अहमदाबाद/वडोदरा: “चार महीने बीत चुके हैं—हमने अपनी बहन, एक बेटी और अपना घर, सब कुछ खो दिया है।” यह कहते हुए 28 वर्षीय रिफत जहां की आवाज़ भारी हो जाती है और वह अपने आंसू रोकने की कोशिश करती हैं।
चश्मे के पीछे से रिफत की आंखों में गुस्सा साफ झलकता है। वह अहमदाबाद के गोमतीपुर इलाके की ‘चोकसी नी चाली’ बस्ती में अपनी बुआ के दो कमरों वाले छोटे से घर के कोने में बैठी हैं। यह इलाका संकरी गलियों और एक-दूसरे से सटी कंक्रीट की इमारतों से अटा पड़ा है।
बातचीत के दौरान रिफत संकरी गली के पार एक घर की ओर इशारा करती हैं। यह वही जगह है जहां 9 अगस्त 2025 की दोपहर को उनकी 15 साल की छोटी बहन सानिया अंसारी फंदे से लटकी मिली थी।
सानिया ने आत्महत्या कर ली थी और अपने पीछे एक सुसाइड नोट छोड़ गई थी, जिसमें छह लोगों के नाम थे। परिवार का स्पष्ट मानना है कि यह केवल एक आत्महत्या नहीं थी, बल्कि लगातार हो रहे उत्पीड़न, शारीरिक हिंसा और सिस्टम की संवेदनहीनता का दुखद परिणाम था।
कानूनी जानकारों की मानें तो इस उत्पीड़न को अंशतः उस कानून से भी बल मिला, जो गुजरात में रिहायशी बसावटों और अलगाव को गहराई से प्रभावित कर रहा है—जिसे आधिकारिक तौर पर ‘अशांत क्षेत्र अधिनियम’ (Disturbed Areas Act) कहा जाता है। यह कानून पहली बार 1986 में अहमदाबाद के सांप्रदायिक दंगों के बाद लाया गया था।
शुरुआत में इसे तनावग्रस्त इलाकों से पलायन कर रहे लोगों को औने-पौने दामों में अपनी संपत्ति बेचने से रोकने के लिए एक अस्थायी उपाय के तौर पर पेश किया गया था। हालांकि, 1991 में इसे स्थायी कर दिया गया और तब से यह राज्य के प्रमुख कस्बों और शहरों में लगातार फैल रहा है।
वर्तमान में यह अधिनियम गुजरात के 33 में से 18 जिलों में लागू है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह धार्मिक अलगाव को मजबूत कर रहा है, कट्टरपंथी समूहों को बढ़ावा दे रहा है, और किसी हिंदू बहुल इलाके में घर खरीदना मुस्लिम खरीदारों के लिए एक सजा में तब्दील हो गया है।
पाबंदियों का जाल
इस अधिनियम की धारा 3 के तहत, राज्य सरकार किसी भी इलाके को अतीत में हुई किसी भी भीड़ की हिंसा या दंगे के आधार पर ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर सकती है।
- ऐसे क्षेत्रों में किसी भी संपत्ति के लेनदेन के लिए जिला कलेक्टर की पूर्व अनुमति अनिवार्य है।
- कलेक्टर पुलिस या अपने स्तर पर जांच करवाता है।
- यह सुनिश्चित किया जाता है कि संपत्ति का सौदा ‘स्वतंत्र सहमति’ और ‘उचित बाजार मूल्य’ पर हुआ है या नहीं।
हालाँकि, इस कानून का व्यापक दुरुपयोग देखा जा रहा है। 2002 के दंगों के बाद से जहां कोई गंभीर हिंसा नहीं हुई है, उन इलाकों को भी लगातार ‘अशांत’ घोषित किया जा रहा है। राज्य का राजस्व विभाग समय-समय पर नई कॉलोनियों और यहां तक कि अलग-थलग खड़ी इमारतों को भी इस सूची में डाल रहा है।
