अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति को जन्म के आधार पर अनुसूचित जाति (एससी) के सदस्य के रूप में आरक्षण का लाभ मिलता है, तो यह उसका संवैधानिक रूप से निहित अधिकार बन जाता है। अदालत ने कहा कि अगर संसद बाद में उस जाति को अनुसूचित जाति की सूची से बाहर भी कर दे, तब भी संबंधित व्यक्ति से यह अधिकार वापस नहीं लिया जा सकता।
जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस जे.एल. ओडेदरा की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के एक आदेश को चुनौती दी गई थी। कैट ने यह आदेश ईपीएफओ के एक कर्मचारी के पक्ष में दिया था, जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह सही माना है।
सुनवाई के दौरान पीठ ने बेहद प्रभावी टिप्पणी करते हुए कहा कि जाति किसी भी इंसान को जन्म से मिलती है और उसका अंत व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही होता है। हाईकोर्ट ने आगे कहा कि जिस व्यक्ति ने एक बार एससी उम्मीदवार के तौर पर आरक्षण का लाभ प्राप्त कर लिया है, वह अपने पूरे जीवनकाल में इस लाभ का हकदार रहेगा। अदालत ने साफ किया कि उसे बीच में इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि जन्म के समय निर्धारित जाति जीवन भर साथ रहती है।
यह पूरा मामला ईपीएफओ कर्मचारी रंजीत मकवाना से जुड़ा है। उन्हें साल 1995 में एससी कोटे के तहत ईपीएफओ में लोअर डिवीजन क्लर्क के पद पर नियुक्त किया गया था। मकवाना मोची समुदाय से आते हैं और 1976 में संशोधित संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश के तहत उस समय पूरे गुजरात में मोची समुदाय को एससी के रूप में मान्यता प्राप्त थी।
इसके बाद साल 2002 में संसद ने कानून में संशोधन किया। इस नए बदलाव के तहत डांग और उमरगाँव को छोड़कर पूरे गुजरात में मोची समुदाय को एससी की सूची से हटा दिया गया। इस बीच, मकवाना को साल 2003 में अपर डिवीजन क्लर्क के रूप में पदोन्नत किया गया। लेकिन साल 2012 में ईपीएफओ ने उनका प्रमोशन यह तर्क देते हुए वापस ले लिया कि अब उनका समुदाय एससी सूची में नहीं है, इसलिए वे आरक्षण लाभ के हकदार नहीं रह गए हैं।
ईपीएफओ के इस फैसले के खिलाफ मकवाना ने कैट का दरवाजा खटखटाया और वहां उन्हें जीत मिली। इसके बाद ईपीएफओ ने हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक बड़ा सवाल उठाया कि 1976 से 2002 के बीच जिन मोची समुदाय के लोगों ने आरक्षण का लाभ लिया था, क्या सूची में संशोधन के बाद उनका यह अधिकार अचानक छिन जाएगा?
अदालत ने कहा कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर किसी जाति को आरक्षण का लाभ दिया जाता है। ऐसे में समुदाय के उत्थान के कारण किसी जाति को एससी सूची से बाहर करने का मतलब यह नहीं है कि उस समुदाय में पैदा हुए व्यक्तियों का एससी दर्जा ही खत्म हो जाएगा।
कैट के आदेश को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी जाति को एससी श्रेणी में शामिल किया जाता है, तो उस समय उस जाति के सभी लोग एक निहित अधिकार हासिल कर लेते हैं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि यह एक संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार है और किसी बाद के संसदीय कानून द्वारा इसे छीना नहीं जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने मकवाना की पदोन्नति को सही ठहराया और कहा कि मोची समुदाय को एससी सूची से बाहर किए जाने मात्र से उन्हें जीवन भर के लिए मिले उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
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