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भारतीय सेना के बेजुबान शूरवीर: सरहदों के वो रक्षक जो कभी पीछे नहीं हटते

| Updated: February 28, 2026 13:44

गोलियों की बौछार के बीच सीना तानकर खड़े होने वाले सेना के इन बेजुबान जांबाजों की कहानी, जो किसी मेडल या रेंक के लिए नहीं, बल्कि अपने साथी जवानों के प्यार के लिए लड़ते हैं।

दोनों तरफ से भारी गोलीबारी हो रही थी। लेकिन भारतीय सेना के जवान और डॉग-हैंडलर एएस शेखावत और आतंकियों के बीच एक ऐसी ताकत खड़ी थी, जिसे मौत का कोई खौफ नहीं था।

दूरदर्शन की डॉक्यूमेंट्री ‘डॉग्स नेवर डाई’ (Dogs Never Die) में शेखावत याद करते हुए बताते हैं, “आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी थी। लेकिन मेरा कुत्ता गोलियों की बौछार के बीच कभी बाईं तो कभी दाईं ओर छलांग लगाते हुए उन पर टूट पड़ा। उसने दुश्मनों का ध्यान भटका दिया और उन्हें हमारे करीब नहीं आने दिया। कई बार वह आतंकियों के बेहद करीब पहुंच जाता। गोली लगने पर वह थोड़ा सिहरता जरूर था, लेकिन पीछे कभी नहीं हटा। वह हमेशा हम जवानों के आगे रहा। मैं उसे कैसे भूल सकता हूँ? वह भले ही अब कहीं भी हो, लेकिन मेरे दिल में हमेशा जिंदा रहेगा।”

आज शेखावत के साथ एक नया कैनाइन (श्वान) सैनिक है, लेकिन उनके कमरे में टंगी एक पुरानी ‘लीश’ (पट्टा) आज भी उनके पहले साथी की याद दिलाती है।

हम अक्सर नागरिक जीवन में कुत्तों की वफादारी के किस्से सुनते हैं, लेकिन शेखावत की कहानी युद्ध के मैदान में इन चार पैरों वाले सैनिकों की अहमियत को बयां करती है।

हाल ही में एक ऐसा ही वाकया तब सामने आया जब सेना के एक असॉल्ट डॉग ‘टायसन’ (Tyson) ने जम्मू-कश्मीर के एक ऑपरेशन में पहली गोली अपने सीने पर खाई। किश्तवाड़ जिले के छतरू बेल्ट में चलाए गए ‘ऑपरेशन त्रशी-I’ (Operation Trashi-I) के दौरान, 2 पैरा स्पेशल फोर्सेज से जुड़े इस जर्मन शेफर्ड ने आतंकियों के ठिकाने पर धावे का नेतृत्व किया था।

वो नाम जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता

हम बेजुबानों की कई प्यारी कहानियाँ सुनते हैं, लेकिन हमारे इन जांबाज साथियों की कुछ कहानियाँ ऐसी हैं जिन्हें बार-बार सुनाया जाना चाहिए।

कुछ नाम ऐसे हैं जिन्हें हम अक्सर याद नहीं रखते: मैक्स, मनु, बिंदु, गैलेक्सी, रॉकेट, जंजीर, लाइका, रोली, रोशनी, नवाब, फैंटम, टॉम, केंट, बॉबी, गरिमा, रासो, ब्लास्टर, मैजिक, एलेक्स, रूट, फ्लोरा, जूम, एक्सल, गौरव, रोनी, मोहित, इडा, अमन, रॉकी, क्यूटी, टाइगर, वीर, स्टेला, जगुआर, गैम्बल, जीनत, चैडविक, सम्राट, मानसी, सुरेश, क्रैकर, पैंथर और ब्रावो। इनमें से एक भी नाम छोड़ना उनके बलिदान को मिटाने जैसा लगता है।

