गुजरात में पैर जमाने के लिये क्या आम आदमी पार्टी ‘जय श्री राम’ का सहारा लेगी ?

| Updated: June 25, 2021 10:27 pm

सूरत निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) की शानदार सफलता और पत्रकार ईसुदन गढ़वी जैसे कई प्रमुख नामों के उससे जुड़ जाने के कारण गैर-राजनीतिकृत शहरी गुजरात में अटकलों को बल मिला है। खासकर यह देखते हुए कि पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने 2022 में गुजरात विधानसभा की सभी 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर रखा है।
हालांकि लगभग तीन दशकों तक एक ही पार्टी द्वारा शासित क्षेत्र में नए किरदारों की राजनीतिक भागीदारी का स्वागत है। फिर भी दिल्ली में आप के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए यह पार्टी हिंदू दक्षिणपंथी के राजनीतिक प्रभुत्व के लिए कोई वैचारिक चुनौती नहीं है। लेकिन, यह भाजपा और कांग्रेस से परे तीसरे विकल्प की तलाश करने वालों के लिए सबसे अच्छा मंच अवश्य है। वहीं मध्य-दक्षिणपंथी शासन के लिहाज से यह खराब निगमित विचार भी है।
मुख्यमंत्री केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार सार्वजनिक वस्तुओं की पहुंच और वितरण में सुधार लाने में सफल रही है। खासकर शिक्षा और स्वास्थ्य के मामलों में। हालांकि, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर अपनी सार्वजनिक नीतियों से परे, आप के पास देने के लिए बहुत अधिक नहीं है। वैसे हाशिए पर रहने वाले समुदायों को प्रतिनिधित्व देने और उन्हें उठाने के लिहाज से भी आप का रिकॉर्ड कुछ नहीं तो ठीक भर है। उदाहरण के तौर पर केजरीवाल के मंत्रिमंडल पर नजर डालें। इसमें कोई महिला सदस्य नहीं है। सत्ता उच्च जाति के कुछ पुरुषों के हाथ में है। पार्टी हाथ से मैला उठाने की प्रथा को समाप्त करने के अपने वादे को पूरा करने में विफल रही है, जबकि अधिक से अधिक दलित कार्यकर्ता सीवेज की सफाई करते हुए मर रहे हैं।
इसी तरह, दिल्ली विधानसभा में पार्टी के पांच मुस्लिम विधायक हैं, लेकिन वह खुलेआम मुस्लिम समुदाय के साथ आने से कतराती रही है। सीएए-एनआरसी पर भी उसका रुख अस्पष्ट रहा। यहां मनीष सिसोदिया की शाहीन बाग वाले प्रदर्शन के समर्थन में की गई टिप्पणी जरूर अपवाद है। जबकि दिल्ली सरकार फरवरी 2020 में हुए दंगों के दौरान मूकदर्शक ही बनी रही।
जहां तक अमीर और गरीब की बात है तो पार्टी इस दिशा में एक सरल और नासमझ दोधारी नीति पर चलती है, जो भारत में सीमांतता पर बारीक नजरिये की जरूरत को नकारती है। इस दिशा में यह राजनीतिक अर्थव्यवस्था के व्यापक प्रश्नों को उठाती है, खासकर सार्वजनिक सेवाओं के लिए। इसका संगठन कुलीन टेक्नोक्रेट और शहरी पेशेवरों का एक मिश्रण है, जिनके लिए “दक्षता” और “शासन” नारे हैं। यानी ऐसे शब्द जिनका इस्तेमाल सरकारी कार्यों के निजीकरण की खातिर होते हैं।
आश्चर्यजनक रूप से इन तकनीकी बुद्धिजीवियों के लिए प्रतिनिधिक लोकतंत्र के संकट और राजनीति में धर्म के समावेश की कोई परवाह नहीं है। वास्तव में, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और धार्मिक राजनीति पर इसकी दृष्टि एक रूढ़िवादी विचारधारा की उपज है। उदाहरण के लिए याद करें, जब 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान आतिशी मार्लेना ने अपने को राजपूत बताते हुए वोट मांगे थे। इसी तरह, धर्मनिरपेक्षता के क्षरण को चुनौती देने के बजाय केजरीवाल राज्य प्रायोजित यज्ञों के माध्यम से धर्म का सहारा लेते हैं, या फिर बहुप्रचारित हनुमान चालीसा का पाठ कराते हैं।
बहरहाल, यह अनुमान गलत है कि पार्टी गुजरात में अपनी दिल्ली की नीतियों को पूरी तरह से दोहराएगी। हालांकि, इसके दो कारण मौजूद हैं कि पार्टी क्यों हिंदू राष्ट्रवाद के एक उदारवादी संस्करण को चुनने और गुजरात में शासन के खोखले विमर्श पर भरोसे की अधिक संभावना रखती है। सर्वप्रथम तो गुजरात एक विशाल शहरी क्षेत्र है, जिसकी लगभग आधी आबादी कस्बों और शहरों में रहती है, जहां शासन में सुधार की बात युवाओं के लिए विशेष आकर्षण हो सकती है। दूसरे, कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान आवश्यक प्रबंधन में दिल्ली सरकार की विफलता के बाद आप गुजरात में धार्मिक राष्ट्रवाद को और भी अधिक पसंद कर सकती है, जो हिंदू राष्ट्रवाद और रूढ़िवादी राजनीति की प्रयोगशाला है।

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