नई दिल्ली: दक्षिण एशिया, और विशेष रूप से भारत में, डायबिटीज (मधुमेह) के निदान और निगरानी के लिए जिस टेस्ट पर डॉक्टर और मरीज सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं, वही शायद बहुत बड़ी आबादी के लिए सही साबित नहीं हो रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भारत में टाइप 2 डायबिटीज के लिए प्राथमिक नैदानिक मार्कर के रूप में ग्लािकेटेड हीमोग्लोबिन (HbA1c) पर अत्यधिक निर्भरता पर फिर से विचार करने का समय आ गया है।
‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ – साउथईस्ट एशिया’ (The Lancet Regional Health – Southeast Asia) में प्रकाशित एक नई साक्ष्य-आधारित रिपोर्ट (Viewpoint) ने चिकित्सा जगत में हलचल मचा दी है।
इसमें बताया गया है कि HbA1c, जिसे दुनिया भर में जांच का “गोल्ड स्टैंडर्ड” माना जाता है, उन लोगों में भ्रामक नतीजे दे सकता है जिनमें आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया, हीमोग्लोबिनोपैथी (hemo-globinopathies) और G6PD की कमी जैसी समस्याएं हैं। भारत और आसपास के क्षेत्रों में ये स्थितियां बहुत आम हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये जैविक कारक लाल रक्त कोशिकाओं (Red Blood Cells) के जीवनकाल और संरचना को बदल देते हैं। इससे उस बुनियादी आधार को ही चुनौती मिलती है जिस पर HbA1c परीक्षण काम करता है। इसका सीधा असर यह हो रहा है कि कई मरीजों में बीमारी की पहचान में देरी हो रही है, उन्हें गलत श्रेणी में रखा जा रहा है और सार्वजनिक स्वास्थ्य के आंकड़े भी त्रुटिपूर्ण हो रहे हैं।
क्यों फेल हो रहा है ग्लोबल स्टैंडर्ड?
HbA1c टेस्ट पिछले तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर के स्तर का अनुमान लगाता है। यह मापता है कि लाल रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन के साथ कितना ग्लूकोज जुड़ा है। सामान्य परिस्थितियों में, लाल रक्त कोशिकाएं लगभग 120 दिनों तक जीवित रहती हैं, जिससे लंबे समय तक रहने वाले शुगर लेवल का सही आकलन हो पाता है।
हालांकि, समीक्षा में बताया गया है कि कई दक्षिण एशियाई लोगों में, पोषण की कमी या वंशानुगत रक्त विकारों के कारण लाल रक्त कोशिकाओं का जीवनचक्र बदल जाता है। अगर कोशिकाओं का जीवनकाल कम हो जाता है, तो HbA1c की रीडिंग गलत तरीके से ‘कम’ आ सकती है। वहीं, कुछ एनीमिया की स्थितियों में कोशिकाओं के लंबे समय तक जीवित रहने पर रीडिंग गलत तरीके से ‘ज्यादा’ भी आ सकती है।
फोर्टिस सी-डॉक (Fortis C-DOC) सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर डायबिटीज के चेयरमैन और इस समीक्षा के प्रमुख लेखक, प्रोफेसर अनूप मिश्रा ने कहा, “सिर्फ HbA1c पर निर्भर रहने से डायबिटीज की गलत पहचान (misclassification) हो सकती है। कुछ व्यक्तियों का निदान उचित समय से काफी देर से हो सकता है, जबकि कुछ का गलत निदान हो सकता है, जिससे समय पर इलाज और प्रबंधन प्रभावित होता है। ब्लड शुगर की स्थिति की निगरानी भी इससे प्रभावित हो सकती है।”
एनीमिया और जेनेटिक विकार: निदान में बड़ी बाधा
