जून का पहला हफ्ता बीत रहा है और मानसून बस दरवाजे पर दस्तक देने ही वाला है। इसके बावजूद अहमदाबाद शहर भीषण गर्मी की चपेट में झुलस रहा है। शुक्रवार को भी शहर का अधिकतम तापमान 41.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। मौसम विभाग (IMD) के ताज़ा आंकड़े डराने वाले हैं।
इस साल के पिछले 56 दिनों में से 53 दिन ऐसे रहे जब अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक दर्ज किया गया। केवल तीन दिन ही पारा इस निशान से नीचे रहा, जिसने इस लंबे और कष्टदायक गर्म दौर में शहरवासियों के धैर्य की असली परीक्षा ली है।
गर्मी का यह सिलसिला एक लंबे और चिंताजनक पैटर्न का हिस्सा बनता जा रहा है। ओपनसिटी पोर्टल (1991-2023) और भारत मौसम विज्ञान विभाग के बुलेटिन (2024-2026) से प्राप्त दैनिक तापमान डेटा के एक विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि समय के साथ अहमदाबाद में 40 डिग्री से अधिक तापमान वाले दिनों की संख्या में भारी वृद्धि हो रही है।
जहां 1991 से 2000 के बीच सालाना औसतन 35 दिन अत्यधिक गर्म होते थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 53 तक पहुंच गया है। यह भयंकर गर्मी मुख्य रूप से मध्य-मार्च से मध्य-जून के बीच पड़ती है। यानी पिछले 35 वर्षों में शहर ने अत्यधिक गर्मी वाले 18 दिन अतिरिक्त जोड़े हैं।
हाल के वर्षों के आंकड़े इस बड़े बदलाव की गवाही देते हैं। डेटा दर्शाता है कि साल 2023, 2024 और 2025 में क्रमशः 36, 57 और 60 दिन ऐसे रहे जब अधिकतम तापमान 40 डिग्री या उससे ऊपर था। इन आंकड़ों का सीधा सा अर्थ है कि अब अहमदाबाद के लोगों को लगभग दो महीने तक भीषण गर्मी की मार झेलनी पड़ रही है।
गुजरात मौसम विभाग के प्रमुख अशोक कुमार दास का इस स्थिति पर कहना है कि सटीक आंकड़ों की पुष्टि के लिए डेटा और समग्र प्रवृत्तियों की जांच की आवश्यकता है। हालांकि उन्होंने इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि दशकों से शहर और पूरे क्षेत्र के तापमान में ऊपर की ओर जाने का रुझान देखा गया है। उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन से लेकर तेजी से हो रहे शहरीकरण और ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (UHI) प्रभाव जैसे कई कारक इस खतरनाक घटना के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।
यह केवल चिलचिलाती धूप की बात नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके प्रभाव विशेषज्ञों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गए हैं। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ (IIPH) गांधीनगर के पूर्व निदेशक और अहमदाबाद के ‘हीट एक्शन प्लान’ (HAP) को तैयार करने में शामिल रहे सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रोफेसर दिलीप मावलंकर बताते हैं कि अधिकतम तापमान के साथ-साथ न्यूनतम तापमान भी उतना ही मायने रखता है।
प्रोफेसर मावलंकर के अनुसार, इस समस्या का मुख्य कारण यह है कि सूरज ढलने के बाद शाम और रात के समय भी शहर ठंडा नहीं हो पा रहा है। जब न्यूनतम तापमान भी 28 से 30 डिग्री के आसपास बना रहता है, तो गर्मी का एक अनवरत चक्र शुरू हो जाता है।
कंक्रीट की इमारतें और पक्की सड़कें दिन भर गर्मी सोखती हैं और रात में उसे बाहर निकालती हैं, जिससे तापमान लगातार ऊपर बना रहता है। जब तक शहर के ठंडा होने का समय आता है, तब तक अगले दिन की चिलचिलाती धूप का नया चक्र शुरू हो जाता है।
गर्मी का यह ठहराव और रात की उमस स्वास्थ्य जोखिमों को और भी गंभीर बना देती है। प्रोफेसर मावलंकर ने चेतावनी देते हुए कहा कि कई हालिया शोधों ने हीट स्ट्रेस और हृदय रोग या मांसपेशियों की थकान जैसी स्वास्थ्य समस्याओं के बीच सीधा संबंध दिखाया है।
कुछ अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में तो इसे अतिरिक्त मृत्यु दर से भी जोड़ा गया है, जो शहर के बहुचर्चित हीट एक्शन प्लान को लागू करने की एक बड़ी वजह भी था। उनका साफ तौर पर मानना है कि लगातार बढ़ रहे इस जानलेवा तापमान और भीषण गर्मी के हालात से निपटने के लिए एक बहुआयामी और ठोस रणनीति अपनाना बेहद जरूरी है।
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