अन्य भाजपा शासित राज्य भी अब इस मॉडल को अपना रहे हैं। अगस्त 2025 में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने घोषणा की कि अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच संपत्ति सौदों को पहले राज्य द्वारा सत्यापित और मंजूर किया जाएगा। इसी तरह, जनवरी 2026 में राजस्थान सरकार ने भी ‘जनसांख्यिकीय असंतुलन’ (demographic imbalance) को रोकने के नाम पर कुछ क्षेत्रों को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित करने वाले एक बिल को मंजूरी दी है।
‘अशांत क्षेत्रों’ का बढ़ता दायरा
जनवरी 2025 में, गुजरात राजस्व विभाग ने वडोदरा के 312 स्थानों को अगले पांच वर्षों के लिए ‘अशांत’ घोषित किया। आंकड़ों के अनुसार, 2014 में (जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे) अहमदाबाद का लगभग 40% हिस्सा इस श्रेणी में आता था।
किंग्स कॉलेज लंदन की सीनियर लेक्चरर डॉ. शीबा तेजानी की 2022 की एक स्टडी के मुताबिक, 2013 से 2019 के बीच अहमदाबाद के अशांत क्षेत्रों में 51% का विस्तार हुआ।
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के शिक्षाविद राफेल सुसेविंड ने 2017 की अपनी स्टडी में अहमदाबाद को मुस्लिमों के लिए भारत का ‘सबसे अलग-थलग’ (most segregated) शहर बताया था, जिसके बाद हैदराबाद और दिल्ली का नंबर आता है।
राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस्टोफ़ जाफरलॉट और शोधकर्ता शारिक लालीवाला ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखा था कि इस कानून के कारण “हिंदू और मुस्लिम अब पड़ोसी नहीं रहे हैं, उनके बच्चे साथ खेल या मिल नहीं सकते, जिससे उनके सामाजिक संबंध सीमित हो गए हैं और दोनों समुदायों के बीच एक-दूसरे को लेकर मिथक पनप रहे हैं।”
अहमदाबाद के एक वकील (जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बात की) ने बताया कि अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा, राजकोट, भावनगर और भरूच जैसे बड़े शहरों सहित कम से कम 18 जिले इस कानून की चपेट में हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
मुस्लिमों के खिलाफ हथियार बना कानून
आज यह कानून उन मुस्लिम खरीदारों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है जो हिंदुओं से संपत्ति खरीदते हैं। सानिया अंसारी के परिवार के लिए भी यह कानून एक हथियार बन गया।
सानिया के माता-पिता, 54 वर्षीय शाह जहां और 55 वर्षीय मोहम्मद जलील, दशकों से ‘चोकसी नी चाली’ में रह रहे थे। 2024 में, अपने रहन-सहन को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अपने ठीक सामने रहने वाली पड़ोसी सुमनबेन सोनावणे का घर लगभग 15,50,000 रुपये में खरीदा। दिसंबर 2024 तक पूरा पैसा चुका दिया गया।
लेकिन कुछ ही समय बाद, सुमनबेन का बेटा दिनेश सोनावणे अपनी पत्नी सरला और वयस्क बेटे मानव के साथ उस घर में वापस आ गया और उसे खाली करने से साफ इनकार कर दिया।
रिफत जहां बताती हैं, “जिस दिन से मेरी मां ने सौदा पक्का किया, उन्होंने हमारी जिंदगी नर्क बना दी।”