टायसन के मामले में, जैसे ही ऑपरेशन शुरू हुआ, यह असॉल्ट डॉग उस कच्चे घर की तरफ रेंगते हुए बढ़ा जहां आतंकी छिपे थे। जब वह आगे की टोह ले रहा था, तभी आतंकियों ने फायरिंग कर दी और एक गोली टायसन के पैर में जा लगी। लेकिन वह बिना डरे आगे बढ़ता रहा और आतंकियों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। इससे सुरक्षाबलों को आतंकियों की सटीक लोकेशन मिल गई।

टायसन की इस बहादुरी ने जवानों को वह मौका दिया जिसकी उन्हें जरूरत थी। इसके बाद स्पेशल फोर्सेज ने 326 दिनों की लंबी तलाश के बाद जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के टॉप कमांडर सैफुल्लाह सहित सभी आतंकियों को ढेर कर दिया। “वॉर मशीन” टायसन को ट्रेनिंग देने वाली सीआरपीएफ ने कहा, “2 पैरा एसएफ के इस K9 ने खतरे की आँखों में आँखें डालकर उसका सामना किया।”

पहाड़ों और जंगलों में पहला खतरा मोल लेने वाले योद्धा

भारतीय सीमाओं की गश्त करने से लेकर हथियारों का जखीरा सूंघकर निकालने और सैनिकों को बेहद खतरनाक इलाकों में सुरक्षित ले जाने तक, इन मिलिट्री डॉग्स ने अनगिनत इंसानी जानें बचाई हैं। खासकर जम्मू-कश्मीर जैसे इलाकों में, जहां ‘कॉर्डन-एंड-सर्च’ (घेराबंदी और तलाशी) ऑपरेशन आम बात हैं, ये कुत्ते वो काम करते हैं जो अकेली तकनीक नहीं कर सकती।

इनकी सूंघने की क्षमता जमीन में गहरे दबे या गाड़ियों में छिपे विस्फोटकों का पता लगा सकती है, और इनकी फुर्ती आतंकियों को उनके बिलों से बाहर निकालने में कारगर होती है।

हमारी सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाले इन जांबाजों को उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित ‘रिमाउंट वेटरनरी कोर’ (RVC) और कर्नाटक के तरालू स्थित सीआरपीएफ के ‘डॉग ब्रीडिंग एंड ट्रेनिंग स्कूल’ (DBTS) में कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है।

चयन और ट्रेनिंग: इनका चुनाव इनकी नस्ल, फुर्ती और तेज इंद्रियों के आधार पर होता है। लेकिन इनकी सबसे बड़ी खूबी अपने हैंडलर के प्रति वफादारी है। 1990 के दशक से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से लड़ने में इनकी भूमिका निर्णायक रही है।

अटूट बंधन: इनकी ट्रेनिंग महज आठ हफ्ते की उम्र से शुरू हो जाती है। पहले ही दिन से हैंडलर इनके साथ रहते हैं, जिससे उनके बीच एक अटूट रिश्ता बन जाता है। वे फॉरवर्ड बेस पर एक साथ रहते हैं, काम करते हैं, और यहाँ तक कि टेंट और खाना भी साझा करते हैं।

हालांकि युद्ध और एंटी-टेरर ऑपरेशन्स में कुत्तों का इस्तेमाल पूरी दुनिया में होता है, लेकिन कई पशु प्रेमियों का मानना है कि उन्हें ‘वॉर मशीन’ में बदलना अनुचित है। कुत्ते युद्ध नहीं चुनते, इंसान चुनते हैं। उनके साथी भले ही वर्दी और बूट पहनकर जंग लड़ते हों, लेकिन एक कुत्ते के लिए सिर्फ उसके हैंडलर का साथ मायने रखता है। वे बेजुबान जरूर हैं, लेकिन हमारे युद्धों के सबसे उत्साही भागीदार हैं। मशीन गन की गोलियों के बीच भी उनकी वफादारी नहीं डगमगाती।

शहादत और सर्वोच्च बलिदान की कहानियाँ

ड्यूटी के दौरान हमारे इन चार पैरों वाले सैनिकों ने कई बार अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है:

