फिल्म इंडस्ट्री का पहला खान, जो पहला देशभक्त भी था

| Updated: July 8, 2021 8:20 pm

जीवन भी मृत्यु के समान ही विस्मयकारी हो सकता है। एक अचानक हुई प्रलयंकारी घटना, जिसकी उत्पत्ति किसी की कल्पना से परे होती है और जिसके परिणाम किसी के नियंत्रण से बाहर होते हैं, आपको हरसंभव परिस्थिति से दूर कहीं अनजान स्थिति में पहुंचा देती है।

1947 में भारत के विभाजन के समय मोहम्मद यूसुफ खान 28 वर्ष के थे और उनका जन्मस्थान पेशावर, पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। उनके पिता लाला गुलाम सरवर खान फलों के व्यापारी थे, जिनका पेशावर में बाग था। वह 1930 के दशक में ही परिवार को महाराष्ट्र ले आए थे। वह गर्व से अपने नाम के आगे ‘लाला’ लिखते थे, जो भारत के उत्तर पश्चिम सीमांत के उल्लेखनीय धर्मनिरपेक्ष सद्भाव का प्रतीक था।

लेकिन राजनीति ने इस समन्वित समाज में जहर भरना शुरू कर दिया था। यह स्कूली ज्ञान है कि अंग्रेजों ने भारत में रेलवे की शुरुआत की। अफसोस की बात है कि हमारे स्कूली बच्चों को अभी भी यह नहीं बताया गया है कि अंग्रेजों ने रेलवे के माध्यम से सांप्रदायिकता का इंजेक्शन लगाया। फ्रंटियर मेल से यात्रा करते समय किशोर यूसुफ ने प्लेटफॉर्म पर ‘हिंदू चाय’ और ‘मुस्लिम चाय’ की आवाजें सुनीं। पेशावर से ढाका तक पानी के नलों पर ‘हिंदू पानी’ और ‘मुस्लिम पानी’ का लेबल लगा हुआ था।

एक युवा के रूप में यूसुफ ने कुछ नौकरियां पाने की कोशिश की। लेकिन प्रसिद्ध अभिनेत्री देविका रानी और बॉम्बे टॉकीज के मालिक एवं उनके पति हिमांशु राय से मुलाकात से पहले तक उन्हें कुछ नहीं मिल पाया था। उनके चेहरे, उनकी बोलचाल, चाल और प्रतिभा से सुखद रूप से दोनों चौंक गए। उन्होंने यूसुफ को फिल्म उद्योग में करियर बनाने का सुझाव दिया। यह उद्योग उस समय अपने शुरुआती दौर में था। देविका रानी ने उन्हें अपने लिए स्क्रीन पर दिखाने के लिए एक नया नाम चुनने को कहा। और, यूसुफ ने ‘दिलीप कुमार’ को चुना।

उनकी पहली फिल्म ज्वार भाटा फ्लॉप रही थी। 1949 में यादगार फिल्म अंदाज़ के रिलीज होने तक उन्हें खास पहचान नहीं मिल पाई थी। इस फिल्म में उन्होंने पेशावर में जन्मे अपने दोस्त राज कपूर के साथ अभिनय किया था। 1947 में कोई नहीं जानता था कि यूसुफ खान दिलीप कुमार के नाम से एक किंवदंती बन जाएंगे। विभाजन ने उन्हें एक विकल्प दिया था। पाकिस्तान का फिल्म उद्योग प्रतिभा के लिए उत्सुक था।

1947 में मोहम्मद युसूफ खान ने पाकिस्तान के बजाय भारत को चुना, क्योंकि अनगिनत अन्य मुसलमानों की तरह वह भी किसी एक विश्वास की मानसिक जकड़न वाली भूमि के बजाय एक धर्मनिरपेक्ष समाज की बहु-सांस्कृतिक पहचान में विश्वास करते थे।

वह मुंबई के शानदार फिल्म उद्योग के पहले खान और भारत के पहले देशभक्त भी थे। आजादी के सात दशक बाद हमें 1947 के दबावों को कम करके नहीं आंकना चाहिए। देश जानबूझकर फैलाए गए दंगों से जल रहा था। मुंबई एक बड़ी मिली-जुली आबादी वाले किसी भी अन्य शहर की तरह ही अशांत था। एक समुदाय को सपने के रूप में पाकिस्तान बेच दिया गया था। पेशावर में जन्मे और हिंदी बोली बोलने वाले किसी युवा के लिए वहां जाने का विचार स्वाभाविक होता। उस समय में दिलीप कुमार का भारतीय बने रहने का निर्णय किसी अल्पकालिक प्रलोभन पर दृढ़ विश्वास और विचारधारा की विजय था।

दिलीप कुमार को राजनीति के प्रति ज्यादा लगाव नहीं था। हालांकि उन्हें कांग्रेस ने राज्यसभा के लिए चुना था। लेकिन धर्मनिरपेक्षता, समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र के मूलभूत स्तंभों पर निर्मित भारत के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता थी।

पिछले तीन दशक के तीन खान शाहरुख, आमिर और सलमान ने कभी भी स्क्रीन के लिए अलग नाम अपनाने की जरूरत महसूस नहीं की। भारतीय, जो फिल्म उद्योग को जीवित रखते हैं, वे 1940 के दशक की हिचकिचाहट से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। यही अंतर है। युसूफ खान ब्रिटिश भारत में दिलीप कुमार बने। शाहरुख, आमिर और सलमान का जन्म भारतीय भारत में हुआ।

दिलीप कुमार अभिनेता के तौर पर फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाले पहले विजेता थे। एक फिल्म के लिए फीस के रूप में 100,000 रुपये प्राप्त करने वाले भी पहले अभिनेता थे। वह एक अंतरराष्ट्रीय स्टार बन सकते थे, अगर उन्होंने डेविड लीन की ओर से लॉरेंस ऑफ अरबिया में भूमिका के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया होता, जिसे अंततः मिस्र के उमर शरीफ ने निभाया। उनकी प्रतिष्ठा के मामले में मेरी एकमात्र आपत्ति उन्हें ‘ट्रेजेडी किंग’ का टैग मिलना है। आजाद और कोहिनूर फिल्मों को जिसने भी देखा है, वह जानता है कि उनकी प्रतिभा किसी एक आयाम तक सीमित नहीं थी। ऐसी उपलब्धि समर्पण से मिलती है। मधुबन में राधिका नाचे रे गाते समय उन्हें सितार बजाते हुए देखिए। आप एक ऐसे गुणी को देखेंगे, जिसने दो घंटे की फिल्म में पांच मिनट के उस दृश्य के साथ न्याय करने के लिए विधिवत तरीके से सितार बजाना सीखा था। मेहनत से प्रतिभा को निखारना पड़ता है।

दिलीप कुमार भरोसे की शख्सियत थे। जैसा कि पवित्र कुरान की आयत कहती है, वह अल्लाह की ओर से आया और अल्लाह के पास गया। दिलीप कुमार ने हमारे लिए एक संदेश छोड़ा है: भारतीय मुसलमान एक देशभक्त है।

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