गुजरात में आदिवासियों का भगवाकरण, अयोध्या में रामलल्ला के दर्शन के लिए मिलेगी 5,000 रुपये की मदद

| Updated: October 17, 2021 4:32 pm

गुजरात सरकार ने अयोध्या में राम जन्मभूमि की यात्रा के लिए राज्य के आदिवासियों को विशेष वित्तीय सहायता देने का फैसला किया है। गुजरात में हर आदिवासी अयोध्या की यात्रा के लिए 5,000 रुपये ले सकता है। जाहिर है, रामलल्ला के दर्शन का प्रमाण अनिवार्य होगा।

सत्ताधारी भाजपा के सूत्रों के मुताबिक, गुजरात में शुरू की जा रही इस योजना को अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी दोहराया जा सकता है। यह गुजरात सरकार के आदिवासी विकास और कल्याण कार्यक्रमों का हिस्सा है। एक आदिवासी भाजपा नेता ने वाइब्स ऑफ इंडिया से कहा, “आखिरकार भारत में आदिवासी 11 करोड़ से अधिक हैं और हम सभी पौराणिक वनवासी आदिवासी महिला शबरी के वंशज हैं, जिन्होंने रामायण कथा के अनुसार भगवान राम को मीठे बेर खिलाए थे।”

गुजरात के पर्यटन और तीर्थ विकास मंत्री पूर्णेश मोदी ने दशहरा के अवसर पर डांग के शबरी धाम में एक प्रभावशाली आदिवासी सभा में घोषणा करते हुए कहा, “चूंकि हम, गुजरात के एक करोड़ लोग, माता शबरी के प्रत्यक्ष वंशज हैं, जो राम भक्त थे, इसलिए सभी आदिवासियों को अयोध्या में रामजन्मभूमि जाने के लिए प्रति व्यक्ति 5,000 रुपये की विशेष सहायता दी जाएगी।”

शबरी के बेर खाते हुए भगवन राम
पुर्नेश मोदी (प्रवासन मंत्री, गुजरात)

आखिर गुजरात में भाजपा आदिवासियों को लुभाने में इतना जोर क्यों लगा रही है?

गुजरात में अगले साल दिसंबर में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए अयोध्या मद में यह आदिवासी तुष्टीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसे विकास और कल्याणकारी पहल के रूप में छुपाया गया है।

गुजरात की आबादी में आदिवासी लगभग 15 प्रतिशत हैं, जो राष्ट्रीय जनजातीय आबादी की हिस्सेदारी 8.6 प्रतिशत से अधिक है। इसलिए गुजरात में 2022 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए  भाजपा ने आदिवासियों को लुभाने के लिए समेकित योजना बनाई है।

बता दें कि हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने छोटा उदयपुर में एक आदिवासी के घर में भोजन किया था।

छोटा उदयपुर जिले के देवलिया में एक आदिवासी के घर में भोजन करते हुए अमित शाह

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गुजरात में जनजातीय अंकगणित

गुजरात विधानसभा की 182 में से 27 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। इनके अलावा 14 निर्वाचन क्षेत्रों में आदिवासी वोट महत्वपूर्ण हैं। फिर छोटा उदयपुर, दाहोद, बारडोली और वलसाड चार संसदीय (लोकसभा) सीटें हैं, जो आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं।

कहना ही होगा कि आजादी के बाद से गुजरात के इतिहास में पहली बार कांग्रेस 2019 के लोकसभा चुनावों में इनमें से किसी भी आदिवासी सीट को जीतने में सफल नहीं रही थी। बल्कि उस चुनाव में तो कांग्रेस को गुजरात में लोकसभा की एक भी सीट नहीं मिली थी।

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आदिवासियों की राजनीतिक प्राथमिकताएं

इंदिरा गांधी की हत्या तक गुजरात में आदिवासियों ने कांग्रेस के अलावा किसी और को वोट नहीं दिया था। वे पढ़-लिख नहीं सकते थे, लेकिन वे जानते थे कि उन्हें पंजा चुनाव चिह्न पर ही मुहर लगानी है। उन्होंने श्रीमती गांधी को हमेशा मां कहा।

