भारत में महंगे चुनाव: चुनाव आयोग की नई खर्च सीमा लोकतंत्र के साथ मजाक है

| Updated: January 17, 2022 9:00 pm

पिछले सप्ताह प्रकाशित एक महत्वपूर्ण डेटा बिंदु पर ध्यान देना चाहिए। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के आउर वर्ल्ड इन डेटा पर मैक्स रोजर का ब्लॉग दुनिया को याद दिलाता है कि दुनिया का अधिकांश हिस्सा गरीब है, लेकिन भारत के लिए, यह विशेष रूप से संकट की भयावहता को रेखांकित करता है- “99.5% भारतीय एक दिन में 30 डॉलर से कम खर्च कर पाते हैं।”
लेकिन जब चुनाव आयोग (ईसी) की अधिसूचना के साथ देखा जाता है, जो पांच राज्यों के चुनावों से ऐन पहले आई है, तो अब से सभी चुनावों के लिए संसदीय क्षेत्रों में चुनावी खर्च की सीमा 54 से 70 लाख रुपये को बढ़ाकर 75 से 90 लाख रुपये कर दिया गया है। विधानसभा क्षेत्रों के लिए 20 लाख से 28 लाख रुपये वाली खर्च सीमा को बढ़ाकर 28 लाख से 40 लाख रुपये कर दिया गया हो, जो खतरे की घंटी है। यह भारत में लोकतंत्र जिस दिशा में जा रहा है और उसके 99.5% लोगों के जीवन के बीच बेमेल उदाहरण पेश करता है।
आखिर क्या है बढ़ने का कारण? “राजनीतिक दलों की मौजूदा चुनावी खर्च की सीमा बढ़ाने की मांग के संबंध में” चुनाव आयोग ने मतदाताओं की संख्या में 834 मिलियन से 936 मिलियन की वृद्धि का हवाला दिया है, जो 2014 में थी।
यह कॉस्ट इन्फ्लेशन इंडेक्स का भी हवाला देता है, जो कहता है कि यह “32.08% तक” है, इसलिए अधिक “वर्चुअल कैंपेनिंग” की आवश्यकता है।
बढ़ोतरी क्यों है घातक?
यह मानक और व्यावहारिक दोनों कारणों से हानिकारक है। आम तौर पर पर्याप्त धन न होना कैसे मानक हो सकता है, जो एक अच्छे उम्मीदवार को चुनाव में उतने से रोकता है?
हमारा संविधान सुनिश्चित करता है कि सभी वयस्क अलग-अलग त्वचा के रंग, धर्म, क्षेत्र, जाति, वर्ग या शैक्षिक योग्यता के बावजूद मतदान कर सकते हैं। चुनाव लड़ने के योग्य लोगों के लिए नियम निश्चित रूप से क्षेत्र को संकीर्ण करते हैं, लेकिन हमारे संविधान की भावना कहती है कि सभी भारतीयों को चुनाव लड़ने में सक्षम होने के बारे में सोचने में सक्षम होना चाहिए। इसमें वित्त को आखिरी बाधा होनी चाहिए।
आपके द्वारा खर्च की जा सकने वाली अधिकतम राशि की सीमा बढ़ाना मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए बड़े पैमाने पर खर्च को वैध बनाता है, और इससे लोकतंत्र की सेहत को गहरा नुकसान होता है। वह भी एक ऐसे लोकतंत्र का, जो सीमित साधनों वाले लोगों की भारी संख्या से बना है। संक्षेप में, लोगों के चुनाव नहीं लड़ने के लिए पैसे को बाधा मानना भारतीय लोकतंत्र को पीछे की ओर धकेलता है, आगे की ओर नहीं।
यह कदम व्यावहारिक रूप से हानिकारक है, क्योंकि यह लोकतांत्रिक क्षेत्र को विकृत करता है। साथ ही वर्तमान स्थिति में, जहां अपारदर्शी वित्त ने पहले से ही सत्तारूढ़ दल के पक्ष में पलड़ा भारी कर रखा है।
अगस्त 2021 में एक आकलन में पाया गया कि भाजपा को 2,555 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड मिले, जो कि 2019-20 में कुल तीन-चौथाई से अधिक है, और यह “2018-19 में प्राप्त से 1450 करोड़ रुपये के इलेक्टोरल बॉन्ड से 75% की छलांग” है।