जूम (Zoom): 28 आर्मी डॉग यूनिट का यह दो वर्षीय बेल्जियन मेलिनोइस (Belgian Malinois) अक्टूबर 2022 में अनंतनाग जिले के ‘ऑपरेशन तंगपावा’ में तैनात था। घने जंगल में जब जवानों ने आतंकियों को घेरा, तो जूम ने सीधे आतंकियों पर धावा बोल दिया। सीने और पिछले पैर में गोली लगने के बावजूद उसने एक आतंकी को दबोच लिया, जिससे जवानों को दोनों आतंकियों को ढेर करने में मदद मिली। श्रीनगर के एडवांस फील्ड वेटरनरी अस्पताल में कई दिनों तक जिंदगी से जंग लड़ने के बाद जूम शहीद हो गया। गणतंत्र दिवस 2023 पर उसे मरणोपरांत ‘मेंशन-इन-डिस्पैचेस’ (Mention-in-Despatches) से सम्मानित किया गया।

फैंटम (Phantom): 25 मई 2020 को जन्मे इस चार वर्षीय बेल्जियन मेलिनोइस ने अपनी छोटी सी उम्र में ही बड़ा नाम कमा लिया था। अगस्त 2022 में RVC से ग्रेजुएट होने के बाद वह जम्मू में व्हाइट नाइट कोर के साथ तैनात था। 28 अक्टूबर 2024 को जब आतंकियों ने अखनूर के सुंदरबनी सेक्टर (आसन के पास) में सेना के काफिले पर हमला किया, तो फैंटम ने बट्टल इलाके में दुश्मनों की गोलियों का रुख अपनी तरफ मोड़ लिया। वह शहीद हो गया, लेकिन उसकी वजह से सेना को 8 घंटे लंबे ऑपरेशन में आतंकियों को खत्म करने का कीमती वक्त मिल गया।

एक्सल (Axel): 26 आर्मी डॉग यूनिट के इस दो वर्षीय बेल्जियन मेलिनोइस ने जुलाई 2022 में बारामूला जिले के ‘ऑपरेशन रक्षक’ में अपनी जान गंवाई। वानीगाम बाला में सर्च ऑपरेशन का नेतृत्व करते समय उसे गोलियां लगीं, लेकिन गिरने से पहले ही उसने जवानों को खतरे से आगाह कर दिया था। एक्सल को भी मरणोपरांत ‘मेंशन-इन-डिस्पैचेस’ मिला।

केंट (Kent): राजौरी के नारला गांव में सितंबर 2023 में एक भीषण मुठभेड़ के दौरान इस फीमेल लैब्राडोर रिट्रीवर ने अपने हैंडलर को गोलियों से बचाते हुए अपनी जान दे दी।

मानसी (Mansi): 2015 में 160 टेरिटोरियल आर्मी बटालियन की इस लैब्राडोर रिट्रीवर ने कुपवाड़ा के तंगधार में आतंकियों का पता लगाया था। पहाड़ी जंगल में घुसपैठियों पर भौंकते हुए उसे गोली लग गई। उसके हैंडलर सिपाही अहमद बशीर वार ने भी बहादुरी से लड़ते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन तब तक बैकअप फोर्स पहुँच चुकी थी।

इस लेख का उद्देश्य न तो आपको भावुक करना है और न ही कुत्तों पर इंसानी वीरता थोपना है। कुत्ते ऐसी बयानबाजी से परे हैं, ठीक वैसे ही जैसे वे उन युद्धों से परे हैं जिनमें हम उन्हें भेजते हैं। लेकिन जब बंदूकें शांत होती हैं, तो पीछे बस एक खाली पट्टा रह जाता है।

जब भी कोई K9 एक्शन में शहीद होता है, तो चार्ल्स बुकोवस्की (Charles Bukowski) का एक कोट याद आता है: “यदि नर्क में भी कोई कबाड़खाना है, तो प्यार वह कुत्ता है जो उसके दरवाजों की रखवाली करता है।” (If there are junkyards in hell, love is the dog that guards its gates.) हमारी बनाई गई इस तबाही के बीच, ये कुत्ते पहरा देते हैं। किसी गौरव या मेडल के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ प्यार के लिए।

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