आदिवासी महिलाओं के साथ इंदिरा गांधी

आदिवासियों को भाजपा की ओर आकर्षित करने के आरएसएस के प्रयोग को सबसे पहले गुजरात की हिंदुत्व प्रयोगशाला में ही आजमाया और परखा गया था।  तब इसका नरेंद्र मोदी से कोई लेना-देना नहीं था। यह आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल का संयुक्त प्रयास था।

स्वामी असीमानंद- तीन विस्फोट मामलों के आरोपी, जो बाद में बरी हो गए- को आदिवासियों तक पहुंच बनाने के मकसद से प्रोजेक्ट मैनेजर बनाया गया था। 1990 से भगवा झुकाव वाले असंख्य स्कूल रहस्यमय संस्थाओं और उसके बाद वनवासी कल्याण केंद्र के तहत सामने आए।

1995 में पहली बार गुजरात में भाजपा के बहुमत से जीतने के बाद आरएसएस, विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण केंद्र और मजबूत हो गए।

मुसलमानों से पहले ईसाई थे भगवा निशाने पर

1998 में भगवा ब्रिगेड ने गुजरात में आदिवासियों को लुभाने और धर्मांतरित करने के लिए ईसाइयों को निशाना बनाया। तब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे।

भाजपा ने इन हमलों का परोक्ष रूप से समर्थन किया। तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी गुजरात और डांग आईं, लेकिन उन जगहों पर जाने की अनुमति नहीं दी गई जहां ईसाई आदिवासियों और उनके संस्थानों को आग लगा दी गई थी।

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न्यूयॉर्क स्थित ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW)  के मुताबिक, 25 दिसंबर 1988 से 3 जनवरी 1999 तक कम से कम 20 प्रार्थना कक्षों और चर्च क्षतिग्रस्त या जला दिए गए थे। डांग और उसके आसपास के जिलों में ईसाई और ईसाई संस्थानों पर हमले किए गए थे। उस समय पूरे गुजरात में कम से कम 25 गांवों ने प्रार्थना कक्षों और चर्चों को जलाने और क्षतिग्रस्त करने की घटनाओं की सूचना दी थी।

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भाजपा को 2017 में लगी चोट और आदिवासियों पर पैनी नजर

गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनावों ने पार्टी के लिए सुरक्षित क्षेत्रों को परेशान कर दिया। आदिवासियों के लिए आरक्षित 27 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने 15 पर जीत हासिल कर ली। बीटीपी ने जहां दो आदिवासी सीटें जीतीं, वहीं भाजपा के हिस्से में मात्र नौ सीटें आईं। मौजूदा हालात में कांग्रेस के पास 13 आदिवासी विधायक हैं, जबकि भाजपा ने उसके 11 विधायकों को तोड़ लिया है। कांग्रेस के विधायक जीतू चौधरी भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने हाल ही में मोरवा हदफ सीट भी जीती थी, जो कांग्रेस विधायक की मृत्यु के बाद खाली हुई थी। अब भाजपा 2022 के चुनावों के लिए अधिक से अधिक सुरक्षित सीटों को जीतने का लक्ष्य बना रही है।

भाजपा को उसकी बाज जैसी दृष्टि, कार्यक्रम बनाने और लागू करने  के लिए श्रेय दिया जाना चाहिए। आदिवासियों को लुभाने के लिए  गुजरात सरकार और उसकी राज्य इकाई (संगठन) ने पहले ही एक लाख करोड़ रुपये की वन बंधु कल्याण योजना-II नाम से साल भर का अभियान चलाया है।

इस महत्वाकांक्षी परियोजना के दूसरे चरण को गुजरात में भाजपा द्वारा विश्व आदिवासी दिवस पर 9 अगस्त को रणनीतिक रूप से लॉन्च किया गया था।

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लेकिन, क्या आदिवासी हिंदू हैं?