अंसारी परिवार घर का मालिक होने के बावजूद केवल ग्राउंड फ्लोर का ही इस्तेमाल कर पा रहा था, जबकि सोनावणे परिवार ऊपर की मंजिल पर जमा रहा। जब भी अंसारी परिवार मरम्मत या सफाई के लिए जाता, उन्हें गालियां दी जातीं।
रिफत ने बताया, “वे हम पर गंदा पानी फेंकते और गली में हमारे पीछे चिल्लाते हुए आते। मानव तो सानिया को स्कूल जाते वक्त मुख्य सड़क तक परेशान करता था।”
सुमनबेन के बार-बार कहने के बावजूद उनका बेटा और पोता घर से नहीं गए और ‘अशांत धारा’ का हवाला देते हुए कहने लगे, “मुस्लिम यहां संपत्ति कैसे खरीद सकते हैं? यह एक अशांत क्षेत्र है।”
पुलिस की निष्क्रियता और बढ़ती हिंसा
शाह जहां ने कई बार गोमतीपुर पुलिस स्टेशन का दरवाजा खटखटाया, लेकिन आरोप है कि उन्हें वहां से लौटा दिया गया। पुलिस ने उल्टा उनसे कहा, “यह एक अशांत क्षेत्र है। आपने यहां घर खरीदने की कोशिश ही क्यों की?” दिनेश या मानव के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई।
इस मामले पर आर्टिकल 14 न्यूज़ समूह ने नवंबर 2025 और जनवरी 2026 में इस मामले पर गोमतीपुर के इंस्पेक्टर डी. वी. राणा से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला था।
7 अगस्त 2025 को विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। दिनेश, सरला, मानव और कुछ अन्य लोगों ने सानिया के 20 वर्षीय भाई मुसैफ अंसारी पर हमला कर दिया।
रिफत बताती हैं, “जब मुसैफ पर हमला हुआ, तो सानिया उसे बचाने बीच में आ गई। उन्होंने सानिया के बाल खींचे और उसे पीटा। मुसैफ के सिर के पिछले हिस्से पर तब तक वार किया गया जब तक कि खून नहीं बहने लगा।”
परिवार ने एक नाबालिग (सानिया) पर हमले को लेकर पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत मामला दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने केस दर्ज करने से इनकार कर दिया।
इसके ठीक दो दिन बाद, रक्षाबंधन के दिन, सानिया मृत पाई गई। “मेरी मां नए घर में गई तो देखा कि वह ग्राउंड फ्लोर के अंदर वाले कमरे में फांसी पर लटकी थी,” रिफत ने रुंधे गले से बताया। घटना के बाद जब परिवार बदहवास था, दिनेश और मानव फरार हो गए। चार महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी वे पुलिस की पकड़ से बाहर हैं।
परिवार के वकील नीतीश मोहन के अनुसार, अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर से गुहार लगाने के बाद सानिया की मौत के पांच दिन बाद 14 अगस्त को पहली एफआईआर दर्ज की गई। इस बीच, आरोपियों को गुजरात हाईकोर्ट से गिरफ्तारी से अंतरिम राहत मिल गई।
वकील मोहन ने बताया, “उन्हें अंतरिम सुरक्षा मिल गई है, जिसके खिलाफ हमने अपील की है। पुलिस ने अभी तक चार्जशीट भी दाखिल नहीं की है। शुरू में तो पुलिस एफआईआर लिखने को भी तैयार नहीं थी, वे इसे महज एक एक्सीडेंटल डेथ बताकर रफा-दफा करना चाहते थे।”
अलगाववाद को कानूनी जामा
डॉ. शीबा तेजानी की रिसर्च ‘सैफ्रन जियोग्राफिज़ ऑफ़ एक्सक्लूजन’ के अनुसार, इस कानून का असल मकसद सांप्रदायिक हिंसा रोकना नहीं रह गया है, बल्कि इसका इस्तेमाल हिंदू और मुस्लिम बहुल इलाकों को आपस में मिलने से रोकने के लिए किया जा रहा है।
