अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वक्फ संपत्तियों से जुड़े मामलों में कोर्ट फीस का भुगतान करना अनिवार्य है। अदालत ने व्यवस्था दी है कि गुजरात वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर होने वाले मामलों में ‘कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर’ (CPC) और ‘गुजरात कोर्ट फीस एक्ट’ के प्रावधान लागू होंगे।
क्या था पूरा मामला?
जस्टिस जे.सी. जोशी की पीठ ने सुन्नी मुस्लिम ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट बनाम हार्दिक सीताराम पटेल व अन्य के मामले में यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई थी कि वक्फ एक्ट, 1995 की धारा 83(3) के तहत की जाने वाली कार्यवाही के लिए “सूट” (मुकदमा) शब्द के बजाय “एप्लिकेशन” (आवेदन) शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए, इन मामलों में गुजरात कोर्ट फीस एक्ट, 2004 के तहत फीस नहीं ली जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने खारिज की दलील
अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस जोशी ने टिप्पणी की कि भले ही इसे “आवेदन” कहा गया हो, लेकिन इसकी प्रकृति एक दीवानी मुकदमे (Civil Suit) जैसी ही होती है। इसमें मकान मालिक और किराएदार के बीच के अधिकारों का फैसला होता है, बेदखली की मांग की जाती है, और दोनों पक्षों के अधिकारों और दायित्वों का न्यायिक निर्धारण किया जाता है।
कोर्ट ने कहा, “ट्रिब्यूनल को स्पष्ट रूप से एक सिविल कोर्ट माना गया है, जिसे CPC के तहत मुकदमा चलाने या आदेश को लागू करने के लिए एक सिविल कोर्ट की सभी शक्तियां प्राप्त हैं। ऐसे कानूनी ढांचे में, केवल ‘आवेदन’ नाम होने से इसे ‘मुकदमे’ से अलग नहीं किया जा सकता, जब वास्तव में यह पक्षों के अधिकारों का फैसला करता है।”
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि गुजरात राज्य में वक्फ एक्ट की धारा 83 के तहत दायर आवेदन के लिए कोर्ट फीस के भुगतान से कोई छूट नहीं है। किसी भी वैधानिक छूट के अभाव में, ऐसी कार्यवाही पर कोर्ट फीस लागू होगी।
CPC के नियम भी होंगे लागू
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि वक्फ ट्रिब्यूनल की कार्यवाही पर कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर (CPC) के प्रावधान लागू होते हैं। इसका मतलब है कि अगर किसी मामले में संपत्ति का मूल्यांकन कम किया गया है या उचित कोर्ट फीस नहीं दी गई है, तो मुकदमे को खारिज किया जा सकता है।
जज ने कहा, “जब कानून स्पष्ट रूप से वक्फ ट्रिब्यूनल को सिविल कोर्ट मानता है और उसे CPC के तहत शक्तियां देता है, तो CPC के आदेश VII नियम 11 (Order VII Rule 11) को लागू न करने का कोई औचित्य नहीं है।”
133 याचिकाओं पर पड़ा असर
यह फैसला 133 याचिकाओं के एक समूह पर आया है, जो वक्फ संपत्तियों को किरायेदारों या कथित अतिक्रमणकारियों से वापस लेने से जुड़ी थीं। वक्फ ट्रिब्यूनल ने इन आवेदनों को पहले ही खारिज कर दिया था क्योंकि आवेदकों ने न तो अपने मामलों का सही मूल्यांकन किया था और न ही उसके अनुसार जरूरी कोर्ट फीस जमा की थी।
आवेदकों को गलती सुधारने और बकाया फीस भरने का मौका दिया गया था, लेकिन वे इसमें विफल रहे, जिसके बाद उनके आवेदन खारिज कर दिए गए थे। बुधवार को हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब मूल्यांकन सुधारने के पहले आदेश को ही चुनौती नहीं दी गई, तो बाद में फीस न भरने पर मुकदमा खारिज होने को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
महत्वपूर्ण पक्षकार
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट एम.टी.एम. हकीम ने पक्ष रखा। राज्य सरकार की ओर से सरकारी प्लीडर गुरशरण विर्क पेश हुए, जबकि गुजरात राज्य वक्फ बोर्ड का प्रतिनिधित्व एडवोकेट मनीष शाह ने किया।
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