यह बहस का विषय है कि आदिवासी हिंदू हैं या नहीं। अधिकांश आदिवासी समुदाय प्रकृति और प्रकृति से जुड़ी वस्तुओं जैसे आग, लकड़ी, पानी की पूजा करते हैं। भगवा ब्रिगेड लगातार उनका ब्रेनवॉश कर रही है कि वे हिंदू हैं और वनदेवी से अन्नपूर्णा तक उनकी पूजा की सभी वस्तुएं वास्तव में हिंदू देवी-देवता हैं।

हालांकि इससे सभी सहमत नहीं हैं। उदाहरण के लिए, झारखंड में (जो पिछले साल हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा के सत्ता में आने तक भाजपा के अधीन रहा था) आदिवासियों के बीच एक नया आंदोलन आकार ले रहा है, जिसमें आदिवासी  जनगणना में सरना कोड को धर्म के रूप में चाहते हैं। छोटा उदयपुर के कांग्रेस विधायक सुखराम राठवा ने वाइब्स ऑफ इंडिया से कहा, “हम स्वदेशी लोग हैं। हालांकि, भाजपा एक बार फिर हमारे भगवाकरण करने की कोशिश कर रही है। ”

गुजरात में आदिवासी आबादी का बड़ा प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे रहता है- दाहोद में 40 प्रतिशत, नर्मदा में 34, डांग में 31.5 और तापी में 28.36 प्रतिशत।

अधिकांश आदिवासियों के लिए 5,000 रुपये का अयोध्या उपहार एक बड़ी राशि है। हालांकि भाजपा इसे ढोंग के तौर पर देखने से इंकार कर रही है।

मंत्री पूर्णेश मोदी ने कहा, “आदिवासी शबरी माता के वंशज हैं जो 14 साल के वनवास के दौरान भगवान राम से मिली थीं। आदिवासी भाइयों और बहनों को अयोध्या यात्रा के लिए वित्तीय सहायता देकर सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।”

गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने अयोध्या खैरात को “ध्रुवीकरण का स्पष्ट रूप से बेशर्म कृत्य” कहा।

चावड़ा ने कहा,“आदिवासियों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की आवश्यकता है। उन्हें स्कूलों की जरूरत है, उन्हें सशक्तीकरण की जरूरत है। गुजरात में आदिवासी अपने वन अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। वे रोजगार चाहते हैं। और यह करने के बजाय सत्तारूढ़ भाजपा सरकार लालची पर्यटन प्रस्ताव देकर आदिवासियों को धार्मिक आधार पर विभाजित करने की कोशिश कर रही है। ”

अमित चावड़ा (गुजरात कोंग्रेस प्रमुख)

हालांकि, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन मोढवाडिया ने कहा कि भाजपा का “डर्टी ट्रिक्स डिपार्टमेंट” फिर से ओवरटाइम काम कर रहा है।

अर्जुन मोढवाडिया (कांग्रेस के वरिष्ठ नेता)

भाजपा नेता और वलसाड के सांसद केसी पटेल ने शबरी धाम में कहा: “हमारी नरेंद्रभाई और उनकी सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण सुनिश्चित किया है। अब केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकारें मंदिर निर्माण को जल्द पूरा करने के लिए काम कर रही हैं।”

भीड़ में मौजूद ज्यादातर आदिवासियों ने तालियां बजाईं और उनमें से कुछ ने राम दर्शन के लिए अयोध्या जाने के लिए वित्तीय सहायता का स्वागत करते हुए “जय श्री राम” का नारा भी लगाया।

के. सी. पटेल (भाजपा नेता और वलसाड सांसद)
जिग्नेश मेवानी (वडगाम विधायक )

वडगाम विधायक जिग्नेश मेवानी ने अयोध्या खैरात की आलोचना की

वडगाम विधायक जिग्नेश मेवानी ने कहा, “इस तरह अयोध्या भेजना आदिवासी संस्कृति को विकृति करना और अनादर है।” उन्होंने कहा, “मेरा सुझाव है कि अगर भाजपा उन्हें 5,000 रुपये देकर मदद करना चाहती है, तो अयोध्या तीर्थयात्रा की ही जरूरत क्यों? आदिवासियों को जयपाल सिंह मुंडा और बिरसा मुंडा की जन्मभूमि को देखने दें। भाजपा को तो पंचायत विस्तार अनुसूचित क्षेत्र (पेसा) अधिनियम, 1996 के जरिये उन्हें सशक्त बनाना चाहिए। आदिवासियों को वनवासियों में बदलने का भाजपा का विचार भयावह है।

(इनपुट्स: जाह्नवी सोनैया)

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