निराशा पैदा कर रहा है चुनाव आयोग
इसलिए उन सवालों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, जिन पर चुनाव प्रहरी हमला कर रहे हैं, जैसे कि पार्टियों के वित्त पोषण के स्रोत को और अधिक खुला बनाना और राजनीतिक दलों द्वारा खर्च की जाने वाली राशि को सीमित करना (जो कि उम्मीदवार के वित्तपोषण पर सीमा को दरकिनार करने के लिए उपयोग किया जाता है), उम्मीदवारों का खर्च बढ़ाना लोकतंत्र को औसत मतदाता से और भी दूर ले जाता है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने 2020 में बताया था कि “नौ कार्यकारी समूहों” (राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारी और अन्य ईसीआई अधिकारियों को शामिल करते हुए) ने ईसीआई को अपनी मसौदा सिफारिशें प्रस्तुत कीं, जिनमें यह सुझाव दिया गया था कि राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव के लिए किया जाने वाले खर्च की सीमा तय करने की आवश्यकता है। 2015 में भारतीय चुनाव आयोग ने कानून मंत्रालय को एक सिफारिश की, जिसमें राजनीतिक दलों के अधिकतम खर्च को प्रत्याशियों की कुल संख्या के आधार पर अलग-अलग उम्मीदवारों के लिए अधिकतम निर्धारित सीमा के आधे से अधिक तक सीमित करने का प्रस्ताव रखा गया था।
यह भी सिफारिश की कि “इस संबंध में कदम उठाए जाने चाहिए और तौर-तरीकों को समयबद्ध तरीके से तैयार किया जाना चाहिए।” लेकिन सार्थक सुधार से दूर, हम देखते हैं कि चुनाव आयोग को तो एक ऐसी संस्था के रूप में काम करने के लिए तैयार किया गया है, जिसकी स्वायत्तता ही देश को लोकतांत्रिक बनाए रखने का आधार है, और यह गहरी निराशा पैदा करता है।


2019: अभियान वित्त के लिए “वाटरशेड चुनाव”
2019 का चुनाव उन लोगों के लिए खतरे की घंटी होनी चाहिए जो यह देखने में रुचि रखते हैं कि भारतीय लोकतंत्र अपने सबसे गरीब नागरिकों की सेवा करता है। उस चुनाव में 55,000 करोड़ रुपये या 8 बिलियन डॉलर खर्च किया गया, जिसमें से भाजपा द्वारा लगभग आधी राशि खर्च की गई थी। खर्च के लिहाज से वह किसी भी समय और कहीं भी सबसे महंगा चुनाव था।
इसने 2016 में अमेरिकी चुनाव को भी पीछे छोड़ दिया, जिसे सेंटर फॉर रिस्पॉन्सिव पॉलिटिक्स ने 6.5 बिलियन डॉलर के खर्च का चुनाव बताया था।
सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की 2019 की रिपोर्ट में कहा गया है, “20 वर्षों में 1998 और 2019 के बीच लोकसभा के छह चुनावों में, चुनाव खर्च 9,000 करोड़ रुपये से लगभग छह गुना बढ़कर लगभग 55,000 करोड़ रुपये हो गया है।” यह देखना दिलचस्प है कि सत्ताधारी पार्टी दूसरों की तुलना में अधिक खर्च करने के लिए कैसे तैयार होती है।”
दुर्बल करने वाली महामारी के दो साल बाद, एक गरीब देश में इस तरह के चौंकाने वाले तथ्यों की एकमात्र प्रतिक्रिया अति-अमीरों को विशेषाधिकार देना नहीं हो सकता है। एडीआर ने 2019 को इस लिहाज से “ऐतिहासिक चुनाव” करार दिया क्योंकि “पोल फंडिंग का एक प्रमुख स्रोत अब कॉर्पोरेट है और पारदर्शिता के नाम पर उस प्रक्रिया में गोपनीयता को बढ़ावा दिया जाता है।”


पैसा वोट नहीं खरीद सकता, या हो सकता है?
जहां तक लोकतंत्र की स्थिति का सवाल है, तो भारत एक निर्णायक क्षण में है। इसने अपनी लोकतांत्रिक स्थिति में भारी गिरावट देखी है, जिसे पिछले एक साल में फ्रीडम हाउस, वी-डेम इंस्टीट्यूट, द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट डेमोक्रेसी इंडेक्स, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स, पेन इंटरनेशनल और इंटरनेशनल आईडीईए द्वारा सावधानीपूर्वक दर्ज किया गया है। वी-डेम ने 2021 में भारत को ‘चुनावी निरंकुशता’ करार दिया है, न कि लोकतंत्र। लेकिन इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि इस साल दक्षिण एशिया में रूटलेज हैंडबुक ऑफ ऑटोक्रेटाइजेशन में बताया गया है, “चुनाव प्रबंधन निकाय (चुनाव आयोग) की स्वायत्तता 2013 के बाद से गंभीर रूप से कम हो गई है, जो शायद गिरावट के सबसे चिंकनीय पहलू का संकेत है।” भारत में सरकारों ने हमेशा “स्वतंत्र और निष्पक्ष” चुनावों में सत्ता से बाहर होने के बाद पद छोड़ दिया है, यह सच है। लेकिन जब भारत का ‘चुनाव प्रबंधन निकाय’ चुनावी बांड जैसे वित्तपोषण के अपारदर्शी तरीकों से लड़ने के बजाय, या कुछ ठोस और मजबूत निगरानी करने के लिए, चुनाव लड़ने के तथ्य को अत्यधिक आर्थिक विशेषाधिकार का कारक बनाने के लिए आगे बढ़ता है, तो यह भारत को झटका देने के बराबर है। अधिक फिसलन तेजी से ढलान के नीचे जा रही है। आर्थिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार का खतरनाक कॉकटेल भारत के लिए बहुत महंगा साबित होगा।

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