गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस अपील को पूरी तरह से खारिज कर दिया है जिसमें वडोदरा के एक संरक्षित स्मारक के पास शव दफनाने की गतिविधियों में राज्य सरकार के हस्तक्षेप को रोकने की मांग की गई थी। जस्टिस जे.सी. दोशी की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता इस स्थल पर अपना कोई भी पारंपरिक या कानूनी अधिकार साबित करने में विफल रहा है। अदालत ने अपने अवलोकन में पाया कि वादी न तो खुद को एक धार्मिक प्रमुख के रूप में साबित कर सका और न ही वह ऐसा कोई स्थापित रिवाज अदालत के सामने पेश कर पाया जो उसे इस संरक्षित स्मारक क्षेत्र के भीतर दफनाने की अनुमति देता हो।
वादी ने अदालत में तर्क दिया था कि उसे कुतुबुद्दीन मुहम्मद खान के मकबरे के पास अपने परिवार के सदस्यों को दफनाने का धार्मिक और पारंपरिक अधिकार प्राप्त है। उसका दावा था कि वह दिवंगत कुतुबुद्दीन का सीधा वंशज है और यह प्रथा लंबे समय से उनके परिवार में चली आ रही है। हालांकि, सबूतों के अभाव को रेखांकित करते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि वादी ने इस संबंध में केवल मौखिक दावे किए हैं और अपने वंशज होने का कोई भी ठोस प्रमाण पेश नहीं किया। यहां तक कि वादी ने अदालत में जो वंशावली पेश की, वह भी उसके दावों से मेल नहीं खाती थी।
वादी ने यह भी कहा था कि दिवंगत कुतुबुद्दीन शिजरा-ए-कादरिया अशरफिया राफिया मकबरे के कई अनुयायी हैं, लेकिन वह यह साबित करने के लिए कोई प्रामाणिक साक्ष्य नहीं दे सका कि वह कोई धर्म गुरु है या उसका इस मकबरे के आसपास परिजनों को दफनाने का कोई पुश्तैनी रिवाज है।
अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि वादी बहुत ही आसानी से अपने बड़े भाई सैयद अहमद मियां बदरुद्दीन कादरी की गवाही अदालत में पेश कर सकता था। याचिका के अनुसार उसके बड़े भाई ही मकबरे की देखभाल कर रहे थे, लेकिन इसके बावजूद कथित रिवाज या अधिकार को साबित करने के लिए उनकी गवाही नहीं कराई गई। जस्टिस दोशी ने वादी के इस पूरे दावे को ‘एक अज्ञानी कहानी’ (ignoramus story) करार दिया। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने यह तय किया कि प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्ष पूरी तरह सही हैं और उनमें द्वितीय अपील के तहत किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
इस पूरे विवाद की जड़ें पीरजादा सैयद बहाउद्दीन बी. कादरी द्वारा दायर एक नियमित दीवानी मुकदमे से जुड़ी हैं। उन्होंने वडोदरा के कलेक्टर द्वारा 4 फरवरी, 1986 को जारी किए गए एक नोटिस को अवैध घोषित करने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया था। कलेक्टर के इस नोटिस के जरिए वादी को प्रताप नगर, वडोदरा स्थित दांतेश्वर हजीरा उर्फ बड़ा हजीरा में कुतुबुद्दीन मुहम्मद खान और उनके बेटे नौरंग खान के मकबरे के पास दफनाने की गतिविधियों को रोकने का आदेश दिया गया था।
यह विवाद मुख्य रूप से तब शुरू हुआ जब वादी ने 1984 में बिना किसी अनुमति के अपनी बेटी को इस मकबरे के पास दफना दिया था, जिसके बाद कलेक्टर को स्मारक क्षेत्र में ऐसी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए नोटिस जारी करना पड़ा। निचली अदालत ने 1 अक्टूबर, 2003 को वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसकी मांगें स्वीकार कर ली थीं। हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया और 23 दिसंबर, 2005 को दिए गए अपने फैसले में मुकदमे को खारिज कर दिया। इसी फैसले को चुनौती देते हुए वादी ने हाईकोर्ट में द्वितीय अपील दायर की थी।
अपीलकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता एम.टी.एम. हकीम ने दलील दी कि अपीलीय अदालत ने उन दस्तावेजों पर भरोसा करके बड़ी गलती की है जिन्हें राज्य सरकार ने ट्रायल के दौरान औपचारिक रूप से प्रदर्शित नहीं किया था। उनका तर्क था कि अदालत को सीपीसी के आदेश XLI नियम 23A के तहत मामले को वापस भेजना चाहिए था ताकि दोनों पक्षों को नए सिरे से सबूत पेश करने का मौका मिल सके।
उन्होंने यह भी कहा कि प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत संरक्षित घोषित होने के बावजूद वादी के पारंपरिक और धार्मिक अधिकार समाप्त नहीं होते हैं। इसके जवाब में, राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए सहायक सरकारी वकील उर्वशी पुरोहित ने स्पष्ट किया कि अपीलीय अदालत ने किसी भी नई सामग्री पर भरोसा नहीं किया है। अदालत ने केवल उन्हीं दस्तावेजों का संदर्भ लिया है जो खुद वादी ने ट्रायल के दौरान पेश किए थे।
उन्होंने बताया कि राजस्व प्रविष्टियां, सरकारी अधिसूचनाएं और पुरातात्विक रिकॉर्ड सार्वजनिक दस्तावेज हैं और इनका साक्ष्य मूल्य निर्विवाद है। राज्य ने यह भी बताया कि बड़ौदा राज्य द्वारा 1938 में ही बड़ा हजीरा को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया था, जो 1958 के अधिनियम के तहत भी लगातार संरक्षित बना रहा।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीपीसी की धारा 100 के तहत द्वितीय अपील का अधिकार क्षेत्र केवल कानून के महत्वपूर्ण सवालों तक ही सीमित है। अदालत ने माना कि अपीलीय अदालत ने वादी द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों पर ही विचार किया था और वादी खुद अपने ही दस्तावेजों से मुंह नहीं मोड़ सकता।
प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 की धारा 19 का संदर्भ देते हुए अदालत ने कहा कि संरक्षित क्षेत्रों में खुदाई सख्त वर्जित है, और शव दफनाने के लिए अनिवार्य रूप से अनुमति से अधिक गहराई तक खुदाई करनी पड़ेगी।
चूंकि वादी कोई कानूनी या पारंपरिक अधिकार साबित नहीं कर पाया, इसलिए उसे इस क्षेत्र में गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने इस मामले में एक और बड़ी खामी यह पाई कि वादी ने मुकदमे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को पक्षकार ही नहीं बनाया था, जबकि यह स्मारक सीधे तौर पर उसी की देखरेख में आता है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत के फैसले को वैध ठहराया और इस अपील को खारिज कर दिया।
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