चुनौती का पैमाना काफी बड़ा है। भारत में पोषण संबंधी आयरन की कमी वाला एनीमिया (Iron-deficiency anaemia) एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता है, जो आबादी के बड़े हिस्से, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को प्रभावित करता है। आयरन की कमी हीमोग्लोबिन की संरचना को बदल सकती है, जिससे अक्सर HbA1c का स्तर बढ़ा हुआ दिखता है, जबकि वास्तव में ब्लड शुगर कंट्रोल में हो सकता है।
इसका खतरा यह है कि मरीजों को डायबिटीज की अनावश्यक या आक्रामक दवाएं दी जा सकती हैं, जबकि उनके असली रोग (एनीमिया) का इलाज नहीं हो पाता।
इसके अलावा, थैलेसीमिया और सिकल सेल ट्रेट जैसे वंशानुगत हीमोग्लोबिन विकार जांच की सटीकता को और उलझा देते हैं। लेखकों ने नोट किया कि कई लैब एनालाइजर सामान्य हीमोग्लोबिन के लिए कैलिब्रेटेड होते हैं और परिवर्तित रूपों को गलत पढ़ सकते हैं।
G6PD की कमी, एक एंजाइम विकार जो लाल रक्त कोशिकाओं के समय से पहले टूटने का कारण बनता है और कई भारतीय समुदायों में प्रचलित है, एक अतिरिक्त जोखिम पैदा करता है। समीक्षा बताती है कि जिन पुरुषों में G6PD की कमी का निदान नहीं हुआ है, उनमें केवल HbA1c पर निर्भरता डायबिटीज के निदान में चार साल तक की देरी कर सकती है। इससे दिल, गुर्दे और आंखों को प्रभावित करने वाली जटिलताओं का खतरा काफी बढ़ जाता है।
शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों पर असर
अक्सर यह माना जाता है कि डायग्नोस्टिक inaccuracies (निदान की अशुद्धियाँ) केवल संसाधनों की कमी वाली जगहों पर होती हैं, लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि अच्छे उपकरणों वाले शहरी अस्पताल भी HbA1c परीक्षण की सीमाओं से अछूते नहीं हैं।
जोशी क्लिनिक, मुंबई के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और अध्ययन के सह-लेखक डॉ. शशांक जोशी ने कहा, “अच्छे संसाधनों वाले शहरी अस्पतालों में भी, लाल रक्त कोशिकाओं में भिन्नता और वंशानुगत हीमोग्लोबिन विकारों से HbA1c रीडिंग प्रभावित हो सकती है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में, जहां एनीमिया और लाल रक्त कोशिकाओं की असामान्यताएं अधिक आम हैं, वहां विसंगतियां और भी बड़ी हो सकती हैं।”
विशेषज्ञों का कहना है कि अलग-अलग जैविक और सामाजिक-आर्थिक संदर्भों में एक ही बायोमार्कर का उपयोग करना “वन-साइज-फिट्स-ऑल” (सबके लिए एक जैसा) दृष्टिकोण है, जो भारत की विविधता के हिसाब से सही नहीं है।
पब्लिक हेल्थ पॉलिसी के लिए खतरे की घंटी
व्यक्तिगत देखभाल से परे, HbA1c परीक्षण में अशुद्धियों का राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण और स्क्रीनिंग कार्यक्रम जिलों और राज्यों में डायबिटीज के प्रसार का अनुमान लगाने के लिए मुख्य रूप से HbA1c पर निर्भर करते हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि व्यापक एनीमिया और आनुवंशिक रक्त विकारों के कारण ये रीडिंग व्यवस्थित रूप से टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं, तो भारत में डायबिटीज का बोझ अलग-अलग क्षेत्रों में या तो बहुत कम या बहुत ज्यादा आंका जा सकता है। इससे सरकारी खर्च और नीतिगत प्राथमिकताएं गलत दिशा में जा सकती हैं।
