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92 साल की उम्र में सुरों की मल्लिका आशा भोसले का निधन

| Updated: April 13, 2026 14:42

92 वर्ष की आयु में मशहूर पार्श्व गायिका आशा भोसले ने ली अंतिम सांस, भारतीय संगीत के एक सुनहरे और यादगार युग का हुआ अंत।

भारतीय संगीत जगत को एक बेहद गहरा और अपूरणीय सदमा लगा है। दिग्गज पार्श्व गायिका आशा भोसले ने मुंबई में 92 वर्ष की आयु में अपनी अंतिम सांस ली। वह पिछले कई महीनों से बीमार चल रही थीं और उन्हें हृदय तथा सांस से जुड़ी गंभीर जटिलताओं के चलते ब्रीच कैंडी अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। उनके बेटे आनंद भोसले ने इस दुखद खबर की आधिकारिक पुष्टि की है। दिग्गज गायिका का अंतिम संस्कार सोमवार को किया जाएगा।

बचपन और संघर्ष भरे शुरुआती दिन

साल 1933 में प्रतिष्ठित मंगेशकर परिवार में जन्मीं आशा ने महज नौ साल की छोटी सी उम्र में ही अपने संगीतमय सफर की शुरुआत कर दी थी। उन्होंने उस दौर में प्लेबैक सिंगिंग की दुनिया में कदम रखा जब यह इंडस्ट्री खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रही थी।

हालांकि उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने जल्द ही संगीत जगत पर अपना दबदबा बना लिया था, लेकिन आशा ने अपने लिए एक अलग और बेहद स्वतंत्र पहचान गढ़ी। उनकी यह सफलता केवल उनके हुनर पर ही नहीं, बल्कि वक्त के साथ खुद को ढालने की उनकी अद्भुत क्षमता पर टिकी थी।

उनके शुरुआती बॉलीवुड करियर में उन्हें एक खास तरह के गानों तक सीमित कर दिया गया था। वह कैबरे और डांस नंबर्स के लिए संगीतकारों की पहली पसंद बन गई थीं, जिनमें से ज्यादातर गाने मशहूर अभिनेत्री हेलन पर फिल्माए जाते थे। ‘पिया तू अब तो आजा’ और ‘ये मेरा दिल’ जैसे गीत हमारी पॉप संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन गए। लेकिन आशा भोसले की बेमिसाल प्रतिभा को केवल इन गानों तक समेट कर देखना उनकी विरासत का बहुत गलत आकलन होगा।

रूढ़ियों को तोड़कर बनाई अलग पहचान

उन्होंने इस रूढ़िवादी छवि को बेहद शानदार तरीके से तोड़कर रख दिया। फिल्म ‘उमराव जान’ में गाई गई उनकी भावपूर्ण गजलें और ‘इजाज़त’ फिल्म का गीत ‘मेरा कुछ सामान’ उनकी उस बहुमुखी गायन क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, जिसकी बराबरी शायद ही कोई कर सके।

इन बेहतरीन प्रस्तुतियों के लिए उन्हें दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के साथ-साथ कई फिल्मफेयर पुरस्कारों से नवाजा गया, जिससे भारतीय संगीत के इतिहास में सबसे वर्सेटाइल गायिका के रूप में उनका रुतबा हमेशा के लिए तय हो गया।

आर.डी. बर्मन के साथ जादुई सफर और निजी जीवन

मशहूर संगीतकार राहुल देव बर्मन के साथ उनकी जुगलबंदी ने हिंदी सिनेमा के संगीत को पूरी तरह से एक नया आयाम दिया। दोनों ने मिलकर पश्चिमी संगीत, जैज़, पॉप और लोक धुनों के साथ कई सफल प्रयोग किए और ऐसा काम किया जो हमेशा के लिए अमर हो गया।

उनका यह साथ, जो व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों ही मोर्चों पर था, 1994 में बर्मन के निधन तक चला। इस साझेदारी ने बॉलीवुड को उसके इतिहास के कुछ सबसे यादगार और जादुई गीत दिए।

चमक-दमक से दूर आशा जी का निजी जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर महज 16 साल की उम्र में गणपतराव भोसले से शादी कर ली थी।

हालांकि, कई सालों की कठिनाइयों और संघर्ष के बाद उनका यह रिश्ता टूट गया। बाद में आर.डी. बर्मन के साथ उनके विवाह को भी काफी विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन यह भारतीय संगीत के इतिहास में सबसे रचनात्मक और सफल साझेदारियों में से एक साबित हुई।

शास्त्रीय संगीत से लगाव और अतुलनीय विरासत

अपने जीवन के आखिरी वर्षों में वह संगीत से गहराई से जुड़ी रहीं, हालांकि वह आधुनिक बॉलीवुड संगीत से काफी हद तक दूर हो गई थीं। उन्होंने अक्सर शास्त्रीय संगीत की परंपराओं के प्रति अपने झुकाव का जिक्र किया। अपनी गायन कला को और निखारने के लिए वह अक्सर पंडित भीमसेन जोशी जैसे दिग्गजों को सुना करती थीं।

सात दशकों से भी अधिक लंबे अपने शानदार करियर में, आशा भोसले ने कई भाषाओं में हजारों गाने रिकॉर्ड किए, जिसने उन्हें दुनिया में सबसे ज्यादा गीत रिकॉर्ड करने वाले कलाकारों की सूची में ला खड़ा किया।

उनकी आवाज ने ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा से लेकर आज के डिजिटल युग तक का सफर तय किया। उन्होंने हर युग के हिसाब से खुद को ढाला, विकसित किया और फिर भी अपनी वह एक खास और अनोखी पहचान हमेशा बरकरार रखी।

उनके निधन से भारतीय संगीत जगत ने सिर्फ एक गायिका को ही नहीं, बल्कि एक पूरी संस्था को खो दिया है।

लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे दिग्गजों के साथ, आशा भोसले उस खास पीढ़ी का हिस्सा थीं जिन्होंने सिर्फ गाने नहीं गाए, बल्कि पूरे देश की भावनात्मक स्मृतियों को एक नया आकार दिया। एक युग का अंत बार-बार नहीं होता, लेकिन आज वास्तव में एक युग का अंत हो गया है।

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