नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव 2024 के बाद देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियां सोमवार को एक बार फिर एक मंच पर आ रही हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के खिलाफ अपनी रणनीति बनाने और राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए यह अहम बैठक होने जा रही है। संसदीय समन्वय से परे, चुनाव के बाद विपक्ष की यह इस तरह की पहली बड़ी सामूहिक माथापच्ची है।
यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल पूरा होने की ओर है। हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद से भाजपा विरोधी खेमे में अंदरूनी मतभेद और कड़वाहट साफ तौर पर बढ़ती हुई नजर आ रही है।
तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) ने कांग्रेस द्वारा अभिनेता विजय की पार्टी ‘तमिझगा वेत्री कड़गम’ (टीवीके) के साथ करीबी बढ़ाने पर नाराजगी जताई है और खुद को इस गठबंधन से थोड़ा दूर कर लिया है। वहीं, केरल के चुनावी अभियान को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी माकपा भी कांग्रेस पर हमलावर है।
माकपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि उसने हाल ही में सत्ता से बेदखल हुए वामपंथी मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पर भाजपा के साथ सांठगांठ करने का झूठा आरोप लगाया। इस मुद्दे पर माकपा महासचिव एम.ए. बेबी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को एक कड़ा पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
इस बीच, कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने जानकारी दी है कि कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में होने वाली इस बैठक में शामिल होने के लिए 23 दलों ने अपनी सहमति दे दी है। हालांकि, कुछ दलों ने अपने व्यक्तिगत कारणों से आने में असमर्थता जताई है, लेकिन उन्होंने मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ विपक्ष के रुख का पुरजोर समर्थन किया है।
राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि जयराम रमेश का यह इशारा परोक्ष रूप से द्रमुक की तरफ था। कांग्रेस को अब भी उम्मीद है कि भविष्य में यह द्रविड़ संगठन दोबारा उनके साथ मजबूती से खड़ा होगा।
सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक को बुलाने की सबसे बड़ी मांग तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की ओर से आई थी। पश्चिम बंगाल विधानसभा में भाजपा के पक्ष में हुए बड़े पैमाने पर दलबदल और संसदीय दल में संभावित टूट के चलते टीएमसी इस समय बड़े राजनीतिक संकट का सामना कर रही है। बैठक में पार्टी का प्रतिनिधित्व ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी खुद करेंगे।
भले ही ममता बनर्जी और ‘इंडिया’ गठबंधन के बीच रिश्ते बहुत सहज न रहे हों, लेकिन इस बैठक के लिए पूर्व मुख्यमंत्री की पहल को राजनीतिक विशेषज्ञ एक ‘मदद की पुकार’ के रूप में देख रहे हैं। बंगाल में भाजपा की भारी जीत के बाद, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने विपक्षी दलों से टीएमसी के नुकसान पर जश्न न मनाने की अपील की है।
राहुल गांधी का मानना है कि आपसी रंजिशों से ऊपर उठकर भाजपा की राजनीति से लोकतंत्र को होने वाले खतरों पर ध्यान केंद्रित करने का यह सही समय है। बैठक में बंगाल के चुनावी नतीजों के पीछे निर्वाचन आयोग (ईसी) द्वारा मतदाता सूचियों के ‘एसआईआर’ (विशेष निरीक्षण रिपोर्ट) को लेकर भी चर्चा हो सकती है, जिसे राहुल और टीएमसी अपनी हार की मुख्य वजह मान रहे हैं।
हालांकि, विपक्षी कुनबे में अंदरूनी मतभेदों के चलते इस बैठक में तीखी बहस होने की भी पूरी आशंका है, क्योंकि कई क्षेत्रीय दल इस समय सीधे तौर पर कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।
मई में हुए चुनावों में द्रमुक और टीएमसी के हाथों से सत्ता का जाना विपक्ष के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित हुआ है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की मजबूत पकड़ ने विपक्षी खेमे की चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि यह राज्य लोकसभा में 42 सांसद भेजता है, जो 2029 के आम चुनावों के लिहाज से बेहद निर्णायक साबित होंगे।
तमिलनाडु में फिलहाल थोड़ी उम्मीद बाकी है, क्योंकि द्रमुक को हराने वाली टीवीके पार्टी राज्य में गठबंधन के अन्य सहयोगियों के साथ वैचारिक रूप से जुड़ी नजर आ रही है। इसके अलावा, संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की ताकत और प्रभाव को बनाए रखने के लिए इन दोनों ही दलों के सांसदों की संख्या हमेशा से बेहद महत्वपूर्ण रही है।
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