उन्होंने वडोदरा की गीता गोराडिया का उदाहरण दिया, जिन्होंने विरोध के बावजूद अपनी संपत्ति एक मुस्लिम व्यवसायी को बेची थी, जिसके बाद पड़ोसियों ने इस बिक्री को रोकने के लिए इसी एक्ट का सहारा लिया।
दक्षिणपंथी समूह भी इस अलगाव को हवा देते हैं। 2018 में, पालडी जैसे पॉश हिंदू-बहुल इलाके में ‘वर्षा फ्लैट्स’ नाम की एक नई इमारत में कई मुसलमानों ने घर खरीदे। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) और अन्य समूहों ने इसे ‘लैंड जिहाद’ का नाम देकर अफवाहें फैलाईं।
इस प्रोजेक्ट से जुड़े 66 वर्षीय बिल्डर रुक्नुद्दीन शेख बताते हैं कि वीएचपी और हिंदू जागरण मंच से जुड़े अपूर्व शास्त्री और जिगर उपाध्याय के विरोध के बाद उनका प्रोजेक्ट सालों से कोर्ट में अटका हुआ है।
शेख कहते हैं, “इन लोगों ने दावा किया कि 125 फ्लैटों पर मुसलमानों का ‘कब्जा’ हो रहा है और हिंदुओं को भगाया जा रहा है। जबकि कानून के तहत कलेक्टर को केवल यह देखना होता है कि सौदा बिना दबाव और सही दाम पर हुआ है या नहीं, लेकिन अधिकारी ऐसे निगरानी समूहों (vigilantes) की शिकायतों को तरजीह देते हैं।”
‘प्रक्रिया ही सजा है’
संपत्ति कारोबारी नबीउल्लाह पठान (45) का भी यही हाल है। उन्होंने 2023 में गुजरात इंडस्ट्रियल को-ऑपरेटिव बैंक की एक खुली नीलामी में अहमदाबाद के रखियाल इलाके में 1,11,60,000 रुपये में एक इंडस्ट्रियल शेड खरीदा था।
पठान बताते हैं, “मेरी योजना इसे दोबारा विकसित करने की थी। लेकिन मुस्लिम होने के नाते मुझसे कहा गया कि मुझे पहले कलेक्टर से मंजूरी लेनी होगी।”
नवंबर 2023 में आवेदन करने के बाद, अगस्त 2024 में उनका आवेदन खारिज कर दिया गया क्योंकि आसपास के 44 शेड मालिकों ने इसका विरोध करते हुए पुलिस से शिकायत की थी कि एक मुस्लिम के आने से इलाका ‘अशांत’ हो जाएगा।
यह मामला अब अदालत में है, जिसकी पिछली सुनवाई 25 नवंबर 2025 को हुई थी और अगली 23 जनवरी 2026 को होनी है। पठान निराश होकर कहते हैं, “यह नौकरशाही की बाधाओं का अंतहीन दलदल है—प्रक्रिया अपने आप में एक सजा है।”
न्यायपालिका भी त्वरित समाधान नहीं
यूं तो गुजरात उच्च न्यायालय ने कई बार मुस्लिम खरीदारों के पक्ष में फैसले दिए हैं, लेकिन यह प्रक्रिया बहुत थकाऊ है।
वडोदरा के व्यवसायी ओनाली ढोलकावाला और इकबाल टीनवाला के मामले में कानूनी लड़ाई नौ साल तक चली। ढोलकावाला ने 2016 में मोदी बंधुओं से एक हिंदू बहुल इलाके में दुकान खरीदी थी। 2017 में डिप्टी कलेक्टर ने इसे खारिज कर दिया। मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने 2020 में उनके पक्ष में फैसला सुनाया।
इसके बावजूद दक्षिणपंथी समूहों ने उन्हें परेशान करना जारी रखा। ढोलकावाला बताते हैं, “हमें फिर अदालत जाना पड़ा और फरवरी 2023 में हमें फिर से अपने पक्ष में आदेश मिला और परेशान करने वालों पर जुर्माना लगाया गया।”
अंततः जून 2025 में जस्टिस एच.डी. सुथार की अगुवाई वाली बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि ढोलकावाला को सुरक्षित रूप से अपना व्यवसाय चलाने दिया जाए।
