सिंधु घाटी या हड़प्पा सभ्यता में जैसे-जैसे शहरों का विकास हुआ, वैसे-वैसे वहां के लोगों के रहन-सहन के साथ-साथ उनके खान-पान में भी बड़ा बदलाव आया। शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने एक हालिया अध्ययन में प्राचीन दांतों का विश्लेषण कर यह दिलचस्प खुलासा किया है।
इस शोध के तहत पुरातात्विक स्थलों से मिले 22 मानव दांतों का गहराई से विश्लेषण किया गया। इनमें से 12 दांत गुजरात के कच्छ जिले के जूना खतिया गांव से मिले थे, जबकि 10 नमूने हरियाणा के राखीगढ़ी से जुटाए गए। वैज्ञानिकों ने इन प्राचीन दांतों पर मौजूद बेहद सूक्ष्म घिसाव (माइक्रोस्कोपिक वियर पैटर्न) की जांच की, ताकि इन दोनों आबादियों की भोजन संबंधी आदतों और उनके अंतर को बारीकी से समझा जा सके।
अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि 3200 ईसा पूर्व से 2600 ईसा पूर्व के बीच जूना खतिया में रहने वाले लोग काफी सख्त और कम प्रसंस्कृत (प्रोसेस्ड) भोजन खाते थे। इसके विपरीत, 2500 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच परिपक्व हड़प्पा काल के दौरान राखीगढ़ी में रहने वाले लोगों का भोजन ज्यादा नरम और काफी हद तक प्रोसेस्ड होता था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भोजन तैयार करने के तरीकों पर शहरीकरण के सीधे प्रभाव को दर्शाता है।
दांतों की बनावट और घिसाव की बात करें तो जूना खतिया से मिले नमूनों में ज्यादा जटिलता और विविधता पाई गई है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उनका आहार चबाने में कठोर और खुरदुरा था। वहीं दूसरी तरफ, राखीगढ़ी के दांतों में घिसाव की जटिलता काफी कम थी। अमूमन इस तरह का पैटर्न तब बनता है जब इंसान बहुत नरम और पकाया हुआ या अच्छी तरह से प्रोसेस किया गया खाना खाता है।
यह शोध इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि दोनों ही जगहों की आबादी के पास भोजन के लगभग एक समान संसाधन मौजूद थे। पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, हड़प्पा सभ्यता के लोग बाजरा, गेहूं, जौ और चावल जैसे अनाजों के साथ-साथ कई तरह की दालें और पौधे उगाते थे। इसके अलावा, वे पालतू जानवरों, जंगली शिकार और मछलियों का भी मांस खाते थे।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण, अलग-अलग पेशों की शुरुआत और घनी आबादी वाले केंद्रों के निर्माण ने शायद भोजन के उत्पादन, प्रोसेसिंग और वितरण की एक मानकीकृत प्रणाली को जन्म दिया।
इसी वजह से उनकी आहार शैली में यह बड़ा बदलाव देखने को मिला। हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह सिद्धांत अभी शुरुआती है और इसकी पूरी तरह से पुष्टि के लिए भविष्य में अन्य पुरातात्विक स्थलों से बड़े पैमाने पर साक्ष्य जुटाने की आवश्यकता है।
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