लेखकों ने आगाह किया है कि अगर रक्त संबंधी (haematological) चर को ठीक नहीं किया गया, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियाँ कुछ आबादी में गलत समस्याओं को लक्षित कर सकती हैं, जबकि कुपोषण या वंशानुगत स्थितियों की अनदेखी हो सकती है जिन पर समानांतर ध्यान देने की आवश्यकता है।
सिर्फ एक टेस्ट पर भरोसा छोड़ना होगा
इन चिंताओं को दूर करने के लिए, समीक्षा एक बहुआयामी निदान ढांचे (multidimensional diagnostic framework) की ओर बढ़ने का आह्वान करती है। इसका मतलब है कि HbA1c को अकेला इस्तेमाल करने के बजाय अन्य उपकरणों के साथ जोड़कर देखा जाए।
लेखक निदान के लिए ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGTT) के अधिक उपयोग की सिफारिश करते हैं, साथ ही ब्लड शुगर की सेल्फ-मॉनिटरिंग और नियमित हेमेटोलॉजिकल आकलन की भी सलाह देते हैं। HbA1c के विपरीत, OGTT सीधे यह मापता है कि शरीर ग्लूकोज पर कैसे प्रतिक्रिया करता है और यह लाल रक्त कोशिकाओं के जीवनकाल से प्रभावित नहीं होता है।
कोलकाता से समीक्षा के सह-लेखक डॉ. शंभो सम्राट समाजदार ने कहा, “ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट, ब्लड शुगर की सेल्फ-मॉनिटरिंग और हेमेटोलॉजिकल आकलन को मिलाकर डायबिटीज के जोखिम की अधिक सटीक तस्वीर मिलती है। यह दृष्टिकोण सार्वजनिक स्वास्थ्य अनुमानों को परिष्कृत करने और संसाधनों के सही आवंटन में मदद कर सकता है।”
संसाधन-अनुकूल मॉडल की जरूरत
भारत की स्वास्थ्य सेवा विविधता को स्वीकार करते हुए, लेखकों ने एक संसाधन-संवेदनशील ढांचे का प्रस्ताव दिया है। कम संसाधनों और प्राथमिक देखभाल सेटिंग्स में, उन्होंने सुझाव दिया कि निदान के लिए OGTT और ब्लड शुगर की सस्ती सेल्फ-मॉनिटरिंग को प्राथमिकता दी जाए, साथ ही एनीमिया और लाल रक्त कोशिकाओं की असामान्यताओं के लिए बुनियादी स्क्रीनिंग की जाए।
टर्शियरी (बड़े) और शहरी केंद्रों में, चिकित्सकों को सलाह दी जाती है कि वे HbA1c परीक्षण—जो मानकीकृत, उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों पर किया गया हो—को ‘कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग’ (CGM) के साथ जोड़ें।
समीक्षा में ‘फ्रुक्टोसामाइन टेस्टिंग’ (fructosamine testing) को भी एक उपयोगी विकल्प के रूप में उजागर किया गया है, विशेष रूप से एनीमिया या हीमोग्लोबिन वेरिएंट वाले रोगियों के लिए, क्योंकि यह लाल रक्त कोशिकाओं पर भरोसा किए बिना अल्पकालिक ग्लूकोज नियंत्रण को दर्शाता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसी संदर्भ-विशिष्ट रणनीतियों को अपनाने से निदान की सटीकता में सुधार होगा, गलत वर्गीकरण से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकेगा और डायबिटीज की देखभाल को भारत की जैविक और सार्वजनिक स्वास्थ्य वास्तविकताओं के साथ अधिक निकटता से जोड़ा जा सकेगा।
समीक्षा का निष्कर्ष चिकित्सकों, नीति निर्माताओं और शोधकर्ताओं के लिए एक स्पष्ट आह्वान है कि वे लंबे समय से चली आ रही मान्यताओं का पुनर्मूल्यांकन करें और सुनिश्चित करें कि नैदानिक सुविधा (convenience) की कीमत मरीज की सुरक्षा और जनसंख्या-स्तर की सटीकता देकर न चुकानी पड़े।
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