने का आदेश जारी कर दिया है।
यह विशेष परीक्षण अभियान गुरुवार, 13 अगस्त 2026 से शुरू हो चुका है। इस जांच के दायरे में एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस दोनों के पायलट शामिल किए गए हैं। खास बात यह है कि एयरलाइन का यह कदम नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) द्वारा तय किए गए साइकोएक्टिव पदार्थों की जांच के नियमित नियमों से कहीं आगे की पहल है।
वर्तमान में एयर इंडिया समूह की दोनों एयरलाइंस के पास कुल मिलाकर लगभग 5,000 पायलट और 300 से अधिक विमानों का विशाल बेड़ा है। पायलटों को भेजे गए एक आंतरिक संदेश में एयरलाइन ने स्पष्ट किया है कि वे पहले से ही डीजीसीए के सभी नियमों का पालन करते हैं, जो अमेरिका और यूरोप के वैश्विक विमानन मानकों के समकक्ष हैं। हालांकि, सुरक्षा को और अधिक पुख्ता करने के लिए अब बिना किसी अपवाद के यह अनिवार्य स्क्रीनिंग की जा रही है, ताकि किसी भी प्रतिबंधित दवा या पदार्थ के सेवन का पता लगाया जा सके।
यह परीक्षण अभियान गुरुग्राम अकादमी में प्रशिक्षण के दौरान, उड़ानों के बाद फ्लाइट ब्रीफिंग केंद्रों, कार्यालयों या संबंधित ठिकानों पर किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, जो पायलट वर्तमान में छुट्टी पर हैं, उन्हें भी अपनी ड्यूटी पर लौटते ही इस जांच प्रक्रिया से गुजरना होगा। कंपनी को उम्मीद है कि सुरक्षा के उच्चतम मानकों को बनाए रखने वाली यह पूरी कवायद कुछ ही दिनों में संपन्न हो जाएगी। नियमतः डीजीसीए हर साल 10 प्रतिशत क्रू मेंबर्स का रैंडम टेस्ट अनिवार्य करता है, लेकिन ऐसी व्यापक जांच आमतौर पर किसी बड़ी सुरक्षा चूक के बाद ही की जाती है।
यह पूरा घटनाक्रम 4 अगस्त को फूकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की एयरबस ए320 उड़ान (विमान पंजीकरण VT-EXO) से जुड़ा है। उड़ान के दौरान विमान अचानक 300 फीट नीचे गोता खा गया था। इस भयानक झटके के कारण कुल 24 लोग घायल हुए थे, जिनमें 20 यात्री और चालक दल के चार सदस्य शामिल थे। स्थिति इतनी गंभीर थी कि 17 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उस वक्त विमान में 137 यात्री, छह केबिन क्रू और दो पायलट सवार थे। इस घटना को गंभीर श्रेणी में रखा गया है और एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) इसकी गहन जांच कर रहा है।
शुरुआत में एयरलाइन और प्रशासन दोनों ने ही इस घटना का कारण खराब मौसम और भारी टर्बुलेंस को माना था। लेकिन अब मुख्य पायलट के आचरण पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूत्रों के अनुसार, घटना के बाद हुए शुरुआती ड्रग स्क्रीनिंग में पायलट का नतीजा ‘नॉन-नेगेटिव’ आया था। इसके बाद जब पुष्टिकरण के लिए उन्नत परीक्षण किया गया, तो उसमें मारिजुआना (गांजा) के सेवन की पुष्टि हुई। हालांकि, जांचकर्ता अभी यह पता लगा रहे हैं कि पायलट ने इसका सेवन उड़ान से कितनी देर पहले किया था या क्या वह विमान उड़ाते समय इसके प्रभाव में था।
अपने बचाव में मुख्य पायलट ने अधिकारियों को बताया है कि वह अपने पारिवारिक डॉक्टर की सलाह पर नींद न आने की बीमारी की दवा ले रहा था। उसका यह भी दावा है कि घटना के वक्त वह विमान के कंट्रोल्स नहीं संभाल रहा था, बल्कि सह-पायलट की सीट के ठीक पीछे खड़ा था। इस पूरे मामले में एक और पहलू यह भी है कि उस वक्त एयरबस ए320 जेट की हाइड्रोलिक और नियंत्रण प्रणालियों में भी संभवतः कोई तकनीकी खराबी आई थी। इस तकनीकी कोण की जांच के लिए विमान निर्माता कंपनी एयरबस और फ्रांसीसी विमानन दुर्घटना जांच प्राधिकरण (BEA) भी भारतीय एजेंसियों की मदद कर रहे हैं।
विमानन क्षेत्र में काम करने वाले कर्मियों के ड्रग सेवन की जांच को लेकर डीजीसीए ने सितंबर 2021 में सख्त नियम जारी किए थे, जिन्हें 31 जनवरी 2022 से प्रभाव में लाया गया था। इन नियमों के दायरे में पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर के अलावा विमान का रखरखाव करने वाले इंजीनियर, प्रशिक्षक और अन्य सभी संवेदनशील पदों पर बैठे कर्मचारी आते हैं।
डीजीसीए के दिशानिर्देशों के तहत कर्मचारियों के मूत्र के नमूनों की छह प्रकार के साइकोएक्टिव पदार्थों के लिए सघन जांच की जाती है। इन पदार्थों में एम्फ़ैटेमिन, ओपिएट्स, भांग (कैनाबिस), कोकीन, बार्बिटुरेट्स और बेंजोडायजेपाइन शामिल हैं। जांच के दौरान नमूने को दो अलग-अलग हिस्सों में सुरक्षित रखा जाता है। अगर शुरुआती जांच का नतीजा ‘नॉन-नेगेटिव’ आता है, तो संबंधित पायलट को तत्काल प्रभाव से उड़ान ड्यूटी से हटा दिया जाता है।
इसके बाद दूसरे सुरक्षित नमूने को गैस क्रोमैटोग्राफी (GC/MS) या लिक्विड क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री (LC-MS) जैसी उच्च-स्तरीय तकनीक वाली प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। अगर यह पुष्टिकरण परीक्षण भी पॉजिटिव निकलता है, तो मेडिकल रिव्यू ऑफिसर (MRO) यह तय करता है कि क्या यह किसी वैध चिकित्सीय इलाज के कारण हुआ है (जैसे दर्द निवारक दवाओं में मौजूद कोडीन का प्रभाव) या फिर यह सीधे तौर पर नशीले पदार्थों का दुरुपयोग है।
यदि जांच में किसी भी तरह के नशे के दुरुपयोग की पुष्टि हो जाती है, तो इसके बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई का सख्त दौर शुरू होता है। पहली बार नियम तोड़ने पर कर्मचारी को नशामुक्ति केंद्र या पुनर्वास कार्यक्रम में भेजा जाता है। पूरी तरह स्वस्थ होने और नई जांच रिपोर्ट नेगेटिव आने पर ही उसे वापस ड्यूटी दी जाती है।
यदि ड्यूटी पर लौटने के बाद वह दूसरी बार पॉजिटिव पाया जाता है, तो उसका लाइसेंस तीन साल के लिए निलंबित कर दिया जाता है। वहीं, तीसरी बार यह गलती दोहराने का सीधा मतलब है पायलट के लाइसेंस को हमेशा के लिए रद्द कर देना।
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