राजनीति और बढ़ता दायरा
मूल रूप से अल्पसंख्यकों को उनकी संपत्ति का उचित मूल्य दिलाने के लिए बने इस कानून का अब राजनीतिकरण हो चुका है। डॉ. तेजानी बताती हैं कि राजनेता इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। सूरत में भाजपा विधायकों संगीताबेन पाटिल और पूर्णेश मोदी ने 2017 के चुनावों में इसे मुद्दा बनाया था। वडोदरा में भाजपा विधायक मनीषाबेन वकील के कहने पर इस कानून का दायरा बढ़ाया गया।
गुजरात के अनुभवी भाजपा नेता और पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष सुरेंद्र पटेल इस कानून को ‘खान-पान की आदतों’ से जोड़कर सही ठहराते हैं। उनका कहना है, “अगर मुस्लिम समुदाय के लोग नॉन-वेज खाते हैं और अपने ही बीच रहना पसंद करते हैं, तो उन्हें घुलने-मिलने की क्या जरूरत है? अहमदाबाद के कई इलाके जो पहले हिंदू बहुल थे, अब मुसलमानों के कब्जे में हैं… इसलिए इसे नियंत्रित करना जरूरी है।”
कुछ नेता और भी आक्रामक रुख अपनाते हैं। एलीस ब्रिज के विधायक अमित शाह ने नवंबर 2025 में नूतन सर्वोदय सोसाइटी में एक मुस्लिम व्यक्ति को नौ घर बेचे जाने का विरोध किया और अशांत क्षेत्र अधिनियम का हवाला देते हुए बिक्री रुकवा दी। जब उनसे इस पर सवाल किया गया तो उन्होंने जवाब दिया, “कालूपुर इलाके की भोईवाडा नी पोल जाकर देखिए जहां से हमारा 350 साल पुराना जैन मंदिर शिफ्ट कर दिया गया, आपको जवाब मिल जाएगा।”
2020 में सरकार ने कानून में संशोधन कर कलेक्टरों को सिर्फ “ध्रुवीकरण की आशंका” या “जनसांख्यिकीय असंतुलन” के आधार पर आवेदन खारिज करने का अधिकार देने की कोशिश की थी।
हालांकि जमीयत उलेमा-ए-हिंद की चुनौती के बाद 2021 में हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। 2023 में जमालपुर के एकमात्र मुस्लिम कांग्रेस विधायक इमरान खेड़ावाला ने इसे रद्द करने के लिए एक बिल पेश किया था, जो ध्वनि मत से गिर गया।
‘अब हम डरे हुए हैं’
गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व महासचिव नरेंद्र रावत (वडोदरा) का मानना है कि यह कानून अधिकारियों के मन में डर के कारण फलता-फूलता है। “अगर उन्हें लगता है कि मुसलमानों के पक्ष में कुछ किया गया है, तो भाजपा से जुड़े चार लोग उनके घर के बाहर विरोध करने पहुंच जाते हैं,” रावत कहते हैं।
वह चेतावनी देते हुए कहते हैं, “अगर गुजरात सरकार इसी राह पर चलती रही, तो यहां मुसलमानों की हालत विस्थापित कश्मीरी पंडितों जैसी हो जाएगी। देश और बंट जाएगा।”
उधर, गोमतीपुर में सानिया अंसारी का परिवार अब भी खौफ में है। उन्हें नहीं पता कि वे कभी उस घर में सुरक्षित रह पाएंगे या नहीं जो उन्होंने अपने पैसों से खरीदा था।
रिफत जहां गली की तरफ देखते हुए कहती हैं, “इस इलाके में पहले भी कई मुस्लिम परिवारों ने घर खरीदे हैं। यह जगह हमेशा से मिली-जुली रही है, लेकिन अब… अब हम डरे हुए हैं।”
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